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क्या सिर्फ ‘नमाज’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति है?

योगी आदित्यनाथ के पूरे बयान में 'नमाज' शब्द पर ही आपत्ति हो सकती है...परेशानियों के लिहाज से उनकी बात ठीक थी

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Aug 18, 2017 10:57 PM IST

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क्या सिर्फ ‘नमाज’ शब्द के इस्तेमाल पर आपत्ति है?

यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ ने जैसे ही बयान दिया कि जनमाष्टमी पूजन पर कैसे रोक लगा सकते हैं आखिर नमाज भी तो सड़कों पर ही पढ़ी जाती है, उनकी चौतरफा आलोचना शुरू हो गई. योगी जब भी कोई ऐसा बयान देते हैं वो मीडिया में सुर्खिया बटोरने लगते हैं. इसका कारण ये है कि जैसे ही कोई योगी और मुस्लिमों से जुड़ा मामला आता है तो मीडिया में खबर इसलिए बनती हैं क्योंकि वो बिकती ज्यादा हैं. योगी आदित्यनाथ और मुस्लिम का न्यूज कॉम्बिनेशन मीडिया को भी सूट करता है.

अब योगी के पूरे बयान को फिर से एक पढ़िए- ‘अगर मैं सड़क पर ईद के दिन नमाज पढ़ने पर रोक नहीं लगा सकता, तो थानों में जन्माष्टमी का उत्सव रोकने का मुझे कोई अधिकार नहीं है.’ योगी के अगर इस बयान को धार्मिक सौहार्द्र की निगाहों से भी देखा जाए तो कोई कमी नजर नहीं आती. हां ये जरूर है कि योगी इसी बात को बिना ‘नमाज’ शब्द का जिक्र किए कह सकते थे.

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इसके बाद कई ऐसी भी खबरें चलीं जिनमें लिखा था कि योगी थानों में जनमाष्टमी का उत्सव मनवाकर धार्मिक संदेश देना चाहते हैं. तर्क ये भी था कि ये संविधान की भावना के खिलाफ है. लेकिन ये एक गलत तथ्य है.

सच्चाई ये है कि  यूपी में थानों और पुलिस लाइन्स में जन्माष्टमी पर कार्यक्रम हमेशा से होता आया है. अगर इन्हें बंद कर दिया जाए तब योगी का निर्णय धार्मिक संदेश देने वाला होता. तब वो एक नया निर्णय होता. यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने अपने बयान के जरिए इस बात की तस्दीक भी कर दी है कि उनकी सरकार ने कभी जन्माष्टमी के त्योहार पर रोक नहीं लगाई. उन्होंने कहा क‌ि योगी जी नए भारत के ड‌िज‌िटल मुख्यमंत्री हैं, बताएं क‌ि 100 साल में थानों में कब जन्माष्टमी नहीं मनी.

अख‌िलेश ने नमाज शब्द को प्रयोग पर कहा कि सड़कों पर कई त्योहार मनाए जाते हैं तो स‌िर्फ मुस्ल‌िमों की नमाज पर न‌िशाना क्यों? अपनी आलोचना में अखिलेश यादव कहीं ज्यादा सटीक हैं क्योंकि योगी बिना नमाज शब्द का प्रयोग किए भी यही बात कह सकते थे.

एक बात और है. योगी आदित्यनाथ भी अपनी हिंदुत्व वाली छवि के बारे में अच्छे से समझते हैं. इसीलिए वो इसे कायम भी रखते हैं. आपको हाल ही में आया मदरसों में फोटोग्राफी या अवैध स्लॉटर हाउस का निर्णय याद ही होगा.

जरूर पढ़ें: मदरसे में झंडारोहण की वीडियोग्राफी: अपनी छवि जैसे ही निर्णय ले रहे योगी आदित्यनाथ

इसीलिए योगी मीडिया के सामने ऐसे शब्दों का इस्तेमाल भी करते हैं. मीडिया भी इसे खूब खबर बनाता है वो भी बिना जाने-समझे. इस लेख के लेखक ने अपने जीवन के शुरुआती 22 साल पुलिस लाइन में ही गुजारे हैं. जिन भी लोगों ने  यूपी में पुलिस को करीब से जाना है वो जानते हैं कि जन्माष्टमी का त्योहार कितने बड़े स्तर पर हमेशा से मनाया जाता है. लेकिन कभी भी इस पर ऐसी खबर नहीं बनी.

अब चूंकि योगी आदित्यनाथ की छवि भी ऐसी खबरों को सपोर्ट करती है इसलिए खूब सुर्खियां मिलती हैं. टीआरपी मिलती है. जबकि किसी भी अन्य जगह से ज्यादा पुलिस लाइन का माहौल सेकुलर होता है. वहां रहते हुए लोग आपस में खूब आराम से सारे त्योहार मनाते हैं. एक और महत्वपूर्ण तथ्य ये भी है कि पुलिस लाइन की मस्जिदें भी शिया और सुन्नियों में नहीं बंटी होती हैं. वहां पर इस्लाम के दोनों ही सेक्ट एक साथ नमाज अदा करते हैं. ऐसे प्रमाण पुलिस लाइन के बाहर शायद ही मिलेंगे.

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अब आते हैं धार्मिक त्योहारों और उस पर सरकार के रुख की बात पर. दरअसल किसी भी बड़े त्योहार को सभी पार्टियों द्वारा वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किए जाने का प्रचलन हमारे देश की राजनीति में बुहत आम है. दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने 2015 में बिहारी वोट बैंक को लुभाने के लिए छठ को गैजेटेड हॉलीडे घोषित कर दिया. लेकिन तब ये खबर इसलिए भी सुर्खियों में नहीं आई क्योंकि अरविंद केजरीवाल की गिनती देश के सेकुलर नेताओं में होती है. मीडिया को ये कॉम्बिनेशन सूट नहीं करता.

ऐसे ही लगभग हर पार्टी त्योहारों और धार्मिक आयोजनों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करती है. ऐसे में सिर्फ आदित्यनाथ से ये उम्मीद क्यों की जा रही है कि वो ऐसा न करें. अगर सभी पार्टियों के लिए धार्मिक आयोजनों का राजनीतिक इस्तेमाल संविधानसम्मत है तो योगी के लिए असंवैधानिक क्यों हो गया?

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