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सूर्य नमस्कार और नमाज: 'सबका साथ' की सोच दिखाता है योगी का बयान

सूर्य नमस्कार और नमाज पढ़ने को एक जैसा बताने वाले बयान का स्वागत होना चाहिए

Updated On: Mar 31, 2017 11:24 AM IST

Sreemoy Talukdar

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सूर्य नमस्कार और नमाज: 'सबका साथ' की सोच दिखाता है योगी का बयान

योगी आदित्यनाथ के सूर्य नमस्कार और नमाज को एक जैसा बताने वाले बयान का स्वागत होना चाहिए. इसे सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के संकीर्ण चश्मे से देखने की बजाय उनके बयान को सबको एक साथ जोड़ने की कोशिश और समावेशी सोच के तौर पर देखना चाहिए. देश के सांस्कृतिक तौर पर सबसे विविध राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर उनकी जिम्मेदारी भी यही है.

लखनऊ में तीन दिन के योग महोत्सव के उद्घाटन के दौरान बुधवार को आदित्यनाथ ने कहा, ‘सूर्य नमस्कार, प्राणायाम के सभी आसन हमारे मुस्लिम भाइयों द्वारा की जाने वाली नमाज के जैसे ही हैं. लेकिन, किसी ने भी अब तक इन्हें साथ लाने की कोशिश नहीं की क्योंकि कुछ लोग केवल भोग में व्यस्त थे, योग में नहीं.’

जून 2015 में भारत के पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के समारोह में 175 देशों की अगुवाई करने के कुछ दिन पहले ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (एआईएमपीएलबी) के नेतृत्व में कुछ मुस्लिम समूहों ने इस आयोजन पर अपनी नाखुशी जाहिर की थी और यात्रा में सूर्य नमस्कार को शामिल करने पर आपत्ति जताई थी. उस वक्त पांच बार के गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ ने जो कहा था उससे विवाद पैदा हो गया था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी आलोचना हुई थी. तब के बाद से लगातार उनके बयान को उनके एंटी मुस्लिम रुख के सबूत के तौर पर पेश किया जाता रहा.

8 जून को वाराणसी में एक इवेंट में उन्होंने कहा था, ‘सूर्य जीवनदायिनी ऊर्जा का स्रोत है. जिसे भी लगता है कि सूर्य सांप्रदायिक है, मैं उनसे बड़े ही आदर के साथ कहना चाहता हूं कि वे या तो खुद को समुद्र में डुबा लें या किसी अंधेरे कमरे में छिप जाएं. सूर्य भगवान ने कभी किसी को जाति, वर्ण या मजहब के आधार पर अछूता नहीं रखा है, मुझे ऐसी सोच पर आश्चर्य होता है.’

उनका यह बयान बुधवार के उनके बयान के एकदम उलट है.

उन्होंने कहा, ‘हम सबको यह तय करना होगा कि कौन वास्तव में सांप्रदायिक है...सूर्य नमस्कार के दौरान अगर हम ध्यान से इसकी मुद्राओं को देखें तो यह साफ हो जाता है कि ये हमारे मुस्लिम भाइयों द्वारा पढ़ी जाने वाली नमाज जैसा ही है. इन दोनों के बीच में बहुत ही खूबसूरत एकरूपता है. लेकिन इससे पहले कभी भी इन दोनों को साथ लाने की कोशिश नहीं की गई, क्योंकि कुछ लोगों को वोट में फायदा दिखता था न कि योग में. जिन लोगों ने जाति, वर्ण और धर्म के आधार पर समाज को बांटा उनका योग में कोई विश्वास नहीं हो सकता.’

योगी का रुख बदला!

Hindu women worship the Sun god Surya in the waters of the Sun lake during the Hindu religious festival of Chatt Puja in the northern Indian city of Chandigarh October 30, 2014. Hindu women fast for the whole day for the betterment of their family and the society during the festival. REUTERS/Ajay Verma (INDIA - Tags: RELIGION SOCIETY TPX IMAGES OF THE DAY) - RTR4C4PA

जिस तरह से देश में सेक्युलरिज्म को लेकर बहस आगे बढ़ी है और जिस तरह से सत्ता के भूखे दलालों ने इस विचार को भारतीय लोकप्रिय चेतना व्यक्त किया है, वह इसकी मूल भावना से बिलकुल अलग है.

फ़र्स्टपोस्ट ने अपने एक हालिया लेख में यह तर्क दिया था कि नरेंद्र मोदी सेक्युलरिज्म के यूरोप से आए कॉन्सेप्ट को हटाकर इसे प्राचीन भारतीय परंपरा से जोड़ने के लिए राजनीतिक गुणा-भाग कर रहे हैं.

सेक्युलरिज्म को लेकर उलटी सोच जिसमें सूर्य को एक खास धर्म से जोड़ा जाता है, उसे देखते हुए आदित्यनाथ का 2015 का बयान उनके बुधवार के बयान से ज्यादा सांप्रदायिक नहीं है. इस चीज पर बहस हो सकती है कि समुद्र में खुद को डुबा लेने की बात क्या मौत की कामना करना है, जैसा कि कुछ आलोचकों ने कहा है या यह सिर्फ एक कहावत जैसा है.

शब्दों को पकड़ने वाले और योगी को सांप्रदायिक मान कर चल रहे लोग, शायद भारतीय भाषा की इस खूबी को पकड़ नहीं पाए या जानबूझकर वे ऐसा करना ही नहीं चाहते.

छवि बदलने की कोशिश!

