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मीडिया की सख्त पहरेदारी योगी को और मजबूत न बना दे!

मीडिया की लगातार आलोचना से और मजबूत बन कर निकल सकते हैं योगी आदित्यनाथ

Updated On: Mar 24, 2017 08:22 AM IST

Sreemoy Talukdar

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मीडिया की सख्त पहरेदारी योगी को और मजबूत न बना दे!

इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अक्सर विवादों में रहने वाले योगी आदित्यनाथ अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गए हैं तो उन्हें लेकर सामान्य से कुछ ज्यादा मीडिया कवरेज भी होगा.

पहले से ही सोशल मीडिया पर ऐसे जोक्स की भरमार है जिसमें इस बात का जिक्र है कि कैसे कम से कम 2019 तक सारे टीवी स्टूडियो दिल्ली से लखनऊ रिलोकेट कर सकते हैं. अगर इसे गंभीरता से लें तो वास्तविकता में ये बातें सूबे के नए मुख्यमंत्री के लिए अच्छी हो सकती हैं.

योगी आदित्यनाथ को लेकर पुरानी (मुख्य रूप से अंग्रेजी) मीडिया का अचानक इस कदर मनोग्रस्त होना इस बात का भी संकेत हो सकता है कि किसी मिथक को जन्म देने की अपनी ही कोशिशों के कहीं वो शिकार न बन जाएं.

गोरखपुर से पांच बार विधायक रह चुके योगी आदित्यनाथ को कट्टर, मुस्लिमों से घृणा करने वाला और जहर उगलने वाला हार्डलाइनर बताने वाले मीडिया को अब खुद के स्टैंड को सही साबित करने की प्रतिबद्धता है.

हाल ही में एक संपादक ने तर्क दिया था कि यूपी में मीडिया खुद विपक्ष की भूमिका में आने को एक नैतिक मजबूरी मान रही है.

मीडिया दरअसल उस खाली जगह की भरपाई करने की कोशिश में है जो बीजेपी के राजनीतिक विरोधियों के चुनाव में औंधे मुंह गिरने के बाद से खाली पड़ी हुई है.

सिर्फ उग्र हिंदुत्व के कारण ही मीडिया नहीं कर रहा आलोचना

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(प्रतीकात्मक तस्वीर)

जो भी हो, योगी आदित्यनाथ के प्रति मीडिया की ऐसी गहन समीक्षा से उनका एक नहीं कई तरीके से फायदा ही होने वाला है. अव्वल तो ये कि इस गहन समीक्षा ने भगवा धारण करने वाले कट्टर नेता को लेकर पहले ही कई दिलचस्प विरोधाभासी संदर्भों को उजागर किया है. अब यह साफ हो चला है कि उग्र हिंदुत्व का मुखौटा होना ही योगी आदित्यनाथ की आलोचना की पूर्ण वजह नहीं है.

पूर्वी यूपी में योगी आदित्यनाथ की विधानसभा सीट गोरखपुर में मुस्लिमों की आबादी भी कम नहीं है. ऐसे में गोरखपुर विधानसभा सीट से लगातार पांच बार चुना जाना, वो भी तब जब सूबे में बीजेपी की राजनीतिक जमीन मजबूत नहीं थी.

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ये बात अपने आप में इसकी तस्दीक करती है कि योगी आदित्यनाथ की शख्सियत सिर्फ उनके कट्टर बयानों तक ही सीमित नहीं है. राष्ट्रीय मीडिया में उनकी छवि एकतरफा सोच रखने वाले और किनारे में पड़े ऐसे नेता की रही है जिनकी सुर्खियां बटोरने की क्षमता उनके हास्यास्पद बयानों तक सीमित रही है.

बहुत हद तक उनकी अमानवीय छवि बनने के पीछे उनके भेदभाव बढ़ाने वाले बयानों का योगदान रहा है. ऐसे कई मुस्लिम विरोधी बयान हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. लेकिन अगर ये किसी निहित संघर्ष की ओर इशारा करते हैं तो इसमें मीडिया की नाकामी है कि उन्होंने इन बयानों में सुर्खियों के पीछे का सच नहीं देखा.

आदित्यनाथ का मुख्यमंत्री पद तक पहुंचना इन बातों का फिर से समीक्षा किए जाने की मांग करता है. उन्हें लेकर आलोचनाओं की कमी नहीं है. लेकिन उनके मानवीय पहलुओं को आगे लाने की भी होड़ देखी जा रही है. उनके बयानों को संदर्भों से जोड़ कर देखा जा रहा है.

उनकी छवि को कई आयाम देने की कोशिश भी हो रही है. यहां तक कि चुनावों में उनकी जीत की वजह भी बताई जा रही है. अगर पहले उनकी छवि हास्यास्पद थी तो अब नए सिरे से उन्हें परिभाषित करने की कोशिश हो रही है.

योगी के कामों पर हो ध्यान केंद्रित

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नरेंद्र मोदी के साथ योगी आदित्यनाथ

इन परस्पर विरोधी धारा के बीच बुद्धिमानी इसी बात में है कि हम इस बात पर ध्यान केंद्रित करें कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ क्या कहते हैं? क्या करते हैं? और क्या वो चुनावी वादों के प्रति वफादार रह पाते हैं?

सियासी उठापटक और आदर्शों के लगातार पाला बदलने की कोशिशों के बीच, आदित्यनाथ की नीतियां और उनपर अमल करने की गति ही भविष्य में उनकी पार्टी और यहां तक कि भारतीय सियासत की भी दिशा तय करेगी.

