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टिंडर डेट नहीं, अनजान लोगों के साथ रात भर पार्टी है दिल्ली का नया चलन

अगर आपको लगता है कि ऑनलाइन या किसी ऐप के ज़रिए लोगों से मिलना नया चलन है तो थोड़ा ठहर जाइए, बड़े-बड़े शहरों में एक नया चलन आ गया है. अब लोग सीधे बिल्कुल अजनबी लोगों के साथ मिलते हैं, पार्टी करते हैं

Updated On: Sep 08, 2018 09:36 AM IST

Animesh Mukharjee Animesh Mukharjee

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टिंडर डेट नहीं, अनजान लोगों के साथ रात भर पार्टी है दिल्ली का नया चलन

आपने स्कूट का नाम सुना है? शायद नहीं. टिंडर तो पता ही होगा! चलिए हम नहीं पूछेंगे, 'क्या आप टिंडर करते हैं?' अगर आपको लगता है कि ऑनलाइन या किसी ऐप के ज़रिए लोगों से मिलना नया चलन है तो थोड़ा ठहर जाइए, बड़े-बड़े शहरों में एक नया चलन आ गया है. अब लोग सीधे बिल्कुल अजनबी लोगों के साथ मिलते हैं, पार्टी करते हैं, ऐसी बहुत सी बातें साझा करते हैं जो किसी बहुत खास दोस्त से भी अक्सर साझा नहीं की जाती हैं.

स्कूट-पार्टी, ये शब्द ऑनलाइन या ब्लाइंड डेटिंग को एक नए स्तर पर लेकर गया है. स्कूट क्या है और उसकी ये पार्टियां कितनी खास हैं उसपर भी बात करेंगे पहले कुछ बातें समझते हैं. तमाशा फिल्म में वेद (रणबीर) तारा (दीपिका) से कॉर्सिका में मिलता है. दोनों बिलकुल अजनबी होते हैं. वेद वहां डॉन होता है और तारा वहां मोना डार्लिंग होती हैं आगे क्या हुआ उसे छोड़ देते हैं. हमारा इरादा आपको फिल्म की कहानी सुनाने का नहीं है.

तमाशा मिलेनियल कहलाने वाली पीढ़ी की एक बहुत खास बात को सामने लाती है. हम सब एक से ज़्यादा पहचान रखने वाले लोग हैं. हम फ़ेसबुक पर अलग, ऑफ़िस में कुछ और, मां-बाप के सामने कुछ, गर्लफ्रेंड के साथ कुछ और ससुराल में न जाने क्या हैं. इन सारी पहचानों के आपस में मिल जाने का डर और इन सारी पहचानों के एक दूसरे से टकराने का डर हम सबको होता है. लेकिन हम सब के अंदर एक मोना डार्लिंग या वेद होता है, जिसे कुछ देर के लिए महज एक प्रॉडक्ट मैनेजर की पहचान नहीं चाहिए होती है. और हां! बाद में सब कुछ छिपाना भी होता है, क्योंकि कॉर्सिका शहर के अंदर जो भी हुआ वो उस शहर के अंदर ही छूट जाता है.

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स्कूट का मंत्र है, पार्टी विद द स्ट्रेंजर्स. दिल्ली में ऐसी पार्टियां अमूमन दक्षिण दिल्ली के हौजखास, वसंतकुंज, साकेत और मालवीयनगर जैसे इलाकों में होती हैं. कभी-कभी ये मौके दिल्ली-एनसीआर के दूसरे इलाकों में भी आते हैं लेकिन साउथ दिल्ली के एलीट लोगों के लिए कहीं और जाना थोड़ा मुश्किल होता है.

क्या है स्कूट पार्टी

आपको स्कूट की वेबसाइट, फेसबुक पेज वगैरह के ज़रिए एक फॉर्म भरना पड़ता है. इसमें कई जानकारियां मांगी जाती हैं. आपके सोशल मीडिया के व्यवहार और तमाम दूसरी चीज़ों को जांचा परखा जाता है. इसके बाद आपको बुलावा मिलेगा या नहीं तय होता है. हर वीकएंड कहीं न कहीं पार्टी होती है. स्कूट पार्टी के मेजबान को संभावित लोगों की जानकारी देता है. इनमें से जिन्हें मेजबान हां कहता है वे लोग शामिल हो सकते हैं. एक पार्टी में शामिल होने का खर्च 1000 से 1500 के बीच में होता है. इसके बदले में खाना और शराब (बिना किसी बंदिश के) मिलती है. पार्टी रात 9-10 बजे शुरू होकर सुबह 5-6 बजे तक चलती है. शामिल होने वालों में लड़के लड़की का अनुपात लगभग 6-4 का होता है.

क्या दिल्ली में सेफ है?

दिल्ली शहर में किसी अजनबी के घर पूरी रात रहना. इसके बाद पहला सवाल दिमाग में आता है कि क्या यह सुरक्षित है? हमने यही सवाल सबसे पहले पार्टी में शामिल लड़कियों से पूछा. उनका कहना था कि थोड़ा सा डर तो लगा लेकिन उससे ज्यादा एडवेंचर का खयाल आया. स्कूट के लोगों से बात करने पर उन्होंने बताया कि स्कूट की तरफ से कम से कम एक शख्स हर पार्टी में होता है. उसका काम लोगों पर निगाह और पार्टी का जोश दोनों बनाए रखना होता है. मेजबान को कुछ बातें बताई जाती हैं. अगर कोई ज़्यादा शराब पीता है या बहकता है तो उसे रोका जाता है, साथ ही कुछ देर के लिए बाकियों से अलग कर दिया जाता है. ज़्यादातर मामले ऐसे ही सुलझ जाते हैं इसके बाद भी स्थिति नहीं सुधरती तो उसे कैब करके वापस भेज दिया जाता है.

