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70 प्रतिशत आरक्षण की शर्त से क्या युवाओं का पलायन रोक पाएंगे कमलनाथ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राज्य में स्थापित उद्योगों में सत्तर प्रतिशत स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की शर्त लगाकर एक नए विवाद को जन्म दिया है.

Updated On: Dec 18, 2018 09:07 PM IST

Dinesh Gupta
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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70 प्रतिशत आरक्षण की शर्त से क्या युवाओं का पलायन रोक पाएंगे कमलनाथ

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने राज्य में स्थापित उद्योगों में सत्तर प्रतिशत स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की शर्त लगाकर एक नए विवाद को जन्म दिया है. कमलनाथ सत्तर प्रतिशत की शर्त के जरिए राज्य के युवाओं का पलायन रोकना चाहते हैं. राज्य की पुरानी औद्योगिक नीति में पचास प्रतिशत स्थानीय व्यक्तियों को रोजगार देने की शर्त थी. शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने वर्ष 2014 में अपनी नई औद्योगिक नीति में इस शर्त को हटा दिया था.

बेंगलूरु और पुणे में जाकर नौकरी करना युवाओं की मजबूरी

मध्यप्रदेश में शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 24 लाख से अधिक बताई जाती है. ये वो संख्या है जो कि रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत बेरोजगारों की है. जबकि वास्तविक बेरोजगारों की संख्या एक करोड़ से अधिक बताई जाती है. एनसीआरबी के आकंड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा 53 प्रतिशत लोगों ने बेरोजगारी के कारण गत वर्ष आत्महत्या की है. राज्य महिला अपराधों में भी नंबर एक पर है.

कमलनाथ

कमलनाथ

व्यापमं घोटाला उजागर होने के बाद सरकारी नौकरियों पर अघोषित पाबंदी लगी हुई है. राज्य के युवाओं के पास निजी क्षेत्र में काम करने के विकल्प भी काफी सीमित हैं. राज्य में नई औद्योगिक इकाइयां भी बड़े पैमाने पर स्थापित नहीं हुईं हैं. जबकि निवेश को लुभाने के लिए शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने कई तरह की रियायतें और सुविधाएं देने का प्रावधान अपनी औद्योगिक नीति में किया था. सबसे ज्यादा बेरोजगार आईटी सेक्टर के हैं.

इस सेक्टर में पढ़ाई करने वाले युवाओं को रोजगार की तलाश में बेंगलुरु और पूणे जैसे शहरों की ओर रुख करना पड़ता है. विधानसभा के इस चुनाव में बेरोजगारी बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है. कांग्रेस ने अपने चुनावी वचन पत्र में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया था कि पचास करोड़ रुपए से अधिक की लागत से स्थापित होने वाले उद्योग यदि प्रदेश के युवाओं को रोजगार देते हैं तो उनके वेतन की पच्चीस प्रतिशत राशि, जो अधिकतम दस हजार रुपए प्रतिमाह होगी, की प्रतिपूर्ति सरकार द्वारा की जाएगी.

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वेतन अनुदान की राशि पांच साल तक दिए जाने का वचन दिया गया है. कांग्रेस ने अपने वचन पत्र में सरकारी नौकरियों में उन लोगों को प्राथमिकता देने का वादा भी किया है, जिन्होंने दसवीं अथवा बारहवीं की परीक्षा मध्यप्रदेश से उत्तीर्ण की हो. कमलनाथ ने सोमवार को मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद साफ शब्दों में कहा कि उनकी प्राथमिकता होगी कि राज्य में स्थापित होने वाले उद्योगों में 70 प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को मिले.

कमलनाथ ने कहा था कि बिहार और उत्तरप्रदेश से आकर लोग राज्य के युवाओं का हक छिन लेते हैं. कमलनाथ ने यह भी स्पष्ट किया था कि वे उत्तरप्रदेश और बिहार के लोगों के विरोधी नहीं हैं. कमलनाथ की इस सफाई के बाद भी उन पर क्षेत्रीयता को बढ़ावा देने के आरोप लग रहे हैं. उनकी तुलना महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के प्रमुख राज ठाकरे से की जाने लगी है.

मध्यप्रदेश में ऐसे कई औद्योगिक क्षेत्र हैं, जहां कारखानों में काम करने वाले ज्यादतर मजदूर उत्तरप्रदेश और बिहार के हैं. खासकर वे इलाके जो कि यूपी और बिहार की सीमा से लगे हुए हैं. यूपी-बिहार से मजदूरों के राज्य में आ जाने से स्थानीय लोगों को कारखाने में मजदूरी का काम भी नहीं मिल पाता है.

शिवराज ने 2014 की औद्योगिक नीति से हटाई थी शर्त

शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री के तौर पर वर्ष 2008 में जो औद्योगिक नीति लागू की थी, उसमें यह शर्त रखी गई थी कि राज्य में निवेश करने के लिए इच्छुक उद्योगपतियों को विभिन्न सुविधाएं इसी शर्त पर दी जाएंगी जबकि वे अपनी इकाई में पचास प्रतिशत रोजगार स्थानीय लोगों को देंगे.

