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संभल जाइए! सेल्फी लेना शौक नहीं एक गंभीर रोग है

सेल्फी के चक्कर में सेल्फिश होते लोग.

Updated On: Jul 11, 2017 07:24 PM IST

Ankita Virmani Ankita Virmani

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संभल जाइए! सेल्फी लेना शौक नहीं एक गंभीर रोग है

सेल्फी सिर्फ खुद से खींची गई एक तस्वीर नहीं बल्कि एक बीमारी है. बीमारी वो भी ऐसी जो फैलती भी हैं और जान भी ले लेती है.

कैमरे के आगे आड़े-टेढ़े मुंह बनाए कभी रेलवे की पटरी पर तो कभी पानी के बीच चलती नाव पर, कभी पहाड़ की चोटी पर तो कभी ताजमहल की सीढ़ियों पर. कभी हाथ में डंंडी (सेल्फीस्टिक) पकड़े तो कभी हाथ को ही डंडी बनाए.

इंसान के स्मार्ट होने से पहले फोन स्मार्ट हो गया और बन गया मुसीबत की वजह. आज की तारीख में हम जो कुछ भी करते है वो सिर्फ सेल्फी के लिए करते है. पागलपन की हर सीमा तक सिर्फ सेल्फी. हम घूमने जाते है सेल्फी के लिए, किसी प्रोटेस्ट में जाते है तो भी सेल्फी के लिए यहां तक किसी के शोक का हिस्सा भी बनते है तो भी सिर्फ सेल्फी के लिए. बच्चे के स्कूल का पहला दिन हो या शादी का मंडप, सेल्फी के बिना सब अधूरा.

ये सेल्फी ना जगह देखती है ना माहौल, ना पटरी पर दौड़ती ट्रेन देखती है ना नदी का फिसलता किनारा, बस बनाया मुंह और ले खचैक खचैक.

सेल्फी से बढ़ते हादसे

एकदम ताजा मामला महाराष्ट्र के नागपुर का है जहां सेल्फी के चक्कर में 8 लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी. दरअसल ये लोग नागपुर की वेना झील में नाव से घूम रहे थे, जब वो नाव पर खड़े हो सेल्फी लेने लगे. नाव का संतुलन बिगड़ा और नाव पलट गई. ये कोई पहला ऐसा मामला नहीं जहां सेल्फी के चक्कर में हुई लापरवाही से जान से हाथ धोना पड़ा हो.

कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी और इन्द्रप्रस्थ इंस्टीटयूट आॅफ इंफारमेशन, दिल्ली की एक स्टडी के मुताबिक 2 सालों में सेल्फी से होने वाली मौतों में सबसे ज्यादा मौतें भारत में हुई हैं.

Me, Myself and My Killfie: Characterizing and Preventing Selfie Deaths

साल 2014 में दर्ज की गई 127 सेल्फी मौतों में से 76 अकेले भारत में थी. रिसचर्स ने ट्विटर पर पोस्ट हुई हजारों सेल्फियों से यह भी पाया कि महिलाओं के मुकाबले पुरुष ज्यादा खतरनाक सेल्फी लेते हैं.

दुनिया भर में सेल्फी द्वारा हुई मौतों में से सबसे ज्यादा हादसे पहाड़ की चोटी या बिल्डिंग के टॉप पर सेल्फी लेते हुए दर्ज की गई. दूसरा मुख्य कारण चलती ट्रेन के आगे सेल्फी लेते हुए रिपोर्ट किए गए.

क्या है सेल्फी? कहां से आया सेल्फी?

सेल्फी शब्द वैसे तो साल 2013 में आक्सफॉर्ड डिक्शनरी में अपनी जगह बना चुका है पर कहां से, कौन से देश से आया ये कहना बड़ा मुश्किल है.

राजनेताओं से लेकर फिल्मस्टार तक, दिग्गजों से लेकर आम इंसान तक हर काई बस बन गया सेल्फी का फैन.

अमेरिकन साइकेटरिक एसोसिएशन सेल्फी लेने की आदत को मानसिक डिसऑर्डर घोषित कर चुका है. संवेदना सोसाइटी आॅफ मेंटल हेल्थ के डॉ एस.त्यागी कहते हैं कि कोई भी चीज नॉर्मल से ज्यादा या अलग हो जाए तो वो अबनार्मल हो जाती है और सेल्फी उन्हीं चीजों में से एक है.

डॉ त्यागी कहते हैं कि ऐसे लोग जो दिनभर सेल्फी लेते हैं और सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं वो दरअसल दूसरे से अपने बारे में कुछ कहलवाना चाहते हैं. अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं. ये पर्सनैलिटी डिसऑर्डर जैसा है. सेल्फी के जरिए लोग अपनी पहचान ढूंढ रहे हैं और ये अच्छा नहीं है.

सेल्फी खींचकर लोग सोशल मीडिया पर डालते हैं और इंतजार करते हैं कि कितने लोगों ने उनकी सेल्फी पर लाइक या कमेंट किया.

सेल्फी वाली इस जनरेशन के कुछ अजीबोगरीब किस्से

क्या सेल्फी इस तरह सिर चढ़कर बालने लगी है कि भावनाएं, जज्बात खत्म हो चुके हैं? क्या असल जिंदगी से ज्यादा महत्वपूर्ण वर्चुअल जिंदगी हो गई है.

हाल में ही एक मामला सामने आया था जहां यूपी में कुछ महिला सिपाही अस्पताल में भर्ती एसिड अटैक शिकार लड़की के साथ सेल्फी ले रही थी.

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कुछ समय पहले एक सेल्फी और वायरल हुई. जिसमें एक लड़के ने अपने अंकल के मृत शव के साथ सेल्फी ली और सोशल मीडिया पर डाल दी. किसी ने अंतिम संस्कार की सेल्फी पोस्ट की तो किसी ने अंतिम यात्रा की.

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क्या हम सेल्फी के चक्कर में इतने सेल्फिश हो गए हैं? क्या सहानूभूति, संवेदना हमारे अंदर से खत्म हो चुकी है?

यकीन मानिए सेल्फी ने आपको सेल्फिश बना दिया है. दूसरों की भावनाओं की कदर करना या ना करना आपका निजी फैसला और पसंद है पर कम से कम खुद का तो ख्याल कीजिए.

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