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सुरक्षा की सारी बातों के बाद भी इस पूरे खेल में एक अलग किस्म का डर है. इसके साथ ही इसमें आज़ादी भी है. ऐसी पार्टियों में आने वाले लोग तमाम लोग अपने निजी संबंधों के बारे में, अपनी छिपी हुई इच्छाओं के बारे में सबकुछ बता सकते हैं और सुबह इसे किसी सपने की तरह भूल सकते हैं. इन सबके बीच एक प्लेटफॉर्म मौजूद है जो कुछ सीमाएं बनाए रखने की ज़िम्मेदारी लेता है. कुल मिलाकर यह बंजी जंपिंग जैसा कुछ अनुभव होता है जहां आप एक सीमा तक जाकर खतरे का मज़ा लेते हैं और आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी कोई और लेता है.

60 पर्सेंट पल्यूशन की वजह दिल्ली-एनसीआर में ही है. इसमें ट्रांसपोर्ट, सड़कों पर धूल, कंस्ट्रक्शन साइटों पर धूल, खुले में कूड़ा जलाना, डोमेस्टिक बायोमास, इंडस्ट्री से निकलने वाला धुंआ और डीजी सेट्स शामिल हैं.

कितनी लोकप्रिय हैं ये पार्टियां

ये चलन नया है, हिस्सा लेने वाला तबका बहुत बड़ा नहीं है. लेकिन ये चलन जल्द ही आपको देश के हर बड़े शहर में दिखाई देगा. बड़े शहर में ही इसलिए क्योंकि यहां अगले दिन पहचान छिपाकर भीड़ में गुम हो जाना आसान है. यहां अधिकतर बाहर से आए लोग हैं जिनकी जड़ें तलाशना आसान नहीं होता. हो सकता है पार्टी में हॉटपैंट और टैंक टॉप में बीयर पीने वाली लड़की अपने परिवार की कथित 'संस्कारी बहु/बेटी' हो. एक पिताजी की दुकान देखने वाला आदर्श बेटा हो जिसे किसी दिन कुछ डेयरिंग करना हो. ये सब पूरी रात के लिए महज 1000 से 1500 रुपए में. जितने पैसे में आपको दक्षिण दिल्ली का कोई बार 3-4 घंटे भी नहीं बैठाएगा.

स्कूट से जुड़े सोमवीर इन पार्टियों का एक और पहलू बताते हैं. साल्सा, योगा, वाइन टेस्टिंग जैसी चीज़ें सिखाने वाले लोग या पेंटिग जैसे प्रोफेशन से जुड़े लोग भी ऐसी पार्टियों से जुड़ते हैं, उनकी मेजबानी करते हैं. ज़ाहिर सी बात है कि इन लोगों को यहां एक बिल्कुल नया ग्राहकवर्ग मिल सकता है. इसके साथ ही जो पार्टी की मेजबानी करता है वो भी फायदे में रहता है. एक पार्टी में 15 से 20 लोग तक होते हैं. इसमें से 60 प्रतिशत तक खाने-पीने में खर्च हो जाता है, बाकी में कुछ हिस्सा कंपनी रखती है और बचा हुआ मेजबान को मिल जाता है.

इस पार्टी में आए लोगों से हमने उनके अनुभव के बारे में पूछा. लगभग सभी का कहना था कि वो काफी अच्छा महसूस कर रहे हैं. लोग बिल्कुल अनजान लोगों के साथ नाच-गा रहे थे. एक दूसरे से (समान और विपरीत लिंग दोनों में) गले लग रहे थे. मगर इसके बाद शायद ही किसी ने एक दूसरे को याद किया हो.

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अगर आपको अभी भी ये अजीब लग रहा हो तो फेसबुक के बारे में सोचिए. स्मार्ट फोन आने से पहले लोग फेसबुक वाले दोस्तों को वास्तविक जीवन में नहीं लाते थे. आज हम सबके खाते में ऐसे तमाम लोग हैं जिनके बारे में हमने सबसे पहले सोशल मीडिया से ही जाना. इसी तरह टिंडर से डेट पर जाना या मेट्रीमोनियल वेबसाइट से रिश्ता देखना भी आम होता जा रहा है. रही बात सुरक्षा की तो उसके लिए कुछ बातें समझ लीजिए. भारत सहित तमाम देशों में महिला या किसी भी तरह की सुरक्षा का खतरा दो कारणों से होता है.

एक तो हमें पहले से सिखाया  नहीं जाता कि अपने से अलग लोगों से कैसे पेश आना है. दूसरा हमें अक्सर डर नहीं होता. उदाहरण के लिए लोग ट्रेन में थूकते हैं, कूड़ा फैलाते हैं मगर मेट्रो या फ्लाइट में ऐसा नहीं करते. ठीक ऐसी ही स्कूट पार्टियां पहले से आपकी हद बता देती हैं, ऊपर से बहिष्कार का डर भी होता है. इन सबके बाद भी एक हद तक अनिश्चितता बनी रहती है, यही तो खेल का रोमांच है.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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