S M L

यशवंत सिन्हा और तोगड़िया वैचारिक विरोध के नाम पर एंटी मोदी एजेंडे को हवा दे रहे हैं

यशवंत सिन्हा और प्रवीण तोगड़िया बिल्कुल अलग सामाजिक और सियासी तबके से आते हैं. लेकिन प्रधानमंत्री को लेकर उनकी जो बेतुकी किस्म की नफरत है वहां दोनों एक ही पायदान पर खड़े दिखते हैं

Updated On: Apr 24, 2018 02:40 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

0
यशवंत सिन्हा और तोगड़िया वैचारिक विरोध के नाम पर एंटी मोदी एजेंडे को हवा दे रहे हैं
Loading...

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर यशवंत सिन्हा और प्रवीण तोगड़िया की जो बेतुकी किस्म की नफरत है, उसमें एक डराने वाली समानता दिखती है. दोनों ही नेता बिल्कुल अलग-अलग सामाजिक और सियासी तबके से आते हैं. फिर भी दोनों नेता मोदी के प्रति जिस तरह की दुर्भावना रखते हैं, वो यशवंत सिन्हा और प्रवीण तोगड़िया को एक ही पायदान पर खड़ा कर देते हैं. दोनों ही नेता बड़ी चतुराई से सियासी तौर पर मर्यादित जबान में मोदी पर करारे हमले करते हैं. दिलचस्प बात ये है कि अपने-अपने सियासी प्लेटफॉर्म पर यशवंत सिन्हा और प्रवीण तोगड़िया दोनों ही हाशिये पर खड़े हैं. लेकिन, मोदी विरोधी बयान देकर वो हमेशा सुर्खियां बटोरते रहते हैं.

ऊपरी तौर पर हमें ये लगता है कि दोनों के बीच कोई ताल्लुक नहीं. आइए पहले प्रवीण तोगड़िया के सियासी सफर और उनके करियर ग्राफ पर नजर डालते हैं.

डॉक्टरी छोड़ हिंदुत्व बचाने आए तोगड़िया को सत्ता का रोग लग गया

कहा जाता है कि प्रवीण तोगड़िया एक अच्छे कैंसर सर्जन हैं. लेकिन उन्होंने हिंदुत्व ब्रिगेड का हिस्सा बनने के लिए अपनी मेडिकल की प्रैक्टिस को तिलांजलि दे दी थी. अस्सी के दशक के आखिर और नब्बे के दशक की शुरुआत में जब देश में राम जन्मभूमि आंदोलन का शोर था, तो तोगड़िया दो साध्वियों-उमा भारती और साध्वी ऋतंभरा के साथ हिंदुत्व के नए हीरो बनकर उभरे थे. उन्हें विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख अशोक सिंघल की सरपरस्ती हासिल थी.

उस वक्त तोगड़िया पढ़े-लिखे पेशेवर माने जाते थे, जिन्होंने अपना अच्छा-खासा करियर और कमाई छोड़कर हिंदुओं को एकजुट करने का बीड़ा उठाया था. अपने आग लगाने वाले भाषण से हिंदुओं और मुसलमानों के बीच नफरत पैदा करने वाले तोगड़िया के बारे मे उस वक्त भी माना जाता था कि वो वक्त आने पर अपनी डॉक्टरी की शपथ के रास्ते पर ही चलेंगे. तोगड़िया का हिंदुत्व ब्रिगेड के पाले में आने का ये मतलब निकाला गया था कि देश में ऐसे तमाम लोग हैं जो हिंदू धर्म को सुधारने और एकुजट करने के आह्वान पर अपना करियर छोड़कर आ जाएंगे.

लेकिन मोदी को सत्ता से हटाने में जुट गए तोगड़िया

लेकिन, जल्द ही प्रवीण तोगड़िया का झुकाव सत्ता की राजनीति की तरफ हो गया. अटल बिहारी वाजपेयी की अगुवाई वाली एनडीए सरकार के दौरान तोगड़िया ने सरकार पर खूब हमले किए. उनके सबसे तीखे बयानों के निशाने पर खास तौर से वाजपेयी-आडवाणी की जोड़ी हुआ करती थी. गुजरात में तोगड़िया के निशाने पर उस वक्त राज्य के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी होते थे. बीजेपी पर हमला करने के लिए तोगड़िया कांग्रेस से हाथ मिलाने में भी नहीं हिचकते थे. हिंदुत्व प्रोजेक्ट में अपनी ताकत लगाने के बजाय तोगड़िया, मोदी को गुजरात की सत्ता से हटाने की जुगत में भिड़ गए. वो अपनी कोशिशों में बुरी तरह नाकाम रहे, क्योंकि मोदी ने पूरे राज्य में तोगड़िया की चालों को नाकाम कर दिया.

