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यशवंत 'रोलबैक' सिन्हा जी, नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले साहस मांगते हैं!

नोटबंदी और जीएसटी का फैसला जरुरी था और याद रखना होगा कि साहसी फैसले जब लिए जाते हैं तो उनकी अनिवार्य रुप से आलोचना होती है

S Murlidharan Updated On: Sep 27, 2017 10:04 PM IST

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यशवंत 'रोलबैक' सिन्हा जी, नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसले साहस मांगते हैं!

नौकरशाही से राजनीति की दुनिया में आए यशवंत सिन्हा ने कई सरकारों में जिम्मेदारी के अनेक पदों पर काम किया है लेकिन उनके नाम के साथ ‘रोलबैक’ (यानी एक कदम आगे तो दो कदम पीछे) जैसा नाखुशगवार विशेषण तब जुड़ा जब उनके जिम्मे देश का वित्त मंत्रालय था.

साल 2000 का वाकया है, पेट्रोल की कीमतों में बस इजाफा हुआ ही था कि यशवंत सिन्हा ने भरपूर दब्बूपन दिखाते हुए पेट्रोल की कीमत बढ़ाने का फैसला वापस ले लिया. ऐसा ही एक पलटीमार फैसला उन्होंने दो साल बाद किया जब एलपीजी की कीमतों में बढ़ोतरी का फैसला वापस लिया और ऐसा करते हुए अपने चेहरे पर एक शिकन तक ना आने दिया.

यहां बस दो ही फैसलों का मिसाल के तौर पर जिक्र किया गया है लेकिन उन्होंने ऐसे बहुत से फैसले लिए हैं जो उनके सिन्हा सरनेम से पहले ‘रोलबैक’ जैसा विशेषण जोड़ने को जायज ठहराते हैं.

अपने राजनीतिक विचारों को बदलना हो तो वो ऐसा बड़ी खुशी और उत्साह के साथ करते हैं. बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि वे अपने राजनीतिक विचारों को बदलने के लिए जाने जाते हैं. गुजरात दंगों के मामले में कथित भूमिका को लेकर नरेंद्र मोदी के प्रति उनका रवैया आलोचना का था और वे पार्टी की उस पुरानी पीढ़ी के साथ थे जो मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के खिलाफ थी. लेकिन बेटे जयंत सिन्हा को मोदी सरकार में मंत्री पद मिला तो उनके तेवर नरम पड़ गए.

हालांकि यह बात भी कहनी पड़ेगी कि जयंत सिन्हा अपनी बेहतरीन डिग्री के बूते खुद भी यह पद आसानी से पा सकते थे, उन्हें ना तो इसके लिए खानदानी रसूख की जरुरत थी ना ही यह जताने की कि उन्होंने विदेश के एक नामी-गिरामी वित्तीय कंसल्टेन्सी फर्म में नौकरी की है. यशवंत सिन्हा बीजेपी के कथित सांप्रदायिक चरित्र और धर्मनिरपेक्षता की साख की कमी पर अंगुली उठाकर उसे कोसा करते थे लेकिन एक वक्त ऐसा भी आया कि बिना किसी हिचक के वे धड़ाके से बीजेपी में शामिल हो गए.

नोटबंदी से असंगठित क्षेत्र अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा आए

ऐसे शिकायतियों (और ख़ास नामों में) में एक नाम अरुण शौरी का भी शामिल है जो वाजपेयी सरकार में मंत्री थे. उनकी भी आदत है— जब-तब किसी कोने से अपना दुबका हुआ सर उठाओ और मोदी के खिलाफ व्यंग्य-वाणों की बौछार कर दो. लेकिन उनमें शालीनता बची हुई है. जब उनके आगे सामने लिखी इबारत से झांकता संदेश एकदम साफ हो गया तो उन्होंने बीजेपी से इस्तीफा दे देना उचित समझा.

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अब बात चाहे जो हो लेकिन तर्कों की तुला पर तौलकर गुण-दोषों पर नजर रखते हुए सोचें तब भी लगता यही है कि मोदी सरकार के खिलाफ यशवंत सिन्हा ने जो आरोप लगाए हैं उनमें अड़ंगा मारने की अदा तो है लेकिन किसी भले के लिए राह रोकने की मंशा नहीं. यशवंत सिन्हा और उन जैसे बाकी नेताओं को यह भली-भांति समझ लेना चाहिए कि किसी मध्यमवर्गीय व्यक्ति को अपने जीवन में तीन अहम मौके पर अपनी हद की लकीर दम लगाकर थोड़ा और आगे खिसकानी पड़ती है- एक तो बेटी की शादी के वक्त, दूसरे अपना घर बनवाते या खरीदते समय और तीसरे उस वक्त जब बेटी या बेटे को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजना हो.

