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योगी आदित्यनाथ: नाम भी बोलता है और काम भी बोलता है

आज योगी आदित्यनाथ प्रिंट हो, डिजिटल हो या कोई और मीडिया हर जगह छाए हुए हैं

Updated On: Mar 22, 2017 07:52 AM IST

Sanjay Singh

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योगी आदित्यनाथ: नाम भी बोलता है और काम भी बोलता है

किसी भी नेता के काम संभालने के बाद पहला दिन आम तौर पर औपचारिकताएं पूरी करने में गुजरता है. चीजें और जिम्मेदारियां समझने में बीतता है.

लेकिन उत्तर प्रदेश के नए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पर ये क्या, कोई भी सामान्य बात लागू नहीं होती. फिर चाहे उनके राजनीतिक कैरियर की शुरुआत हो, एक कद्दावर नेता के तौर पर पहचान बनाना हो या अब उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनना हो.

योगी का नाम भी बोलता है और काम भी बोलता है. वो गोरखपुर के बेहद सम्मानित गोरक्षनाथ पीठ के महंत हैं. वो पांच बार से लगातार सांसद चुने जा रहे हैं. वो हिंदू युवा वाहिनी के मुख्य संरक्षक हैं. वो बीजेपी के बेबाक बोलने वाले स्टार प्रचारक हैं. वो खुलकर संप्रदाय की बातें करते हैं.

उन्होंने खुलकर खुद को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार बताया था. और अब जबकि वो मुख्यमंत्री बन गए हैं, तो जाहिर है क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मीडिया में उनकी शख्सियत के चर्चे हैं. आज योगी आदित्यनाथ प्रिंट हो, डिजिटल हो या कोई और मीडिया, हर जगह छाए हुए हैं.

Yogi Adityanath is BJP's CM-designate for Uttar Pradesh

योगी को याद रखना होगा 'सबका साथ सबका विकास' का मंत्र

मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ के पहले बयान को काफी अहमियत दी जा रही है. किसी और से ज्यादा खुद आदित्यनाथ को इसका अंदाजा है. पद संभालने के बाद जब योगी पहली बार मीडिया से मुखातिब हुए तो उन्होंने कई बार 'सबका साथ, सबका विकास' करने की बात कही.

उन्होंने अपनी बात इसी जुमले से शुरू की और इसी से खत्म किया. बीच-बीच में वो दूसरी बातें कहते रहे. सरकार के अंदर और बाहर किसी और को याद दिलाने से ज्यादा खुद योगी आदित्यनाथ को 'सबका साथ, सबका विकास' के सूत्र वाक्य को याद रखने की जरूरत है.

ये बात प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी 2014 के चुनाव से कहते आए हैं. अब ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा कि योगी ने इस मंत्र को कितना अपनाया है और इस पर कितना अमल किया है.

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अब योगी को बचके रहना होगा बेबाक बयानों से 

अब वो उत्तर प्रदेश के 22 करोड़ लोगों के मुख्यमंत्री हैं, जिसकी करीब बीस फीसद आबादी मुसलमानों की है. वो मुसलमान जो कई बार योगी के बयानों के निशाने पर रहे हैं.

योगी आदित्यनाथ जानते थे कि मुख्यमंत्री बनते ही उन्हें अपने पहले के बेबाक और कट्टर बयानों पर सवालों का सामना करना पड़ेगा. खास तौर से खुलकर हिंदू बनाम मुसलमान वाले उनके बयानों पर सवाल उठेंगे. अभी हाल तक चुनाव प्रचार में योगी ऐसे ही बयान तो दे रहे थे.

इसी वजह से मुख्यमंत्री चुने जाने के बाद न तो उन्होंने और न ही बीजेपी के पर्यवेक्षक केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू ने मीडिया को सवाल करने की इजाजत दी. न ही दोनों नेताओं ने सवालों के जवाब दिए.

दोनों ही नेताओं को अच्छे से मालूम था कि योगी का एक भी शब्द, एक भी बयान, विरोधियों को हमला करने का मौका दे सकता है. उनकी बातों के अपनी-अपनी सहूलियत के हिसाब से मायने निकाले जाएंगे. सत्ताधारी बीजेपी को निशाना बनाने के लिए योगी के एक-एक शब्द पर नजर होगी. उनकी बातें सुर्खियां बटोरेंगी.

इसीलिए दोनों ही नेताओं ने खामोशी को अपना हथियार बना लिया क्योंकि दोनों ही नेताओं को पता है कि वक्त सबसे बड़ा मरहम है.

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तस्वीर: पीटीआई

अमित शाह की देन है संतुलित मंत्रिमंडल 

मुख्यमंत्री बनने के बाद जब योगी पहली बार मीडिया के सामने आए तो उन्होंने पत्रकारों का ध्यान अपनी कैबिनेट की तरफ खींचने के लिए कहा, 'मित्रों, आपने शपथ ग्रहण समारोह में ही देखा होगा कि हमारी सरकार, सबका साथ-सबका विकास करने के लिए कृतसंकल्प है.'

