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उचित इलाज के बिना हिरासत में ही गुजर गए थे चारू मजुमदार

सीपीआई के अध्यक्ष श्रीपाद अमृत डांगे ने चारू मजुमदार के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा था कि हमारा उनसे वैचारिक मतभेद जरूर था, पर उसके बावजूद हम मानते थे कि वो एक ईमानदार और निर्भीक क्राांतिकारी थे

Updated On: Jul 23, 2018 07:13 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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उचित इलाज के बिना हिरासत में ही गुजर गए थे चारू मजुमदार

गिरफ्तारी के 13 दिन के भीतर ही चारू मजुमदार का हिरासत में ही निधन हो गया था. मौत के बाद उनकी पत्नी लीला मजुमदार ने आरोप लगाया था कि उन्हें न तो उचित भोजन दिया गया था न ही दवाएं. उन्हें ग्लास की जगह पानी पीने के लिए मिट्टी का पात्र दिया गया था.

मार्क्सवादी-लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी के संस्थापक चारू मजुमदार को सीपीआई नेता एस.ए.डांगे से लेकर जनसंघ नेता अटल बिहारी वाजपेयी तक ने भी श्रद्धांजलि दी थी. याद रहे कि उन्हें 16 जुलाई, 1972 को सुबह 3 बजे मध्य कोलकाता के मिडिल रोड स्थित एक मकान से गिरफ्तार किया गया था. 28 जुलाई को कोलकाता के एस.एस.के.एम.अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई थी. डाक्टरों के अनुसार दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हुआ. उन्हें इससे पहले भी दो बार दिल के दौरे पड़ चुके थे. 54 साल के मजुमदार दमा के भी मरीज थे.

पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने कहा था कि उन्हें बचाने की हर संभव कोशिश की गई थी, पर उसमें सफलता नहीं मिली. लीला मजुमदार उन्हें हिरासत में कुछ फल और मिठाई देना चाहती थींं, पर पुलिस ने उन्हें इसकी इजाजत नहीं दी. चूंकि मृत्यु हिरासत में हुई थी, इसकी कानूनी औपचारिकता का निर्वाह किया गया. शव का पोस्टमॉर्टम हुआ और मजिस्ट्रेट से इसकी जांच कराई गई.

Charu Majumdar Wife Leela

चारू मजुमदार की पत्नी लीला मजुमदार (फोटो: फेसबुक से साभार)

'जीवन भर एक ईमानदार और निर्भीक क्राांतिकारी थे चारू मजुमदार'

मजुमदार का शव उनके रिश्तेदारों को नहीं दिया गया. पुलिस की देखरेख में कड़े पहरे के बीच उनका अंतिम संस्कार किया गया. हां, शव यात्रा में उनके अत्यंत करीबी रिश्तेदारों को पुलिस ने जरूर शामिल होने दिया. सीपीआई के अध्यक्ष श्रीपाद अमृत डांगे ने चारू मजुमदार के निधन पर शोक प्रकट करते हुए कहा था कि हमारा उनसे वैचारिक मतभेद जरूर था, पर उसके बावजूद हम मानते थे कि वो एक ईमानदार और निर्भीक क्राांतिकारी थे. जनसंघ के अध्यक्ष अटल बिहारी वाजपेयी और समाजवादी पार्टी के नेताओं ने भी मजुमदार के आकस्मिक निधन पर शोक प्रकट किया और उनकी हिरासत में मौत की सर्वदलीय जांच की मांग की.

चीन की तरह इस देश में भी सशस्त्र क्रांति की कोशिश में लगे मजुूदार की गिरफ्तारी के लिए पुलिस 1967 से ही प्रयत्नशील थी. उनकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस ने 10 हजार रुपए के इनाम की घोषणा कर रखी थी. अंत में कोलकाता में जब उन्हें गिरफ्तार किया गया तो उनके साथ पुलिस ने दल की केंद्रीय कमेटी के सदस्य दीपक विश्वास, उनके चिकित्सक डॉ.अनल राय और नीलिमा बनर्जी को भी गिरफ्तार किया. कोलकाता के तत्कालीन पुलिस आयुक्त आर.एन.चटर्जी ने बताया कि डॉ.अनल राय भी मजुमदार के शिष्य हैं और नीलिमा भी मार्क्सवादी लेनिनवादी कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य हैं.

