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करोड़ो दिलों पर राज करने वाले ग़ालिब को गूगल डूडल ने किया याद

आज यानी 27 दिसंबर को मिर्जा ग़ालिब का 220वां जन्मदिन है. इस खास दिन को सेलिब्रेट करते हुए गूगल ने ग़ालिब साहब का एक खास डूडल बनाया है

Updated On: Dec 27, 2017 12:55 PM IST

FP Staff

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करोड़ो दिलों पर राज करने वाले ग़ालिब को गूगल डूडल ने किया याद

आज यानी 27 दिसंबर को मिर्जा ग़ालिब का 220वां जन्मदिन है. इस खास दिन को सेलिब्रेट करते हुए गूगल ने ग़ालिब साहब का एक खास डूडल बनाया है. असद-उल्लाह बेग खां उर्फ गा़लिब का जन्म 27 दिसंबर 1796 में आगरा के उत्तर प्रदेश में हुआ.

अपनी शायरी के जरिए करोड़ों दिलों पर राज करने वाले मिर्जा साहब एक ऐसे शायर थे जो खड़े-खड़े शेर लिख देते थे. इस बात का उदाहरण उनकी जिंदगी से जुड़े एक किस्से से मिल सकता है.

दरअसल हिन्दुस्तान में बहादुर शाह जफर के शासनकाल के समय जौक शाही कवि थे और इस नाते उनका एक अलग रुतबा भी था. इधर मिर्जा ग़ालिब की भी हर गली कूचे में चर्चा थी. कहते हैं कि इस वजह से जौक और ग़ालिब में कभी नहीं बनती थी.

एक दिन बाजार में ग़ालिब के पास से जौक का काफिला निकला. तब ग़ालिब ने कहा 'बना है शाह का मुसाहिब, फिरे है इतराता. ये बात बादशाह तक पहुंच गई. ग़ालिब दरबार में पेश हुए और कहा कि ये उनके गजल की एक पंक्ति थी. इस पर बादशाह ने उनसे पूरी गजल सुनाने को कहा तब गालिब ने खड़े- खड़े ये पूरी गजल बनाकर सुनाई

वो चीज़ जिसके लिए हमको हो बहिशित अज़ीज़ सिवाय बाड़ा एगुलफाम ए मुश्कबू क्या है ?

पियूं शराब अगर .खम भी देख लू दो चार यह शीशा ओ क़दह कूज़ा ओ सुबो क्या है ?

रही ना ताक़त-ए-गुफ़तर, और अगर हो भी तो किस उम्मीद पे कहिए के आरज़ू क्या है ?

बना है शाह का मुसाहिब, फिरे इतराता वागरना शहर में 'ग़ालिब' की आबरू क्या है ?

ग़लिब की एक खास बात ये थी वो किसी एक रंग या एक अहसास से बंधे नहीं थे. वे शायद इकलौते ऐसे शायर हैं जिनका कोई न कोई शेर जिंदगी के हर पहलू से जोड़ा जा सकता है. इस खास मौके पर पेश है मिर्जा ग़ालिब का ये खास शेर

रख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ग़ालिब, कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था

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