शायद योगी लोगों का ध्यान अपनी कैबिनेट की तरफ दिलाने की कोशिश कर रहे थे. वो ये संदेश देना चाहते थे कि उनके मंत्रिमंडल में हर वर्ग, समुदाय और क्षेत्र को उचित भागीदारी देने की कोशिश की गई है.

रविवार को योगी और दो उप-मुख्यमंत्रियों समेत जिन 47 मंत्रियों ने रविवार को शपथ ली, उनमें सात राजपूत हैं, आठ ब्राह्मण हैं, 17 ओबीसी और अति पिछड़े वर्ग से हैं. वहीं सात दलितों और आठ वैश्य समुदाय के मंत्रियों के साथ एक मुस्लिम मंत्री ने भी शपथ ली.

योगी की कैबिनट में चार महिला मंत्री भी शामिल की गई हैं. बीजेपी ने इस बार 43 महिलाओं को टिकट दिया था. इनमें से 32 जीत भी गई थीं. क्षेत्रीय संतुलन बनाने के लिए, पूर्वी उत्तर प्रदेश से 17, पश्चिमी यूपी से 12, मध्य यूपी से 11 और बुंदेलखंड इलाके से तीन मंत्री बनाए गए हैं.

वैसे कैबिनेट का ये संतुलन बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह का बनाया हुआ है. इसमें योगी का योगदान कम ही है.

उत्तर प्रदेश विधानसभा में 403 सदस्य हैं. इस लिहाज से योगी अभी अपनी कैबिनेट में करीब एक दर्जन मंत्री और बना सकते हैं. संविधान के 91वें संशोधन के मुताबिक यूपी सरकार में 60 मंत्री हो सकते हैं.

Yogi Adityanath

(फोटो: पीटीआई)

योगी के पहले चौबीस घंटे 

अब मुख्यमंत्री बनने के बाद पहले चौबीस घंटे के योगी की गतिविधियों पर नजर डालते हैं:

योगी आदित्यनाथ ने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस के मुखिया को जो पहला निर्देश दिया वो अधिकारियों के साथ अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों के लिए भी संदेश के तौर पर दिया.

उन्होंने कहा कि राज्य में किसी को भी उत्सव के नाम पर उपद्रव करने की इजाजत नहीं होनी चाहिए. संदेश साफ था. अगर उनके समर्थक या हिंदू युवा वाहिनी, बजरंग दल या ऐसे ही किसी और संगठन के सदस्य भी हंगामा करते हैं तो उनसे सख्ती से निपटा जाए.

अधिकारियों के साथ-साथ उनके समर्थकों को भी इस आदेश के मायने अच्छी तरह से समझ में आए होंगे.

पांच बार के सांसद के तौर पर योगी की छवि एक सख्त प्रशासक की रही है. वो भले ही कई बार कानून के बजाय अपने बनाए नियम पर चलते रहे हैं. मगर इतना तो तय है कि योगी आदित्यनाथ बेहद सख्त मिजाज हैं.

बहुत से लोग उन्हें नापसंद करते हैं. लेकिन उनके हाथ में सत्ता होने का मतलब, नफरत फैलाने वाले काबू में रहेंगे.

योगी को जिस बात पर सबसे ज्यादा नजर रखनी होगी वो खतरा उनके अपने समर्थकों के बेकाबू होने का है. कट्टर हिंदुत्व वाली ये ब्रिगेड अब तक योगी की अगुवाई में ही चलती रही है. उन्हें अगर ये लगने लगा कि योगी के सत्ता में आने से वो ताकतवर हो गए हैं, कुछ भी कर सकते हैं, तो ऐसे तत्व प्रशासन के लिए चुनौती बन सकते हैं.

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तस्वीर: पीटीआई

उम्मीदों पर खरा उतरना सबसे बड़ी चुनौती है योगी के लिए  

उत्तर प्रदेश सांप्रदायिक रूप से बेहद संवेदनशील है. इसीलिए योगी की सबसे बड़ी चुनौती हिंदुत्व ब्रिगेड को काबू में रखने की है. अगर वो ऐसा करने में कामयाब होते हैं और पीएम मोदी के गुजरात मॉडल की तरह ही यूपी को विकास के रास्ते पर ले जा सके तो वो बीजेपी की उम्मीदों पर खरे उतरेंगे. वो जनता की उम्मीदों पर भी खरे उतरेंगे.

अपने मंत्रियों को भी योगी आदित्यनाथ ने सख्त संदेश दिया है. उन्होंने सभी मंत्रियों से पंद्रह दिनों में संपत्ति का ब्यौरा देने को कहा है. इससे वो साफ-सुथरी सरकार देने के वादे को काफी हद तक पूरा कर सकेंगे. अपने इन दो निर्देशों से वो बाकी मंत्रियों से कद में काफी बड़े हो गए हैं.

योगी ने अब तक अपनी राह खुद से बनाई है. वो अपने ही सिद्धांतों पर चलते हैं. उन्होंने जो चाहा है वो हासिल किया है, जबकि कई बार उनका पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से टकराव भी हुआ है.

ये तय है कि वो आगे भी सुर्खियों में रहेंगे. यूपी की जनता को यही उम्मीद है कि वो सही वजहों से ही सुर्खियां बटोरेंगे.

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