पुलिस आयुक्त ने बताया कि चारू मजुमदार को नक्सलियों के एक संदेशवाहक से मिली सूचनाओं के आधार पर गिरफ्तार किया गया. 10 सिपाहियों के दल ने उस मकान पर धावा बोला था, जहां मजुमदार रह रहे थे. दरवाजा खुला तो सिपाहियों ने देखा कि मजुमदार एक कमरे में चारपाई पर बैठे थे. किसी ने न तो प्रतिरोध किया और न ही भाग निकलने की कोशिश की.

पुलिस ने कमरे में कुछ गुप्त दस्तावेज, दवाओं का बक्सा, एक छोटा ऑक्सीजन सिलेंडर और 14 हजार 600 रुपए नकद बरामद किए. मजुमदार या उनके साथियों के पास कोई हथियार नहीं था.

Charu Majumdar with Kanu Sanyal

कानू सान्याल के साथ चारू मजुमदार (फोटो: फेसबुक से साभार)

डॉक्टर ने बताया कि हिरासत में चारू मजुमदार का स्वास्थ्य संतोषजनक नहीं है

मजुमदार को लाल बाजार थाना लाया गया जहां उन्होंने रात बिताई. एक हृदय रोग चिकित्सक ने बताया कि मजुमदार का स्वास्थ्य अधिक संतोषजनक नहीं है. गिरफ्तारी के बाद कुछ संवादाताओं और फोटोग्राफरों को उनसे मिलने की अनुमति दी गई. उन्हें देखकर मजुमदार मुस्कराए पर उनसे बातचीत करने की अनुमति नहीं दी गई. वो शर्ट और पैंट पहने हुए थे. उनकी आंखें असाधारण रूप से चमक रही थीं.

बाद में मजुमदार को सियालदह के मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया. उन पर हत्याओं और सरकार के खिलाफ युद्ध छेड़ने का आरोप लगाया गया. मजुमदार जिस फ्लैट से गिरफ्तार किए गए, वो लोहे के कारखाने में काम कर रहे एक कर्मचारी का था. कर्मचारी ने लोगों से यह कहा था कि वह यानी चारू मजुमदार उसके मामा हैं.

गिरफ्तारी से पहले जिस संदेशवाहक को पुलिस ने पकड़ा था, उससे कुछ पत्र बरामद किए गए थे. उसे वो राज्य के विभिन्न हिस्सों में पहुंचाना चाहता था. पुलिस तहकीकात में उसने कुछ सूचनाएं दीं. उन सूचनाओं के आधार पर 10 सिपाहियों का दल मजुमदार को पकड़ने के लिए भेजा गया. यह वो ही पुलिस पार्टी थी जिसने नवंबर 1971 में देवघर से मशहूर नक्सली नेता असीम चटर्जी और 2 अन्य नक्सलियों को गिरफ्तार किया था.

चारू मजुमदार की गिरफतारी के बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने यह तर्क भी पेश किया कि हमने उन्हें गिरफ्तार कर के उन्हें उन नक्सलियों द्वारा मारे जाने से बचाया गया है जिन लोगों से मजुमदार के वैचारिक मतभेद चल रहे हैं.

अपने साथियों के साथ बीच में लूंगी पहने हुए चारु मजूमदार (तस्वीर: भाकपा माले की वेबसाइट से साभार)

अपने साथियों के साथ बीच में लुंगी पहने हुए चारु मजुमदार (तस्वीर साभार: भाकपा माले की वेबसाइट से)

मई दिवस के अवसर पर भाकपा-माले की स्थापना की थी

मजुमदार के निधन से पहले राज्य के गृह मंत्री सुब्रत मुखर्जी ने हिरासत में उनसे भेंट की थी. पुलिस सूत्रों ने बताया कि उनकी बातचीत का स्वरूप राजनीतिक था. चारू मजुमदार को सन 1967 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने निकाला गया था. सन 1969 के मई दिवस के अवसर पर उन्होंने भाकपा-माले की स्थापना की थी. वो उसके महासचिव बनाए गए थे.

चारू मजुमदार का जन्म सन 1918 में बंगाल के सिलीगुड़ी में एक संपन्न परिवार में हुआ था. उनके पिता स्वतंत्रता सेनानी थे. भले ही उनके तरीके पर कई लोगों को मतभेद हो, पर वो जीवन भर गरीबों की खुशहाली के लिए ही संघर्ष करते रहे. चारू मजुमदार पहले कांग्रेस में थे. बाद में उन्होंने सीपीआई ज्वाइन किया था. उन पर छपी किताब का नाम ‘रिचेज टू रैग्स’ है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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