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नीतीश से 'बुलेटप्रूफ शीशे' के पीछे से कैसे निपट पाएंगे योगी आदित्यनाथ

योगी आगे भी बिहार आते-जाते रहना चाहते हैं तो परसेप्शन की लड़ाई को ठीक से समझें...सामने नीतीश कुमार हैं

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jun 16, 2017 07:08 PM IST

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नीतीश से 'बुलेटप्रूफ शीशे' के पीछे से कैसे निपट पाएंगे योगी आदित्यनाथ

हाल-फिलहाल के सालों में बिहार में किसी भी नेता को बुलेटप्रूफ शीशे के पीछे से बोलते आपने शायद ही देखा हो. गुरुवार की दोपहर ये तारतम्यता अचानक से टूटी. यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ शीशे के पीछे से गरजते नजर आ रहे थे.

योगी बातें भी दमदार कर रहे थे. कुछ यूं कि राज्य में अगली सरकार बीजेपी की ही बनेगी. नीतीश कुमार में दम हो तो किसानों का कर्जा माफ करके दिखाएं. और ये भी कि बिहार में अब आना-जाना तब तक लगा रहेगा जब तक पीएम मोदी का झंडा राज्य में भी न लहरा दिया जाए.

इन सारी बातों के बीच एक बात खटक रही थी, वो ये कि जिन पीएम मोदी का लगातार यूपी सीएम जिक्र किए जा रहे थे खुद उन्होंने भी बिहार में न जाने कितनी रैलियां कीं, लेकिन उन्हें कभी बुलेटप्रूफ शीशे के पीछे से भाषण देने की जरूरत नहीं पड़ी.

जब मोदी की रैली में हुए थे धमाके

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मोदी की पटना रैली का एक दृश्य

27 अक्टूबर 2013 को पटना में हुई नरेंद्र मोदी कि वो रैली याद होगी लोगों को आज भी याद है जिसमें धमाके हुए थे. लोगों में भगदड़ मच गई थी. मोदी बिना संयम खोए लगातार लोगों को शांत दिमाग से काम लेने की हिदायत दे रहे थे. फिर मई 2014 वो पीएम बने.

15 अगस्त नजदीक आ रहा था तो कई लोगों के मन में ये कौतुहल था कि नरेंद्र मोदी कि जैसी छवि गढ़ी जा रही है क्या वो उससे इतर हटकर बुलेटप्रूफ शीशे के पीछे से ही भाषण देते नजर आएंगे? लेकिन ऐसा हुआ नहीं. 15 अगस्त को जब पीएम भाषण के लिए लालकिले पहुंचे तो कोई बुलेटप्रूफ शीशा नहीं था.

मोदी ने उस परिपाटी को एक बार में एक झटके से तोड़ दिया था. इसके बाद दो और सालों में भी पीएम बिना किसी बुलेटप्रूफ शीशे के ही भाषण देते आए हैं.

दरअसल इस तरीके के निर्णय कई बार परसेप्शन बनाने या तोड़ने के लिए भी लिए जाते हैं. 15 अगस्त के दिन लालकिला और उसके आस-पास के इलाके भी हाई अलर्ट पर होते हैं. लेकिन मोदी इन सब बातों से बाहर आकर ये निर्णय लेने में सफल रहे.

यूपी में जबरदस्त जीते के बाद से अभी तक योगी आदित्यनाथ की जो छवि गढ़ी गई है वो एक निडर और निर्भीक नेता की ही रही है. शावक को दूध पिलाती तस्वीरें तो आपको हर कुछ अंतराल के बाद सोशल मीडिया पर आसानी से घूमती हुई मिल ही जाएगी. योगी आदित्यनाथ यूपी के सीएम बने इसमें भी उनकी छवि का बड़ा रोल था.

लेकिन दरभंगा में गुरुवार को जब योगी भाषण दे रहे थे तो अपने बारे में बने परसेप्शन को तोड़ रहे थे. उस परसेप्शन को जो 17 मार्च को बना था. जब योगी सीएम चुन लिए गए थे. और अपनी कार में काले चश्मे में लोगों के बीच हाथ जोड़े दिख रहे थे.

एहतियातन कराई गई व्यवस्था

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बिहार की राजधानी पटना में मौजूद न्यूज 18 डिजिटल के कार्यकारी संपादक आलोक कुमार कहते हैं बीते 1 महीने से जेडीयू और आरजेडी में योगी आदित्यनाथ की रैली को लेकर एक तरह की खलबली सी मची हुई थी. यूपी की जबरदस्त जीत के बाद पड़ोसी राज्य होने के नाते एक बात नैचुरली निकल कर आई है कि बिहार में बीजेपी की जीत में योगी कैटलिस्ट का काम कर सकते हैं.

आलोक कहते हैं कि बिहार में जेडीयू ऐसी राजनीति कर रही है कि आरजेडी डिफेंसिव रहे. नीतीश कुमार कोई रिस्क नहीं लेना चाह रहे थे. वो नहीं चाहते थे कि योगी की रैली में कोई घटना घटे जिससे आरजेडी वाले मुखर हो सकें. हाल के कुछ सालों में इंडियन मुजाहिदीन के कई आतंकी पकड़े जाने की वजह से दरभंगा स्लीपर सेल का गढ़ भी कहा जाने लगा है. ये भी बात सुनने में आई है कि आईबी का एक जेनेरिक अलर्ट आया था जिसके बाद ये फैसला लिया गया. ये स्थानीय प्रशासन ने ही मुहैया करवाया था.

आलोक कुमार बताते हैं कि बिहार के राजनीतिक जानकारों का ये भी मानना है कि बीजेपी की रणनीति बिहार में योगी आदित्यनाथ को आगे रखने की भी है. इस बात को जेडीयू वाले भी समझते हैं. इसलिए ऐसा कदम एहतियातन उठाया गया होगा.

हालांकि इससे इंकार नहीं कि ये प्रशासन के द्वारा ही किया होगा. लेकिन यूपी सीएम को ये बात समझनी होगी कि यूपी की जीत उनके भरोसे नहीं हुई है. यूपी चुनाव से पहले बहुत कम ही राजनीतिक विश्लेषक ऐसे थे जो बीजेपी की बड़ी जीत की बात कर रहे थे. जिन कुछ लोगों ने जिक्र भी किया था वो इतनी बड़ी जीत की उम्मीद तो बिल्कुल भी नहीं कर रहे थे.

अब अगर बिहार में योगी को आगे रखकर लड़ाई लड़ने की तैयारी है भी तो सबसे पहले उन्हें परसेप्शन की लड़ाई को जीतना होगा. भारतीय जनमानस में नेताओं को लेकर लोगों का परसेप्शन काम के अलावा भी कई ऐसी बातों पर निर्भर करता है जो उनके हाव-भाव से जुड़ी हुई होती हैं. बिहार में पूर्ण शराबबंदी का नीतीश कुमार का कदम भी इसी परसेप्शन की लड़ाई का हिस्सा माना जाता है.

तो अगर बिहार में आने-जाने का फैसला योगी आदित्यनाथ ने कर ही लिया है तो उन्हें ध्यान देना होगा कि उनके सामने नीतीश कुमार जैसे नेता हैं. जो योगी की पहली ही रैली में उन्हें बुलेटप्रूफ शीशे के पीछे खड़ा कर देने की कला में माहिर हैं.

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