इस तरह की शर्त रखने के पीछे वजह उद्योग को अधिग्रहित कर दी जाने वाली भूमि थी. किसान स्वेच्छा अपनी जमीन के अधिग्रहण के लिए तैयार हो जाएं, इसके लिए मुआवजे के अलावा रोजगार उपलब्ध कराने का वादा भी सरकार की ओर से किया गया था.

Shivraj Singh

वर्ष 2008 के बाद राज्य में उद्योगों के लिए बड़े पैमाने पर जमीनों का अधिग्रहण किया गया. इसके बाद कारखाने स्थापित नहीं हुए. किसानों के हाथ से जमीन चली गई. रोजगार भी नहीं मिला. राज्य के कई जिलों में अलग-अलग समय पर लोगों ने अपनी जमीन वापस लेने के लिए आंदोलन भी किए.

इन आंदोलनों के बाद ही वर्ष 2014 की नई औद्योगिक नीति में शिवराज सिंह चौहान ने पचास प्रतिशत स्थानीय लोगों को अनिवार्य रूप से रोजगार देने की शर्त को हटा दिया. वर्ष 2014 की औद्योगिक नीति वर्तमान में प्रचलित है. मुख्यमंत्री कमलनाथ यदि 70 प्रतिशत लोगों को निजी क्षेत्र में रोजगार देना चाहते हैं तो उन्हें नीति और नियम भी बदलने पड़ेंगे.

सरकारी नौकरियों में राज्य के बाहर के लोगों को रोकना होगा मुश्किल

राज्य के बेरोजगार लगातार सरकार पर यह दबाव डालते रहे हैं कि राज्य की प्रशासनिक सेवाओं सहित सभी शासकीय सेवाओं की भर्ती में प्राथमिकता सिर्फ मूल निवासियों को ही दी जानी चाहिए. शिक्षकों की भर्ती स्थानीय स्तर पर किए जाने की मांग भी उठती रही है. वर्ष 2005 में पहली बार बीजेपी सरकार ने बाहरी राज्यों के लोगों की भर्ती रोकने पर विचार भी किया था.

विधि विशेषज्ञों ने सरकार के इस प्रयास को यह राय देकर असफल कर दिया कि इससे संविधान के अनुच्छेद चौदह और सोलह के उल्लंघन होगा. राज्य में सरकारी क्षेत्र में निकलने वाली नौकरियों में बड़ी संख्या में बिहार और उत्तरप्रदेश के युवा भी हिस्सा लेते हैं.

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इन राज्यों की शिक्षा का स्तर मध्यप्रदेश से बेहतर होने के कारण अधिकांश पदों पर यह चयनित भी हो जाते हैं. शिक्षा का स्तर ऊपर उठाना मध्यप्रदेश की विभिन्न दलों की सरकारों की प्राथमिकता कभी नहीं रही है.

शिक्षा के क्षेत्र में राजनीतिक दल की विचारधारा के अनुसार पाठ्यक्रम में बदलाव करने की परंपरा रही है. राज्य में स्तरीय इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेज भी नहीं हैं. कहा जाता है राज्य में चल रहे ज्यादतर इंजीनियरिंग कॉलेज भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के हैं.

इन इंजीनियरिंग कॉलेजों में मापदंड के अनुसार फैकल्टी भी उपलब्ध नहीं है. ये कॉलेज सिर्फ डिग्री देने का काम कर रहे हैं. पिछले कुछ सालों में सरकारी क्षेत्र की कार्मिक नीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला था. सरकारी विभाग नई भर्ती करने के बजाए आउटसोर्स एजेंसी के जरिए सरकारी काम कर रहे हैं.

पंद्रह साल में बदल गई पंचायती राज की अवधारणा

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वर्ष 1994 में संविधान के 73 वें एवं 74 वें संविधान संशोधन के बाद मध्यप्रदेश में सबसे पहले त्रिस्तरीय पंचायत राज व्यवस्था स्थापित की गई थी. इसका श्रेय तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को मिला था. दिग्विजय सिंह ने पंचायती राज को सशक्त बनाने के लिए स्थानीय स्तर पर ही सरकारी भर्तियां किए जाने के नियम भी बनाए थे.

स्कूलों के लिए शिक्षकों की भर्ती और अस्पतालों के लिए आवश्यक अमले की भर्ती जिला पंचायत स्तर पर की जाती थी. राज्य में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने के बाद स्थानीय निकायों से भर्ती का काम वापस ले लिया गया था.

सभी सरकारी भर्तियां व्यापमं के जरिए की जाने लगी थीं. पंचायत को यह अधिकार भी दिया गया था कि वे हैंड पंप मैकेनिक जैसे जरूरी अमले की नियुक्ति में गांव के ही लोगों को प्राथमिकता दे. शहरी निकायों में भी इसी तरह की व्यवस्था की गई थी. इसके पीछे सरकार की मंशा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध मानव संसाधन का उपयोग स्थानीय स्तर पर करने की थी.

इस व्यवस्था के कारण एक जिले के युवकों को दूसरे जिले में पलायन करने का अवसर भी नहीं मिलता था. भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने संविदा आधार पर नियुक्त किए गए गए टीचरों के भी ट्रांस्फर करना शुरू कर दिए. इससे दूरदराज के गांव शिक्षक विहीन हो गए.

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