ये भी पढ़ें: कर्नाटक चुनाव ओपिनियन पोल: न बीजेपी न कांग्रेस, जेडीएस साबित होगी किंगमेकर

लेकिन, तोगड़िया हार मानने को राजी नहीं थे. उन्होंने संघ परिवार में अपने संपर्कों का इस्तेमाल करके बीजेपी नेतृत्व के खिलाफ गोलबंदी की कोशिश की, खास तौर से वाजपेयी, आडवाणी और मोदी के खिलाफ. तोगड़िया को संघ के एक तबके का साथ भी मिला. लेकिन इससे बीजेपी नेतृत्व में बदलाव की उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं. तोगड़िया की इच्छा के खिलाफ, संघ ने बीजेपी के मामलों में सीधी दखलंदाजी के प्रति अनिच्छा जताई. नतीजा ये हुआ कि तोगड़िया, आखिर में अशोक सिंघल और विश्व हिंदू परिषद के दूसरे नेताओं से ही भिड़ गए. पिछले पांच सालों से वो संघ परिवार में पूरी तरह अलग-थलग पड़ गए थे. उनका संघ परिवार के नेतृत्व से सीधा टकराव चल रहा था.

praveen togadia

हार गए हैं तोगड़िया

इस साल की शुरुआत में अहमदाबाद की एक अदालत में पेशी से ठीक पहले प्रवीण तोगड़िया अचानक गायब हो गए. बाद में वो एक अस्पताल में सामने आए. तब तोगड़िया ने दावा किया कि उन्हें खबर मिली है कि केंद्र की सरकार उन्हें एक मुठभेड़ में मारने वाली थी, इसीलिए वो छुप गए थे. तोगड़िया की इस हरकत से संघ की चिंताएं बढ़ गईं. अब चूंकि, संघ परिवार में तोगड़िया कमोबेश हाशिए पर जा चुके हैं. इसीलिए तोगड़िया का ये नया सियासी दांव उन्हीं पर भारी पड़ गया. संघ परिवार के भीतर तोगड़िया के लिए मुश्किल तब और बढ़ गई, जब उन्होंने विश्व हिंदू परिषद के अध्यक्ष पद के लिए पहली बार चुनाव के लिए मजबूर किया. लेकिन इस महीने तोगड़िया अपनी कोशिशों में बुरी तरह मात खा गए, और उनके विरोधी विष्णु सदाशिव कोकजे, विश्व हिंदू परिषद के नए अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष बन गए. कुल मिलाकर तोगड़िया के उत्थान और पतन की कहानी, स्वार्थ से भरे दांव की मिसाल है, जिसे उन्होंने हिंदुत्व हित की बातों का जामा पहना रखा था.

समाजवादी ब्यूरोक्रेट से हिंदूवादी नेता

तोगड़िया की ही तरह यशवंत सिन्हा की कहानी भी उसी सियासी रास्ते पर चलने वाली दिखती है. यशवंत सिन्हा को चंद्रशेखर ने चुनकर अपनी सरकार में वित्त मंत्री बनाया था. एक ब्यूरोक्रेट रहे यशवंत सिन्हा, राजनीति में समाजवाद का चोला पहनकर आए थे. बिहार के मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर से उनकी नजदीकी उन्हें समाजवादी आदर्शों पर चलने वाले नेता की पहचान दिलाने में काफी काम आई, खासतौर से अयोध्या आंदोलन के वक्त. चंद्रशेखर की सरकार अचानक गिर गई और इसी के साथ उनका और यशवंत सिन्हा का साथ भी खत्म हो गया. उस वक्त बीजेपी उठान पर थी और यशवंत सिन्हा को आडवाणी में अपनी सरपरस्ती करने वाला नया नेता मिल गया. आडवाणी उस वक्त हिंदुत्व की राजनीति के सबसे असरदार नेता थे.

ये भी पढ़ें: बीजेपी नेता मीडिया को 'मसाला' देने से कैसे बचें क्योंकि 'जुबां पे लागा नमक सियासत का'

हिंदुत्व के नए अलंबरदार के तौर पर यशवंत सिन्हा को संघ के उन नेताओं का साथ भी मिल गया, जो स्वदेशी आंदोलन के अगुवा थे. कुछ वक्त के लिए यशवंत सिन्हा को बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता की जिम्मेदारी दी गई. लेकिन, जब जैन हवाला डायरी में उनका नाम आया, तो यशवंत सिन्हा ने आडवाणी की ही तरह अपने पद से इस्तीफा दे दिया. 1998 के आम चुनाव में जब एनडीए सत्ता में आया, तब सिन्हा को वित्त मंत्री बनाया गया. उन्हें वित्त मंत्री बनाने के लिए उस वक्त संघ प्रमुख रहे के सी सुदर्शन ने तो वाजपेयी के घर पर डेरा ही डाल दिया था, ताकि वाजपेयी को मजबूर कर के यशवंत सिन्हा को वित्त मंत्रालय दिला सकें. आडवाणी के समर्थन से यशवंत सिन्हा चार साल तक वित्त मंत्री रहे. इसके बाद उन्हें वाजपेयी ने आडवाणी के ऐतराज के बावजूद वित्त मंत्रालय से हटाकर विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी दी.

