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जयललिता की मौत से शशिकला को मिल सकती है कानूनी राहत?

जयललिता के जीवित न रहने और उनपर से आरोप खत्म होने के बावजूद शशिकला पर केस बना हुआ है.

Updated On: Dec 11, 2016 11:32 AM IST

Sandhya Ravishankar

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जयललिता की मौत से शशिकला को मिल सकती है कानूनी राहत?

पोएस गार्डन स्थित तमिलनाडु की दिवंगत मुख्यमंत्री जयललिता के घर में चर्चाओं का दौर जारी है.

उनकी हमराज, साथी और जिन्हें वे अक्सर अपनी ‘बहन’ कहकर बुलाया करती थीं, शशिकला नटराजन अभी भी जयललिता के घर ‘वेद निलयम’ में रह रही हैं.

महत्वाकांक्षी शशिकला

वे लगातार मंत्रियों को बैठकों के लिए बुला रही हैं. अगर सूत्रों की मानी जाए तो शशिकला इस समय एआईएडीएमके पार्टी के महासचिव पद पर बैठने के लिए समर्थन जुटा रही हैं.

1972 में पार्टी की शुरुआत होने के बाद से अब तक महासचिव का पद सिर्फ दो लोगों ने संभाला है- पार्टी संस्थापक और भूतपूर्व मुख्यमंत्री एमजी रामचंद्रन और उनके बाद जे.जयललिता ने.

अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए, शशिकला जैसे-जैसे आगे बढ़ रहीं हैं, वैसे-वैसे उनके सिर पर खतरे की तलवार लटक रही है.

यह तलवार है 58 करोड़ की गैरकानूनी संपत्ति रखने का मामला. इस पर अभी भी सुप्रीम कोर्ट में की गयी अपील के फैसले का इंतजार हो रहा है.

शशिकला और जयललिता

शशिकला और जयललिता

फ़र्स्टपोस्ट ने कर्नाटक सरकार की ओर से केस की देख-रेख कर रहे सरकारी वकील बी वी आचार्य से इस मुद्दे पर बातचीत की.

आचार्य ने बताया कि, ‘मुख्य आरोपी जयललिता के जीवित न रहने और उनपर से आरोप खत्म होने के बावजूद शशिकला, उनकी भाभी इलावरसी और भतीजे वी.एन. सुधाकरण पर केस अभी भी बना हुआ है.’

आचार्य के अनुसार, ‘इस केस में साजिश रचने का भी आरोप शामिल है. अब इसमें केवल जयललिता के खिलाफ की गयी अपील खत्म होगी. केस पर बहस खत्म हो चुकी है और अब कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जा रहा है. कोर्ट की तरफ से मुकदमे को फैसले के लिए सुरक्षित किये जाने के बाद आरोप खत्म नहीं किये जा सकते हैं. कोर्ट हर हाल में अपना फैसला सुनाएगा.’

19 साल पुराना मामला

डीए केस के नाम से मशहूर आय से अधिक संपत्ति का मामला 19 साल पुराना है. जब 1996 में डीएमके सरकार ने अपनी प्रतिद्वंद्वी जयललिता और चार अन्य लोगों पर 66 करोड़ रुपये की गैरकानूनी संपत्ति रखने के आरोप में केस दर्ज किया था.

2014 में बंगलुरु की स्पेशल कोर्ट ने सभी चारों आरोपियों को गैरकानूनी संपत्ति रखने का दोषी करार देते हुए उन्हें 4 साल की जेल की सजा और 100 करोड़ रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी.

जयललिता, शशिकला और अन्य दोनों आरोपी 21 दिन जेल में बिताने के बाद बेल पर बाहर आ गए थे.

jAYALALITHA-facebook

कर्नाटक हाईकोर्ट में की गयी एक अपील में ट्रायल कोर्ट का फैसला बदल दिया गया था और सभी चारों आरोपियों को बरी कर दिया गया था.

केस के बंगलुरु में शिफ्ट होने के बाद कर्नाटक सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी. इस साल जून में जस्टिस पी.सी. घोष और अमिताभ रॉय ने इस साल के जून महीने में आदेश सुरक्षित किया था.

शशिकला पर लटकती कानून की तलवार  

आचार्य के अनुसार, ‘यह केवल प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट’ का मामला नहीं है. ‘साजिश रचने का आरोप अलग से है.’

अगर इसके एक आरोपी की मौत भी हो जाती है तो भी केस जारी रहेगा.

सीनियर वकील आचार्य, साल 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरफ भी इशारा करते है, जो इस मुद्दे पर कानूनी बिन्दुओं को स्पष्ट करता है.

वे नई दिल्ली के सीबीआई बनाम जितेंदर सिंह केस का हवाला देते हैं, जिसमें जस्टिस राधाकृष्णन और ए.के. सिकरी ने यह स्पष्ट किया था कि, ‘किसी खास केस के लिए बनाया गया स्पेशल कोर्ट, ट्रायल के बीच में ही मुख्य आरोपी की मृत्यु होने के बाद भी, उससे जुड़े दूसरे आरोपियों की सुनवाई कर सकता है.’

यह फैसला कहता है, ‘हम उस स्थिति की कल्पना कर सकते हैं, जहां एक सरकारी अफसर की, किसी सुनवाई के अंतिम चरण में मौत हो जाती है, तब तक बहुत सारे गवाहों से पूछताछ की जा चुकी होती है. अगर ऐसे में ये मान लिया जाए कि उस एक व्यक्ति की मौत से पूरी जांच ही बर्बाद हो गई है तो ये जांच और पीसी एक्ट के उद्देश्य को ही खत्म कर देती है.’

