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बाघों को बचाने के लिए 'बकरी' जैसी फंडिंग कब तक करेगी सरकार?

टाइगर कंजरवेशन सरकार के एजेंडा में भी काफी ऊपर है. लेकिन फिर भी मौजूदा आंकड़ों को देखकर लगता नहीं कि बाघ को बचाने का काम सही ढंग से चल रहा है

Subhesh Sharma Updated On: Feb 03, 2018 09:39 AM IST

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बाघों को बचाने के लिए 'बकरी' जैसी फंडिंग कब तक करेगी सरकार?

आज दुनिया भर में मौजूद 70 फीसदी बाघ भारत में है. लेकिन बाघ की मौत के मामले भी उसके इसी सबसे 'सुरक्षित' घर में ही सबसे ज्यादा हैं. पिछले दो सालों में बाघों की मौत के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. 2016-2017 में भारत में करीब 237 बाघों की मौत हो चुकी है. 2016 में 122 बाघों की मौत हुई, जोकि 2015 के मुकाबले 50 फीसदी (80 मौतें) ज्यादा है. हालांकि एनटीसीए का कहना था कि 2016 में 98 बाघों की मौत हुई है. वहीं 2017 में भी ये आंकड़े बदतर ही रहे हैं.  2017 में 115 बाघों ने अपनी जान गंवाई है.

एक एक बाघ की जिंदगी बेशकीमती है. ऐसे में बाघों की मौत का सिलसिला कई सवाल खड़े करता है. सवाल उठता है कि बाघों को बचाने के तमाम दावों और संरक्षण के प्रयासों के बावजूद बाघ अपने ही जंगल में सुरक्षित क्यों नहीं है? आखिर बाघों को बचाने की कोशिश में चूक और लापरवाही कहां हो रही है?  टाइगर रिज़र्व्स के नाम पर बाघों के संरक्षण का सेहरा बांधने वाली राज्य सरकारों की कमजोर इच्छाशक्ति साफ तौर पर जिम्मेदार दिखाई देती है.

देश में टाइगर कंजरवेशन को लेकर कई मुहिम चलाई जा रही हैं. टाइगर कंजरवेशन सरकार के एजेंडा में भी काफी ऊपर है. लेकिन फिर भी मौजूदा आंकड़ों को देखकर लगता नहीं कि बाघ को बचाने का प्रयास सही तरीके से हो रहा है. हाल ही में भारत और पड़ोसी देश नेपाल, भूटान और बांग्लादेश ने टाइगर की संख्या का पता लगाने के लिए ज्वाइंट सेंसस का भी फैसला किया है. लेकिन इन सारी कवायदों के बावजूद देश के राष्ट्रीय पशु को बचाने में सभी कोशिशें नाकाफी ही नजर आ रही हैं.

देश में 50 टाइगर रिज़र्व्स फिर भी बाघ हैं बेहाल

आज देश में बाघों को बचाने के लिए तकरीबन 50 टाइगर रिजर्व्स हैं. खास बात ये है कि बाघों की असुरक्षा के मामले इन रिजर्व्स के आसपास ही ज्यादा बढ़ रहे हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो 54 टाइगर्स की मौत रिजर्व के बाहर हुई है जो कुल मौतों का 47 फीसदी है. बात एक बार फिर वहीं आकर अटक गई है कि क्या रिजर्व के बाहर का टाइगर सरकार और अधिकारियों के लिए 'टाइगर' नहीं है. बार-बार ये सवाल खड़ा हो रहा है कि इनकी सुरक्षा के लिए क्या किया जा रहा है?

फोटो सौजन्य: आसिफ खान

फोटो सौजन्य: आसिफ खान

हालांकि इस सवाल का जवाब आज भी किसी के पास नहीं है. वाइल्ड लाइफ कंजरवेश्निस्ट ए.जी. अंसारी ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया कि हाल फिलहाल में रिजर्व से बाहर के बाघों को बचाने के लिए कुछ खास नहीं हुआ है. लेकिन कंजरेश्निस्ट एनटीसीए (नेशनल टाइगर कंजरवेशन ऑथोरिटी) से लगातार बजट की मांग कर रहे हैं. जबकि सच्चाई ये है कि रिजर्व के बाहर के बाघों को बचाने के लिए तुरंत कोई पॉलिसी बनने के आसार कम ही हैं.

हाल ही में एनटीसीए की उच्च स्तरीय बैठक हई है. जिसमें बाघों की जनजीवन क्षेत्र में  दखल को लेकर चर्चा भी हुई है. माना जा रहा है कि रिहाइशी इलाकों में बाघों को रोकने के लिए एनटीसीए एक नीति तैयार कर रहा है, जिसे आने वाले छह महीनों में अमल में लाया जा सकता है.

कहा ये भी जा रहा है कि उत्तराखंड में अब जल्द ही टाइगर रिजर्व की सीमा से लगे वन क्षेत्रों को भी फंडिंग मिल सकती है. एनटीसीए इस बारे में गंभीरता से विचार कर रहा है. एनटीसीए का मानना है कि रिजर्व से लगे इन वन क्षेत्रों में बाघों की अच्छी-खासी आबादी है. लेकिन फंडिंग की कमी की वजह से रिजर्व के बाहर के बाघों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हो पाते हैं.

मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा बाघों की मौत

मध्य प्रदेश में बाघों की अच्छी खासी आबादी है. यहां दावा किया जाता है कि  यहां बाघ तेजी से बढ़ रहे हैं. लेकिन यहां की जमीनी सच्चाई कुछ और ही बयां करती है. मध्य प्रदेश में पिछले 13 महीनों में 33 बाघों की मौत हुई है. मौत का ये आंकड़ा दूसरे राज्यों की तुलना में सबसे ज्यादा है. एनटीसीए के मुताबिक ही 2016 में भी मध्य प्रदेश में 31 बाघों की मौत हुई थी. ऐसे में दो साल में साठ से ज्यादा बाघों की मौत पर राज्य सरकार की  जवाबदेही बनती है.

