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पुण्यतिथि विशेष चे ग्वेरा: 'आजादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्‍म लेती है'

मरते वक्त चे ने हत्यारे बोलिवियाई सार्जेंट टेरान से कहा था- तुम एक इंसान को मार रहे हो, पर उसके विचार को नहीं मार सकते

Piyush Raj Piyush Raj Updated On: Oct 09, 2017 08:36 AM IST

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पुण्यतिथि विशेष चे ग्वेरा: 'आजादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्‍म लेती है'

अर्नेस्तो चे ग्वेरा एक ऐसा नाम है जिसका नाम आज भी दुनिया के मजलूमों को हौसला देने के लिए काफी है. कई युवाओं, छात्रों और क्रांतिकारियों के लिए चे ग्वेरा आज भी प्रेरणास्रोत हैं. एक क्रांतिकारी के रूप में जो स्थान भगत सिंह का भारत और भारतीय उपमहाद्वीप में है वही स्थान चे ग्वेरा का लैटिन अमेरिका सहित कई महादेशों में है.

हालांकि आज भारत सहित कई देशों के अधिकांश युवा चे ग्वेरा की फोटो वाले टीशर्ट तो पहनते हैं लेकिन यह नहीं जानते कि आखिर चे ग्वेरा थे कौन और उनके विचार क्या थे?

14 जून 1928 को अर्जेंटीना में जन्मे चे ग्वेरा की बोलिविया में गिरफ्तारी के एक दिन बाद 9 अक्टूबर, 1967 को हत्या कर दी गई थी. चे ग्वेरा को जब मारा गया उनकी उम्र 39 साल थी. मरते वक्त चे ने हत्यारे बोलिवियाई सार्जेंट टेरान से कहा था-तुम एक इंसान को मार रहे हो, पर उसके विचार को नहीं मार सकते.

डॉक्टर से एक क्रांतिकारी बने चे ग्वेरा क्यूबा की क्रांति के नायक फिदेल कास्त्रो के सबसे भरोसेमंद साथियों में से एक थे. फिदेल और चे ने सिर्फ 100 गुरिल्ला लड़ाकों के साथ मिलकर अमेरिका समर्थित तानाशाह बतिस्ता के शासन को 1959 में उखाड़ फेंका था.

क्यूबा में क्रांति के बाद मार्च करते फिदेल, चे और राउल अन्य लड़ाकों के साथ (तस्वीर: विकीकॉमन)

क्यूबा में क्रांति के बाद मार्च करते फिदेल, चे और राउल अन्य लड़ाकों के साथ (तस्वीर: विकीकॉमन)

अमेरिकी साम्राज्यवाद को चुनौती देने वाला ‘गुरिल्ला लड़ाका’

चे इसके 6 महीने बाद ही भारत के दौरे पर आए थे. फिदेल ने उन्हें कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार सौंपा था. इसी संदर्भ में वे तीसरी दुनिया खासकर ताजा-ताजा आजाद हुए देशों के साथ क्यूबा के संबंधों को मजबूत करने के उद्देश्य से निकले थे.

अमेरिका ने क्यूबा पर कई तरह के प्रतिबंध लगा दिए थे, ऐसे में क्यूबा ने तीसरी दुनिया के और विकासशील देशों के साथ अपने संबंधों को प्रगाढ़ करने की रणनीति अपनाई थी. ऐसे में अमेरिकी साम्राज्यवाद और पूंजीवाद के खिलाफ वैश्विक एकता की बात करने वाला चे ग्वेरा से बेहतर व्यक्ति कौन होता.

यह भी पढ़ें: जब तक दुनिया में गैर-बराबरी रहेगी मार्क्स के विचारों की जरूरत बनी रहेगी

चे जब भारत आए थे उन्होंने आल इंडिया रेडियो के लिए केपी भानुमति को एक इंटरव्यू दिया था. भारत पूरी दुनिया में गांधी के देश के नाम से मशहूर है और अहिंसा गांधीवाद की विचारधारा का एक प्रमुख सिद्धांत है. दूसरी ओर चे मार्क्सवाद से प्रभावित एक ‘गुरिल्ला लड़ाके’ के रूप में प्रसिद्ध थे.

चे की सबसे बड़ी खासियत थी कि वे किसी भी विचारधारा की कमी और मजबूती को अच्छे से समझते थे. वे यह भी समझते कि हर देश की भौतिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों के अनुसार शोषण के खिलाफ लड़ाई के अलग-अलग रूप हो सकते हैं. चे का साफ-साफ मानना था कि आजादी की लड़ाई भूख से जन्म लेती है.