पीसी एक्ट को भ्रष्टाचार से लड़ने और भ्रष्टाचार व रिश्वतखोरी के केसों की सुनवाई मे तेजी लाने के उद्देश्य से लाया गया था.

'पीसी एक्ट का मकसद भ्रष्टाचार-विरोधी कानूनों को मजबूत करना है. ताकि कोर्ट की कार्यवाही में तेजी लाया जा सके. यह एक्ट पीसी केसों के रोजाना ट्रायल की व्यवस्था करता है. साथ ही साथ बातचीत कर फैसलों पर पुनर्विचार करने और स्टे लगाने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखता है.

पीसी एक्ट के पेज 36 पर यह सब दर्ज है.इस वजह से स्पेशल जज द्वारा पीसी एक्ट अपराधों के साथ-ही-साथ गैर पीसी अपराधों के खिलाफ पीसी एक्ट के सेक्शन 4 के सब-सेक्शन (3) तहत आने वाले अधिकार प्रयोग में लाने के बाद मुख्य जनप्रतिनिधि की मौत होने पर भी स्पेशल जज के अधिकार-क्षेत्र पर या शेष कार्यवाही पर रोक नहीं लगायी जा सकती है.'

वरिष्ठ वकील केएम विजयन का कहना है, 'सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही यह स्पष्ट कर दिया है.अगर ए 1 (पहला आरोपी) पीसी (भ्रष्टाचार-रोकथाम) एक्ट के अंतर्गत आता है लेकिन अन्य आरोपी गैर-पीसी एक्ट के तहत आते हैं. साथ ही साथ अगर केस स्पेशल कोर्ट में चल रहा है; कोर्ट केवल पीसी एक्ट तक सीमित नहीं रहता. स्पेशल कोर्ट के पास पीसी एक्ट के अलावा गैर-पीसी एक्ट के ट्रायल के लिए विशेषाधिकार मौजूद हैं.

सुप्रीम कोर्ट अपने इस फैसले में कह चुका है कि ऐसे केसों में भले ए 1 की मौत हो जाती है; फिर भी ए 2, ए3 और ए 4 (मतलब यानी आरोपियों) के खिलाफ केस नहीं हटाये जायेंगे.'

वे आगे कहते हैं, 'अब सुप्रीम कोर्ट ए 2, ए3 और ए 4 (यानी आरोपियों) के खिलाफ दर्ज मामले में नए सिरे से सुनवाई के लिए कह सकता है. लेकिन एक जनप्रतिनिधि की मौत होने के कारण केस निश्चित तौर पर खत्म नहीं किया जायेगा.'

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‘बच निकलना संभव’

सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील के.टी.एस तुलसी ने फ़र्स्टपोस्ट से बातचीत करते हुए इस केस के कानूनी पक्षों पर रोशनी डालते हुए कहा, ‘ऐसी स्थिति में अन्य आरोपियों पर भले ही आरोप हटाए न जाए पर मामले की प्रकृति को देखते हुए उन पर लगा आरोप खारिज जरूर हो सकता है.’

इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि, ‘मुख्य आरोपी जयललिता एक जनप्रतिनिधि थीं . यह पूरा मामला एक जनप्रतिनिधि से जुड़े भ्रष्टाचार के आरोपों और गैरकानूनी ढंग से संपत्ति जमा करने की साजिशों से जुड़ा हुआ है.’

वे आगे कहते हैं, ‘ वे राज्य की भूतपूर्व मुख्यमंत्री थीं.’  और

चूंकि अब वे जिंदा नहीं हैं, इसलिए उनके खिलाफ की गयी अपील के हटते ही अन्य आरोपियों के खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई नहीं की जा सकती है.

साल 2014 में जितेन्द्र सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बारे में पूछने पर तुलसी कहते हैं कि केवल दो स्थितियों में ही उस केस से फायदा हो सकता है. पहला, जब मृतक का परिवार मुख्य आरोपी के नाम पर लगे धब्बे को हटाने के लिए अपील पर कार्यवाही जारी रखना चाहता हो या दूसरा तब, जब उनकी संपत्ति विवादित हो और उसके कानूनी वारिस को लेकर लड़ाई छिड़ी हो. इसका मतलब ये होगा की संपत्ति कहीं फंसी हुई है.

तुलसी ने कहा, ‘लेकिन इस केस में कोई वारिस नहीं है. मुझे नहीं लगता कि पार्टी उनके नाम से धब्बा हटाने या ऐसे किसी वजह से अपील जारी रखना चाहेगी. इस वजह से पूरी संभावना है कि अन्य आरोपियों को बरी कर दिया जायेगा.’

क्या जयललिता की मौत, शशिकला के लिए कानूनी राहत बनकर आया है. क्या चार साल जेल की जो सजा, तलवार की तरह उनके उपर लटक रही है वह खत्म हो गई है?

यह वह केस है जिसने जयललिता के पूरे राजनीतिक करियर में उन्हें सबसे ज्यादा परेशान किया है.

जाहिर है, इस समय शशिकला और एआईएडीएमके के अन्य नेताओं के दिमाग में यह केस सबसे ऊपर चल रहा होगा.

पोएस गार्डन के भीतर समझौतों और ताकतों के टकराहट का खेल जारी है और इंसाफ का पहिया हमेशा की तरह धीरे-धीरे आगे बढ़ रहा है.

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