मंगलवार को लोकसभा में अपने भाषण के दौरान गणित से ग्रेजुएशन करने वाले इस योगी ने यूपी से अराजकता और अपराध को मिटाने की कसम खाई. उन्होंने भरोसा दिलाया कि उनका राज्य भ्रष्टाचार मुक्त होगा. महिलाओं के लिए सुरक्षित होगा. और वो हर मुमकिन इस बात की कोशिश करेंगे कि राज्य में ऐसे अवसर पैदा हों जिससे युवाओं का पलायन रूक सके.

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि वो गोरखपुर मॉडल को अमल में लाएंगे. जहां पिछले 5 वर्षों में एक भी दंगे नहीं हुए. जबकि उसी दौरान पूरे यूपी में 403 सांप्रदायिक दंगों की घटनाएं घटीं.

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उन्होंने सभा में कहा, 'आप देखते रहिए..वहां पर बहुत कुछ बंद होने जा रहा है'. इससे पहले की रिपोर्ट इस बात की ओर इशारा करती है कि मुख्यमंत्री काम में कोई कोताही नहीं बरतते. वो अपनी कही हुई बातों और चुनाव में किए गए वादों को हकीकत में बदलने के लिए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं. सूबे में बूचड़खानों को बंद करने को लेकर काफी सक्रियता है.

बूचड़खानों को बंद करने की बात बीजेपी ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में भी शामिल किया था. पार्टी का मानना है कि इन बूचड़खानों को बंद करने से राज्य में डेरी उद्योग जो दयनीय स्थिति में है, उसकी हालत सुधरेगी. यही नहीं बुधवार को मुख्यमंत्री ने फौरन गाय की तस्करी पर पाबंदी लगाने का आदेश दिया. तो इस मामले पर जीरो टॉलरेंस की बात भी कही.

इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ने यूपी में वीआईपी कल्चर के खिलाफ भी आदेश जारी किया. उन्होंने सभी मंत्रियों के कार के ऊपर लाल बत्ती लगाए जाने पर रोक लगा दी. इंडिया टुडे में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक कार एसेसरी की दुकान के मालिक ने कहा कि समाजवादी पार्टी की सरकार के दौरान, 'हर सप्ताह कम से कम 10 लोग गाड़ियों पर हूटर, सायरन और समाजवादी पार्टी का झंडा लगवाने पहुंचते थे'.

चुनावी घोषणा पत्र में शामिल एक और वादे को भी साकार करने की कोशिश तेज हो गई है. एंटी रोमियो स्कॉड पूरे सूबे में फैल गया है. ताकि महिलाओं को सुरक्षा दी जा सके. हालांकि, ऐसे कदम उठाने को लेकर हमेशा से ‘मॉरल पुलिसिंग’ और निगेहबानी बढ़ने का जोखिम बना रहेगा.

प्रशासन चुस्त करना है योगी का लक्ष्य: जाविद अहमद

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(तस्वीर न्यूज़ 18 से साभार)

यूपी पुलिस के प्रमुख जाविद अहमद ने न्यूज चैनल एनडीटीवी से कहा, 'योजना सार्वजनिक जगहों को अपने नियंत्रण में लेना है और उन्हें महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाना है'. साथ ही उन्होंने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें राज्य में कानून व्यवस्था को मजबूत करने संबंधी योजना के साथ सोमवार को मिलने को कहा है.

इन कार्रवाई के जरिए जहां सूबे में कानून के राज को वापस लौटाने की कोशिश की जा रही है वहीं प्रशासन को जिम्मेदार बनाया जा रहा है. योगी की सादगी उनके कैबिनेट के साथियों और नौकरशाहों के लिए एक बेहतर मिसाल कायम करेगी.

हालांकि, उनकी सबसे अहम चुनौती उन ताकतों पर लगाम लगाने की होगी जो सूबे में गड़बड़ी पैदा करने की फिराक में हो सकते हैं. खबरें पहले से आ रही हैं कि हाथरस में तीन मीट की दुकानों को कुछ अज्ञात लोगों ने आग के हवाले कर दिया है. इन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई है.

हालात ऐसे बनते रहे तो इसमें लंबा वक्त नहीं लगेगा कि उनकी उग्र हिंदुत्व की छवि के साथ कुछ और कहानियां जोड़ दी जाएं. पहले से ही मीडिया में खबरें आने लगी हैं कि अवैध बूचड़खानों को बंद करने से उस पर आश्रित लोगों के सामने अब रोजी रोटी संकट पैदा होने लगा है.

इस बात पर शायद ही ध्यान दिया गया होगा कि वर्ष 2015 में नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल ने यूपी के अवैध बूचड़खानों को बैन कर दिया था. यही नहीं तब स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड को आदेश दिया गया था कि वो स्थानीय अधिकारियों से मीट की दुकानों के संचालन को निर्देशित करे.

लेकिन जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि इस तरह के परस्पर विरोधी संदर्भों का फायदा योगी आदित्यनाथ को ही होगा. दो राय नहीं है कि उनकी हर गतिविधियों को करीब से जांचा परखा जाएगा. यही नहीं किसी भी तरह की गड़बड़ी - वर्तमान में हो या भविष्य में - को काफी बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया जाएगा.

कई मामलों में हमने देखा है कि मीडिया आधारित किस्सागोई के विपरीत चुनाव नतीजे आते हैं. लिहाजा, आदित्यनाथ की प्राथमिकता सिर्फ कानून का राज और विकास सुनिश्चित करने में है. बाकी की चीजें खुद ब खुद ठीक हो जाएंगी.

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