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2019 में मोदी के पास गठबंधन के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा !

मैं पहले भी लिख चुका हूं कि अल्पमत सरकार और खिचड़ी गठबंधन ने भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास को बाधित नहीं किया है.

Aakar Patel Updated On: Jun 04, 2018 07:42 PM IST

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2019 में मोदी के पास गठबंधन के सिवा कोई विकल्प नहीं होगा !

हाल में देशभर में हुए उपचुनावों में भारतीय जनता पार्टी की हार के बाद 2019 के लोकसभा चुनाव नतीजों को लेकर अटकले लगने लगी हैं. हम इस मसले पर पहले ही राज्यवार विचार-विमर्श कर चुके हैं और मैं अब इस काम को दोहराना नहीं चाहता.

मौजूदा हालात को देखते हुए इस बात को मानना वाजिब जान पड़ता है कि अगर विपक्ष का बड़ा हिस्सा एकजुट रहता है, तो भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के लिए लोकसभा में 210 से काफी ज्यादा सीटें बरकरार रखना मुश्किल होगा.

BJP के ही सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरकर आने की संभावना ऐसी हालत में बीजेपी का आकार पिछली यूपीए सरकार में कांग्रेस की हैसियत के आसपास हो जाएगा. मौजूदा राजनीतिक हालात के हिसाब से देखा जाए, तो मुझे यह पूरी तरह से मुमकिन जान पड़ता है कि अगले लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (संख्या बल के हिसाब से) ही सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आए.

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि बीजेपी अगले लोकसभा चुनाव के बाद भी सबसे बड़ी पार्टी की अपनी हैसियत बरकरार रखेगी और ऐसे में पार्टी नेतृत्व को राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के तहत नए तरह के गठबंधन का विकल्प उपलब्ध होगा. वैसी क्षेत्रीय पार्टियां जो फिलहाल एनडीए के दायरे में नहीं हैं, लेकिन कभी इसका हिस्सा रही हैं, वे भी फिर से इस कुनबे में शामिल हो सकती हैं. मसलन कुछ तमिल पार्टियां राष्ट्रीय प्रजातांत्रिक गठबंधन का हिस्सा हो सकती हैं.

बाकी पार्टियां जो कभी इस गठबंधन में थीं, लेकिन अब बीजेपी की अगुवाई वाले गठबंधन एनडीए की विरोधी बन चुकी हैं, वे भी एक बार फिर इसका हिस्सा बन सकती हैं या फिर दोनों गठबंधनों (बीजेपी या कांग्रेस की अगुवाई वाले) से बराबर दूरी बना सकती हैं. चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देसम पार्टी और नवीन पटनायक की बीजू जनता दल दो ऐसी पार्टियां हैं. इसके अलावा, कई और राजनीतिक पार्टियां भी हैं, जो दोनों में से किसी के साथ नहीं जाना पसंद करें. लिहाजा, अगर भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा में मौजूदा सीटों की संख्या के मुकाबले 70 या 80 सीटों का भी नुकसान होता है, तो भी उसके लिए संभावना बननी चाहिए और शायद पार्टी के लिए सत्ता में वापसी आसान हो.

मोदी ने हमेशा बहुमत और दबदबे वाली सरकार चलाई है

Narendra Modi at Delhi End TB summit

दो चीजें काफी दिलचस्प होंगी. पहला यह कि सीटों के तौर पर होने वाले नुकसान और बहुमत गंवाए जाने को लेकर पार्टी में आंतरिक तौर पर किस तरह की प्रतिक्रिया होती है? दूसरी, चीज यह कि पार्टी नेतृत्व किस तरह से उन दलों को समर्थन के लिए राजी करता है, जो विरोध में हैं.

पहला मामला नरेंद्र मोदी के लिए पूरी तरह नई स्थिति जैसा होगा. पाठकों को यह याद होगा कि मोदी एक भी चुनाव लड़े बिना ही गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने हमेशा बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व किया है.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और बीजेपी के नेतृत्व को लगा कि गुजरात में गुटबाजी के कारण पैदा हुए विभाजन के हालात को दुरुस्त करने की जरूरत है और इस दिक्कत को ध्यान में रखते हुए नरेंद्र मोदी को लाया गया. मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री पद संभालने के कुछ ही समय बाद राज्य का माहौल काफी गर्म हो गया.

उसके बाद मोदी ने अपनी सरकार को लगातार जीत दिलाई. हालांकि, मुख्यमंत्री के तौर पर उनका अनुभव वैसी सरकारें चलाने का रहा है, जहां उनके पास पूर्ण बहुमत था। बतौर मुख्यमंत्री उनके पास राज्य सरकार में अक्सर दो-तिहाई बहुमत रहा.

नरेंद्र मोदी ने राज्य में जीत के साथ मिली ताकत का इस्तेमाल गुजरात बीजेपी पर पूरी तरह से प्रभुत्व हासिल करने में किया. गुजरात बीजेपी के पुराने और राज्य में पार्टी को खड़ा करने वाले अग्रणी नेताओं मसलन केशुभाई पटेल और काशीराम राणा आदि को मोदी की अगुवाई वाले पार्टी और सरकार के नए निजाम में किनारे कर दिया गया.

काशीराम राणा छह बार लोकसभा के सदस्य रह चुके हैं. इन नेताओं के बदले सभी नए चेहरों को लाया गया गया। वे सभी लोग मोदी के वफादार थे. मोदी ने खुद से अपने कैबिनेट का भी चुनाव किया और इस पर उनका दबदबा भी रहा. साथ ही, उन्होंने राज्य के कई अहम मंत्रालय अपने पास ही रखे.