yashwant-sinha.jpg-new

आडवाणी का विरोध और पछतावा

2004 के लोकसभा चुनाव में जब एनडीए के हाथ से सत्ता निकल गई, तो यशवंत सिन्हा उस वक्त आडवाणी के खिलाफ हो गए, जब आडवाणी ने पाकिस्तान के दौरे पर जाकर जिन्ना की तारीफ की. यशवंत सिन्हा ने खुलकर आडवाणी का विरोध किया. सिन्हा को लगा कि उन्हें संघ का समर्थन मिलेगा. लेकिन, हाशिए पर होने के बावजूद, आडवाणी को पता था कि संघ परिवार में समीकरण कैसे बनते-बिगड़ते हैं. वहीं, यशवंत सिन्हा तो बाहरी थे और बिल्कुल एक अफसर जैसा मौकापरस्ती वाला बर्ताव कर रहे थे. कुछ ही महीनों के भीतर यशवंत सिन्हा को अपनी गलती का एहसास हो गया. इसके बाद उन्होंने आडवाणी से ताल्लुक सुधारने की पुरजोर कोशिश की. लेकिन, तब तक संघ परिवार के भीतर आडवाणी का ही कद काफी घट चुका था.

2014 के आम चुनाव से पहले यशवंत सिन्हा ने खुद के हाशिए पर जाने की नियति और मोदी के कद्दावर होने को स्वीकार कर लिया. जब सिन्हा ने देखा कि उन्हें लोकसभा चुनाव का टिकट शायद ही मिले, तो उन्होंने बेटे जयंत सिन्हा को अपनी हजारीबाग सीट से टिकट दिलाने की कोशिश की. उन्हें उम्मीद थी कि विदेश से जुड़े किसी मामले में उनकी सेवाएं भी ली जाएंगी. जब यशवंत सिन्हा की उम्मीदें टूट गईं, तो उन्होंने सरकार के खिलाफ बयानबाजी शुरू कर दी. पहले, सिन्हा ने आर्थिक मामलों को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली पर हमले किए. और अब वो प्रधानमंत्री मोदी को सामाजिक और सियासी मुद्दों पर निशाना बना रहे हैं.

ये भी पढ़ें: 2019 का चुनाव तय करेगा संघ के 'शताब्दी वर्ष' के जश्न का माहौल

इंडियन एक्सप्रेस में अपने दस्तखत के साथ लिखे लेख में यशवंत सिन्हा ने आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे सीनियर्स के साथ बीजेपी के तमाम सांसदों से अपील की कि वो मोदी और अमित शाह के नेतृत्व के खिलाफ बगावत करें. जबकि खुद यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा, मोदी सरकार में मंत्री हैं.

निजी ईर्ष्या और महात्वाकांक्षा के शिकार दोनों नेता

अब उन मुद्दों पर गौर कीजिए, जिनके हवाले से तोगड़िया और सिन्हा, मोदी को निशाना बना रहे हैं. तोगड़िया की शिकायत है कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण में देरी हो रही है. वहीं बीजेपी सरकार ने हिंदुत्व के एजेंडे को पीछे धकेल दिया है. वहीं पिछले हफ्ते बीजेपी से नाता तोड़ने से पहले तक खुद को हिंदूवादी कहने वाले यशवंत सिन्हा कश्मीर की घाटी में टहलते और न जाने किस-किससे मिलते दिखाई दिए थे, ताकि कश्मीर समस्या का हल निकाल सकें.

बिहार में वो लालू यादव और तेजस्वी यादव में लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्षता के गुण देखते हैं. तोगड़िया की ही तरह, यशवंत सिन्हा भी निजी ईर्ष्या और महत्वाकांक्षा के शिकार नजर आते हैं. यशवंत सिन्हा की बयानबाजी से सुर्खियां तो बन जाती हैं, मगर आम आदमी पर उनकी बातों का जरा भी असर नहीं होता.

0
Loading...

अन्य बड़ी खबरें

वीडियो
फिल्म Bazaar और Kaashi का Filmy Postmortem

क्रिकेट स्कोर्स और भी

Firstpost Hindi