चे और फिदेल कास्त्रो (तस्वीर: विकीकॉमन)

चे और फिदेल कास्त्रो (तस्वीर: विकीकॉमन)

मैं कम्‍युनिस्‍ट नहीं एक सोशलिस्‍ट हूं 

इसका एक उदाहरण केपी भानुमति को दिए इंटरव्यू में चे के एक जवाब में भी देखा जा सकता है. विचारधारा की बात करते हुए भानुमती ने एक सवाल पूछा कि आप कम्‍युनिस्‍ट माने जाते हैं, कम्‍युनिस्‍ट (साम्‍यवादी) मताग्रह एक बहु-धर्मी समाज में कैसे स्‍वीकार किए जा सकते हैं?

इस पर चे का जवाब यह था: ‘मैं अपने को कम्‍युनिस्‍ट नहीं कहूंगा. मैं एक कैथलिक होकर जन्‍मा, एक सोशलिस्‍ट (समाजवादी) हूं और बराबरी में और शोषक देशों से मुक्ति में भरोसा रखता हूं. मैंने लड़कपन के दिनों से भूख को देखा है, कष्‍ट, भयंकर गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी को भी. क्‍यूबा, विएतनाम और अफ्रीका में ये हालात रहे हैं, आजादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्‍म लेती है. मार्क्‍स-लेनिन के सिद्धांतों में उपयोगी पाठ (संदेश) हैं. जमीनी क्रांतिकारी मार्क्‍स के दिशा-निर्देशों को मानते हुए अपने संघर्षों का रास्‍ता खुद बनाते हैं. भारत में गांधी जी के सिद्धांतों की अपनी जरूरत है, जिन (सिद्धांतों) की बदौलत आजादी हासिल हुई.’

प्यार की गहरी भावना से संचालित सच्चा क्रांतिकारी

चे ने भूख और गरीबी को काफी करीब से देखा था. उन्होंने एक मोटरसाइकिल से पूरे लैटिन अमेरिकी देशों की यात्रा की थी और इन देशों में व्याप्त गरीबी और शोषण को काफी करीब से महसूस किया था. चे ने अपनी इस यात्रा पर एक डायरी भी लिखी थी. जिसे उनकी मौत के बाद द मोटरसाइकिल डायरी के नाम से छापा गया और 2004 में द मोटरसाइकिल डायरीज नाम से एक फिल्म भी बनी.

अक्सर चे के विरोधियों द्वारा उनकी छवि एक हिंसक हत्यारे के रूप में गढ़ी जाती है. लेकिन चे ग्वेरा एक लड़ाके थे जिन्हें दुनिया के शोषितों से प्यार था. उनका कहना था कि एक सच्चा क्रांतिकारी प्यार की गहरी भावना से संचालित होता है.

चे ग्वेरा (तस्वीर: विकीकॉमन)

चे ग्वेरा (तस्वीर: विकीकॉमन)

चे ने इसी भावना के तहत क्यूबा को छोड़ अफ्रीका के कांगो में गुरिल्ला युद्ध सिखाने चले गए. इसके बाद वे बोलिविया में हो रहे संघर्ष में शामिल हुए. जहां अमेरिका समर्थित बोलिविया सरकार की सेना ने हिरासत में उनकी हत्या कर दी. बोलिविया की सरकार ने मौत के बाद पहचान के लिए चे के हाथ काट लिए थे और उनके शव को अनजान जगह पर दफना दिया था. चे के शरीर के अवशेष का पता उनकी मौत के 40 साल बाद 1997 में चला.

चे ने जिस वक्त क्यूबा छोड़ा था तब वो क्यूबा के लोकप्रिय नेताओं में से एक थे और संयुक्त राष्ट्रसंघ में क्यूबा का प्रतिनिधित्व भी कर चुके थे. वे चाहते तो बड़े आराम से क्यूबा सरकार में बड़े ओहदे पर रहते हुए बाकी का जीवन काट सकते थे. लेकिन चे जिसका स्पेनिश भाषा में अर्थ दोस्त या भाई होता है सच्चे अर्थों में दुनिया के गरीबों के दोस्त थे. उन्होंने ओहदे की जगह दोस्ती और भाईचारे को चुना.

आज भले वामपंथ, समाजवाद और साम्यवाद के बेकार और पुराने होने की बात बार-बार बड़े जोर-शोर से कही जा रही हो लेकिन लैटिन अमेरिकी देशों में अगर समाजवाद आज भी एक बड़ी ताकत है तो चे का इसमें अहम योगदान है.

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