अमित शाह को आज देश में दूसरा सबसे ताकतवर नेता माना जाता है और जाहिर तौर पर वह हैं भी. हालांकि, यह भी याद रखना जरूरी है कि जिस दशक में वह गुजरात में मोदी सरकार में रहे, उस वक्त मोदी ने उन्हें कैबिनेट रैंक तक नहीं दे रखी थी. गुजरात मंत्रिमंडल में वह महज राज्य मंत्री थे.

नरेंद्र मोदी के संपूर्ण दबदबे का मतलब यह था कि पार्टी में बाकी के लिए कोई विकल्प नहीं था. मोदी ने गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर पार्टी और सरकार में जिन लोगों को किनारे किया था, उनके लिए किसी भी तरह से वापस आने की गुंजाइश इसलिए नहीं थी, क्योंकि मोदी लगातार चुनाव जीत रहे थे. ऐसी अफवाह भी उड़ी थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सत्ता पर उनके वर्चस्व को लेकर नाखुश है, लेकिन इसका कोई नतीजा नहीं निकला. हकीकत यह है कि उन्होंने आरएसएस के कुछ नेताओं को गुजरात में स्थापित भी किया.

पार्टी की आंतरिक चुनौती से भी निपटना होगी मोदी को

बहरहाल, 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले मोदी के शानदार कैंपेन के कारण दिल्ली में भी ऐसे हालात बन गए और ऐसे माहौल में वह निर्विवाद रूप से पार्टी के नेता बन चुके थे. इससे कुछ वक्त पहले पार्टी में उनकी उम्मीदवारी को लेकर कुछ मतभेद थे, लेकिन भारतीय जनता पार्टी हमेशा से कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा अनुशासित थी.

BJP leader Advani listens to BJP prime ministerial candidate Modi during a workers' party meeting at Gandhinagar

लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे पार्टी के पुराने नेताओं को किनारे कर दिया गया. सुषमा स्वराज जैसे बाकी नेताओं को सरेंडर करना पड़ा. भारतीय जनता पार्टी को एक बड़े खुश परिवार की तरह देखा जाता है, लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है. बाकी पार्टियों की तरह बीजेपी में भी ऐसे कई नेता हैं, जो खुद को अपने लिए उपलब्ध मौजूदा रोल के मुकाबले ज्यादा क्षमतावान मानते हैं और उन्हें लगता है कि उन्हें जानबूझकर दबाकर रखा जा रहा है.

भारतीय जनता पार्टी को सिर्फ 210 सीटें मिलने की स्थिति में पार्टी के इन नेताओं की सक्रियता कुछ अलग तरह से होगी, जबकि फिलहाल वे ऐसा नहीं कर रहे हैं. इनमें मुख्यमंत्री पद की कुर्सी संभाल रहे क्षेत्रीय नेता, राष्ट्रीय स्तर के नेता और छोटे गुट भी शामिल हैं, जो लॉबी ग्रुप की तरह एक साथ आ जाएंगे.

ऐसी स्थिति होने पर यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि अपने राजनीतिक जीवन में पहली बार बिना बहुमत की स्थिति में होने पर मोदी किस तरह से महत्वाकांक्षाओं और मतभेदों से निपटते हैं.

दूसरी अहम चुनौती सहयोगी पार्टियों से तालमेल बिठाने की होगी. 210 सीटों के आंकड़े की हालत में प्रधानमंत्री की हालत मनमोहन सिंह जैसी होगी. यूपीए के इस नेता को गलत तरीके से कमजोर माना जाता था. दरअसल, इस कमजोरी को इस शख्स की पोजिशन के बजाय उनकी निजी नाकामी के संदर्भ में देखा जाता था, जबकि उनकी गतिविधियों पर एक तरह से सहयोगी दलों और अन्य का काफी हद तक नियंत्रण था. इस तरह के सहयोगियों से रक्षा या बचाव के मामले में शहादत के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है. सरकार का त्याग कर या अपनी पोजिशन को छोड़कर ही कोई आगे बढ़ सकता है.

गठबंधन सरकारों से देश का सामाजिक-आर्थिक विकास बाधित नहीं होता अगर कोई बिना बहुमत वाली सरकार का नेतृत्व करना चाहता है, तो उसे सहयोगियों की आकांक्षाओं और हसरतों के लिए गुंजाइश बनानी पड़ेगी. ये सब भी कुछ ऐसी ही चीजें है, जो मोदी को पहले कभी करने की जरूरत नहीं पड़ी है. अल्पमत की सरकार चलाने के लिए लचीलापन और अपमान को बर्दाश्त करने की क्षमता की दरकार होती है. सहयोगी दल यह पक्का करेंगे कि सरकार पर उनकी पकड़ सार्वजनिक तौर पर नजर आए और जाहिर तौर पर उनके लिए इसका मतलब सरकार को कई मौकों पर झुकाना होगा.

यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि मोदी इन सब चीजों के कैसे पार पाते हैं. खास तौर पर हममें से वैसे लोगों की इसमें और दिलचस्पी होगी, जिन्होंने उनके (मोदी) तूफानी रफ्तार वाले करियर ट्रैक पर बारीक नजर रखी है.

मैं पहले भी लिख चुका हूं कि अल्पमत सरकार और खिचड़ी गठबंधन ने भारत के सामाजिक और आर्थिक विकास को बाधित नहीं किया है. जिन लोगों को अल्पमत सरकार या 'कमजोर' बीजेपी की आशंका सता रही है, उन्हें निराश नहीं होना चाहिए. गठबंधन खराब नहीं होते. यह देखना दिलचस्प और ज्ञानवर्द्धक होगा कि मोदी इससे किस तरह से निपटते हैं.

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