Tiger-Death

एमपी के बाद बाघों की मौत के सबसे ज्यादा मामले महाराष्ट्र (21) और उत्तराखंड (17) में सामने आए हैं. 2017 में हुई 115 मौतों में 55 फीसदी मौतों के लिए ये तीन राज्य ही जिम्मेदार हैं. एनटीसीए के मुताबिक, मध्य प्रदेश सूची में सबसे ऊपर (27 बाघों की मौत) है. इसके बाद महाराष्ट्र में 21 और उत्तराखंड में 17 बाघों की मौत हुई है.

सड़क दुर्घटना और करंट से मर रहे हैं बाघ

बाघों के साथ भी राज्य सरकारें विस्थापित और शरणार्थी वाला बर्ताव करती हैं. जो बाघ रिज़र्व के बाहर होते हैं उनकी सुरक्षा के लिए सरकार के पास न तो संवेदनाएं हैं और न ही सुरक्षा की कोई ठोस योजना. एनटीसीए ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत में बताया कि ये बात सही है कि 2017 में ज्यादातर रिज़र्व से बाहर के बाघों की मौत हुई है. उन्होंने ये भी साफ किया कि बाघों की मौत के लिए सिर्फ पोचिंग ही जिम्मेदार नहीं है. क्योंकि कई बाघों की मौत सड़क पर वाहनों की चपेट में आने से, ट्रेन की चपेट में आने से और बिजली का झटका लगने से भी हुईं हैं.

मध्यप्रदेश में पिछले कुछ समय में करंट लगने से कई बाघों की जान गई है. इस पर एनटीसीए के अधिकारी ने कहा कि 'हमने इन मामलों की जांच करने के लिए एक टीम बनाई है. जिसने ग्राउंड लेवल पर स्थिति का जायजा लिया है. हम इस तरह की घटनाओं को कम करने के विकल्प खोज रहे हैं. हमारे पास रिपोर्ट्स हैं, हम जल्द ही इस समस्या का हल ढूंढ निकालेंगे. इसके लिए हम 'कंसर्न टाइगर रिजर्व मैनेजमेंट' बना रहे हैं'.

Photo Source: NTCA

Photo Source: NTCA

रिज़र्व के अंदर टाइगर जितने सुरक्षित हैं, रिजर्व के बाहर उनकी जान को उतना ही खतरा है. इन बाघों की सुरक्षा को लेकर एनटीसीए ने कहा है कि 'हम प्लान कर रहे हैं. राज्य सरकारों से फंड को लेकर हम संपर्क में हैं. हम ये बात रख रहे हैं कि जिन इलाकों में रिजर्व के बाघ ज्यादा असुरक्षित हैं, उन इलाकों के रिजर्व के बाहर के हिस्से को रिजर्व में शामिल कर लिया जाए. साथ ही हम ये भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि रिजर्व के बाहर के टाइगर के लिए उचित फंड की व्यवस्था हो.

क्या कोई पॉलिसी आने वाली है

एनटीसीए ने बताया कि बाघों के संरक्षण के लिए उनके पास पहले से ही कई नीतियां हैं. शिकार को कम करने के लिए उनके पास स्टेंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) हैं. एनटीसीए के मुताबिक,  'जब भी किसी बाघ की मौत होती है, तो हम उसकी पूरी जांच करते हैं, मौके पर स्थिति का कैसे सामना करना है. हम ये सब प्लान करते हैं. हम वन विभाग से रिपोर्ट भी लेते हैं कि आखिर मौत की वजह क्या है. और खुद से भी कई प्रयास करते हैं. हम वन विभाग से हर हाल में एसओपी को फॉलो करने को कहते हैं. साथ ही पोचिंग के अलावा जिन अन्य कारणों से बाघों की मौत होती है, उनको लेकर भी हम चर्चा कर रहे हैं. इसके लिए हम रेलवे और ट्रांसपोर्ट विभाग से भी बात कर रहे हैं'.

कॉरिडोर्स कैसे होंगे बेहतर

आज वाइल्डलाइफ की राह में सबसे बड़ा कांटा सिकुड़ते कॉरिडोर हैं. कॉरिडोर न होने की वजह से जंगली जानवर इंसानी बस्तियों में आ जाते हैं. एनटीसीए की ओर से कहा गया है कि हम कॉरिडोर्स की समस्या को लेकर गंभीर हैं. कॉरिडोर को लेकर कुछ नया नहीं है. लेकिन WII (वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया) ने एनटीसीए की मदद से 'कॉरिडोर कनेक्टिंग टाइगर्स' प्लान तैयार किया था.

corbett tiger

हम इसी प्लान पर फोकस कर रहे हैं और कॉरिडोर्स को और मजबूत करने की बात चल रही है'.

बहरहाल बाघ देश की शान हैं. ये बेजुबान अपनी बात कह नहीं सकते. इनकी मौत की खबरें सिर्फ आंकड़ों को बढ़ाने का काम कर रही हैं. ऐसे में जरूरी ये है कि टाइगर रिजर्व्स के बाहर भटकते बाघों को बचाने के लिए रिजर्व्स का दायरा बढ़ाया जाए ताकि बाघों को अपने ही घर से बेघर न होना पड़ा. इसके लिए जरूरी है कि फंडिंग ऐसी न हो ताकि लगे कि बाघ की जगह बकरी बचाने की कोशिश की जा रही है.

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