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गुजरांवाला में एक हफ्ता और रुकते तो ना हम बचते, ना हमारी यादें

मां रात-रात भर रोती रहती थीं और बाबा की आंखों में भी सबकुछ गंवा देने का दुख नजर आता था

Kamlesh Duggal Updated On: Aug 14, 2017 10:22 PM IST

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गुजरांवाला में एक हफ्ता और रुकते तो ना हम बचते, ना हमारी यादें

अपने घर न लौट पाने का दुख मुझे आज भी है. मेरी सहेलियां, खिलौने, घर, आंगन, आस-पड़ोस सब छूट गया. हम तो सिर्फ 15 दिन के लिए अपने घर से निकले थे, लेकिन अपने घर से ताउम्र के लिए रिश्ता टूट गया.

आज मेरी उम्र 76 साल है. यहां दिल्ली में घर परिवार ने फिर से बसा, लेकिन आज भी 70 साल पुरानी वे यादें आंखों के सामने ऐसे घूम जाती हैं मानों ये कल की ही बात हो.

14-15 अगस्त 1947 की रात भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए कभी न भूला पाने वाली रात थी. इससे ठीक एक हफ्ते पहले हम लाहौर के गुजरांवाला से पठानकोट के लिए निकले थे. तब मेरी उम्र तकरीबन 6 साल की थी. लाहौर में चारों तरफ काफी गहमागहमी थी. सब लोग एक दूसरे से पाकिस्तान बनने की बातें कर रहे थे. लेकिन इस बात की अहमियत मुझे तब बिल्कुल समझ नहीं आई थी. मैं बस इस बात से खुश थी कि मेरे घर मेरे मामा की बेटी रहने आई थी.

कुछ दिनों बाद हम अपने मामा के  घर पठानकोट जाने वाले थे. वहां मेरी नानी रहती थीं. उस वक्त किसी को यह पता नहीं था कि मामा की बेटी की शादी के लिए गुजरांवाला से पठानकोट आना हमारी जिंदगी का सबसे यादगार सफर होगा. अपने जरूरी कपड़ों और गहनों के साथ निकलते वक्त मेरी मां को भी यह अंदाजा नहीं होगा कि सिर्फ 15 दिन के लिए किसी दूसरे शहर में जाने पर  अपना घरबार हमेशा के लिए छूट जाएगा.

2015 के 15 अगस्त पर दिल्ली में हुए पतंगबाजी का दृश्य. (रॉयटर्स)

2015 के 15 अगस्त पर दिल्ली में हुए पतंगबाजी का दृश्य. (रॉयटर्स)

मुझे ठीक से याद नहीं है लेकिन हम शायद 10 अगस्त को पठानकोट पहुंचे थे. वहां मेरे मामा मजिस्ट्रेट थे. पठानकोट में भी चारों तरफ पाकिस्तान बनने की ही बातें हो रही थीं. चार दिन बाद ही 14 अगस्त 1947 था, जिसने हमारी जिंदगी पूरी तरह बदल दी. मुझे जितना याद है चारों तरफ अफरातफरी मची हुई थी. पाकिस्तान  बन गया और इधर मामा की बेटी की भी शादी हो गई. लेकिन इस बीच जो नहीं हुआ वो ये कि हम कभी अपने घर नहीं लौट पाए. हमारा घर-बार, जमीन-जायदाद सब गुजरांवाला में ही छूट गया था. मेरे पिता गुजरांवाला में पाटीदार थे. यहां हमारा एकमात्र सहारा मामा जी ही थे. हम कुछ दिनों तक पठानकोट में ही रहे. मां बाबा सब वापस गुजरांवाला जाने के लिए बेचैन थे. मां रात-रात भर रोती रहती थीं. बाबा की आंखों में भी सबकुछ गंवा देने का दुख साफ नजर आता था. हमारे गाय-भैंस, खेत सब जो हफ्ता भर पहले हमारा था अब पाकिस्तान में चला गया.

बाबा पाटीदार थे. कुछ महीने की कोशिशों के बाद उन्हें दिल्ली में नौकरी मिल गई और हमारा पूरा परिवार दिल्ली के पंजाबी बाग आ गया. एक हफ्ता पहले लाहौर के गुजरांवाला से पठानकोट आने की बदौलत ही मैं आज यह बता रही हूं. कई महीनों बाद पता चला कि गुजरांवाला में हमारे कई पड़ोसियों के घर लूट पाट हुई और उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा. अगर एक हफ्ता हम गुजरांवाला में और रुक जाते तो ना हम बचते ना हमारी यादें.

(लेखिका विभाजन से पहले लाहौर के गुजरांवाला में रहती थी, अब पंजाबी बाग में रहती हैं)

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