चाहे जो भी हो, आदित्यनाथ के शब्दों में एक बड़ा बदलाव नजर आया है और यह दिख रहा है कि सीएम के पद पर आने के बाद वह सबको साथ लेकर चलने की कोशिश कर रहे हैं. उन पर संदेह करने वाले कह सकते हैं कि गोरखपुर मठ के महंत के विचार में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है. यह सच हो सकता है. राजनीति में शब्दों का महत्व कर्मों से ज्यादा होता है. एक मुख्यमंत्री के तौर पर उनका योग की मुद्राओं से मुस्लिम प्रार्थना, दोनों ही दैनिक क्रियाएं हैं, के साथ तुलना करना, दो महत्वपूर्ण मकसदों को पूरा करता है.

पहला, शायद आदित्यनाथ अपनी कट्टर हिंदुत्व को प्रोत्साहित करने वाले की इमेज को तोड़ना चाहते हैं और खुद को एक ऐसे उदार नेता के तौर पर प्रोजेक्ट करना चाहते हैं जो विकास और समावेश की राजनीति करता है. गद्दी पर बैठने के बाद से उनके बयान निश्चित तौर पर सौहार्दपूर्ण माहौल बनाने वाले रहे हैं. राज्य के सीएम बनने के बाद गोरखपुर में पहली बार लोगों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सरकार न तो किसी का तुष्टीकरण करेगी न किसी के साथ भेदभाव करेगी.

उन्होंने कहा, ‘न जाति, न मजहब, न लिंग के नाम पर कोई भेदभाव होगा. विकास सबका होगा. किसी का तुष्टीकरण नहीं होगा.’

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विपक्ष में रहने के दौरान विरोधी और विद्रोही रहना और सत्ता में आने के बाद मैत्रीपूर्ण हो जाना राजनीति में कोई नई बात नहीं है. आदित्यनाथ का नमाज और सूर्यनमस्कार को लेकर बयान शुरुआती तौर पर इसकी ही मिसाल जान पड़ता है.

सिर्फ हिंदुओं के लिए नहीं योग

दूसरा और ज्यादा अहम यह है कि आदित्यनाथ साफतौर पर योग के साथ जुड़े हुए हिंदुत्व के टैबू को तोड़ना चाहते हैं और इसे एक सभी संस्कृतियों की पद्धति बताना चाहते हैं जो कि शरीर और दिमाग दोनों के लिए लाभदायक है.

योग महोत्सव के दौरान उन्होंने कहा, ‘अगर यह इवेंट 2014 के पहले आयोजित किया गया होता, तो इसके आयोजकों को सांप्रदायिक करार दिया गया होता. ऐसा केवल कुछ लोगों की नकारात्मक मानसिकता की वजह से होता. योग आपके स्वास्थ्य और खुशहाली का जरिया है, जबकि व्यायाम केवल आपके शारीरिक पहलू को पूरा करता है. जो लोग शारीरिक एक्सरसाइज को तरजीह देते हैं, उम्र के साथ उनके दिमाग सुस्त पड़ जाते हैं, लेकिन योगी हमेशा शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक और सामाजिक रूप से सचेत रहते हैं.’ यह अहम है कि योग के साथ हिंदुत्व का टैबू तोड़ा जाए क्योंकि तथाकथित सेक्युलर राजनीतिक पार्टियों ने इसे इंडिया में एक गुमराह करने वाला कॉन्सेप्ट बना दिया है. इन पार्टियों को इसमें बिना चुनी गई एआईएमपीएलबी जैसी संस्थाओं का साथ मिलता है. यह संस्था देश में खुद को इस्लाम का झंडाबरदार मानती है.

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इंडिया एंड द पॉलिटिक्स ऑफ योग नामक पीस में मनिल सूरी ने न्यूयॉर्क टाइम्स में लिखा है कि हालांकि योग रूढ़िवादी ईसाइयों और ईजिप्ट, मलेशिया और इंडोनेशिया जैसे कुछ कट्टर इस्लामिक देशों में मुश्किल वक्त से गुजरा, लेकिन इस बात के कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलते कि किसी धर्म ने योग को खारिज किया हो. इंडिया आने वाले मुस्लिम यात्री योग की शिक्षाओं से चकित थे. उन्होंने करीब हजार साल पहले योग की शिक्षाओं की अनुवादित किताबों को इस्लामिक दुनिया में पहुंचाया. मुगल शासक जहांगीर ने एक फारसी गद्य, बहर अल-हयात पेश किया, जिसमें 21 आसनों का जिक्र था.

बयान से बदलेगी फिजा?

अच्छी बात यह है कि कुछ मुस्लिम समूहों ने उत्तर प्रदेश के चीफ मिनिस्टर के बयान को सही भावना से लिया है. एएनआई से बातचीत में जमात ए हिंद के प्रेसिडेंट मौलाना सुहैब कासमी ने गुरुवार को कहा, ‘योगी आदित्यनाथ का बयान उचित है और इससे देश में एकता आएगी. हर धर्म हमें शांति और प्रेम के रास्ते पर चलने को प्रेरित करता है और ऐसे में हम एकजुट होकर देश के साथ हैं. योगी आदित्यनाथ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भावना स्वागतयोग्य है.’

एक और धार्मिक विद्वान मौलाना कल्बे सादिक ने एक कदम आगे बढ़कर मुस्लिमों से आदित्यनाथ सरकार को लेकर खौफ को खत्म करने को कहा और अपने लीडर्स से तार्किक बनने की बात कही. उन्होंने कहा, ‘मुस्लिम लीडरशिप इन मसलों को लेकर इमोशनल है क्योंकि उनकी सोच तार्किक नहीं है. उन्हें ओवैसी और मोहम्मद अयूब जैसों से डरना चाहिए.’

आदित्यनाथ का बयान योग को हिंदुत्व प्रोजेक्ट के औजार के तौर पर इस्तेमाल किए जाने के बेहूदे कुतर्क को खत्म करने में गहरी चोट करेगा.

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