यही बात सरकार पर भी लागू होती है जब वह कुछ अनूठा करने जा रही हो— कुछ ऐसा जो चलताऊ बुद्धि के वश की बात ना हो. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली पर जिस नोटबंदी और जीएसटी के लिए सार्वजनिक रुप से व्यंग्य-वाण चलाए जा रहे वे इसी किस्म के फैसले हैं. अगर किसी व्यक्ति ने अपनी आंखों पर पूर्वाग्रह की पट्टी बांधकर देखने से एकदम ही इनकार कर दिया हो तो अलग बात है वर्ना किसी को भी दिख जाएगा कि नोटबंदी का ब्रह्मास्त्र चलाकर और उसकी ताकत पर जीएसटी की सान चढ़ाकर नरेंद्र मोदी ने किनारे करके रखे गए असंगठित क्षेत्र को अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में लाने का काम किया है और इस श्रेय से उन्हें वंचित नहीं किया जा सकता.

बेटी की शादी, घर बनवाने या फिर संतान को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने के जो उदाहरण दिए गए हैं उनमें हम देखते हैं कि व्यक्ति ऐसा एक-दो फैसला कर लेने के बाद साल दो साल ठहरकर थोड़ा दम लेता है, सुस्ताता है. जाहिर है, नोटबंदी और जीएसटी जैसे बड़े फैसले के बाद मोदी सरकार को भी कुछ दिनों के लिए सुस्ताना होगा, अर्थव्यवस्था थोड़ी ढीली पड़ेगी.

बेशक बहुत जल्दी पूरा दम लगाकर अर्थव्यवस्था में जान फूंकने की जरुरत है जो फिलहाल वैश्विक बाजार की गति के साथ-साथ कई और कारणों से मंद पड़ी हुई है. लेकिन सरकार पर पेट्रोलियम के मोर्चे पर टैक्स रिफॉर्म ना करने का आरोप मढ़ना एक हद तक ज्यादती और सख्ती का बरताव करना कहलाएगा क्योंकि जाहिर सी बात है कि जीएसटी काउंसिल में विपक्षी दल सरकार का साथ नहीं देते.

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बीजेपी ने बांधी बिल्ली के गले में घंटी

साथ ही, यह कहना भी एक पाखंड ही है कि सरकार ने जीएसटी पर अमल का फैसला समय से पहले ले लिया क्योंकि जीएसटी सिर्फ बीजेपी का ही नहीं विपक्ष का भी चहेता ‘बबुआ' रहा है और एक बात यह भी है कि अगर आप में कूबत नहीं है तो फिर आपके लिए किसी मोर्चे पर कोई भी फैसला लेने की घड़ी कभी नहीं आने वाली.

बिल्ली के गले में घंटी बांधने का काम किया है मोदी सरकार ने और उसे इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए. नोटबंदी और जीएसटी का फैसला जरुरी था और लिया गया लेकिन याद रखना होगा कि साहसी फैसले जब लिए जाते हैं तो उनकी अनिवार्य रुप से आलोचना होती है और ऐसी आलोचनाओं की अनदेखी भी समान रुप से साहस की मांग करती है.

नोटबंदी और जीएसटी, दोनों ने अर्थव्यवस्था को मुख्यधारा में लाने के लिहाज से जो काम किया है वैसा बीते वक्त में किसी उपाय से नहीं हो सका. लेकिन इसके नतीजों के आने में कुछ साल लगेंगे जैसा कि किसी कंपनी के साथ होता है-कंपनी निवेश करती है और फिर उसे इंतजार करना होता है कि कुछ अरसा बीते तो उसके उत्पाद की बिक्री में उछाल आये. अगर यशवंत सिन्हा जैसा कोई राजनेता बीजेपी के सबसे कद्दावर नेताओं की आलोचना करता है तो माना यही जाएगा कि उसने सच्चाई को पूरा नहीं अधूरा समझा और ऐसा हुआ क्योंकि सच्चाई को देख पाने वाली उसकी नजर में ही खोट था.

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