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किसानों की कर्ज माफी से क्या उनके 'अच्छे दिन' आएंगे?

कर्ज माफी किसानों के लिए चंद दिनों की राहत तो कभी-कभी हो सकती है लेकिन हल नहीं. दरअसल सवाल कर्ज माफी का नहीं, सिस्टम का है. और सिस्टम किसान के पक्ष में नहीं है

Updated On: Jun 12, 2018 08:24 AM IST

Piyush Pandey

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किसानों की कर्ज माफी से क्या उनके 'अच्छे दिन' आएंगे?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी जिस वक्त चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब वो लगातार यह कहते थे कि अगर वो सत्ता में आए तो 24 घंटे के भीतर किसानों का कर्ज माफ कर देंगे. कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बने हुए 17 दिन हो गए हैं, लेकिन अभी तक कर्ज माफी का ऐलान नहीं हुआ है. राज्य के किसानों को कुमारस्वामी की घोषणा का इंतजार है.

लेकिन मुद्दा कुमारस्वामी का वादा पूरा करने या न करने का नहीं है. मुद्दा है कर्ज माफी का ऐलान कर के किसानों को लुभाने का. क्योंकि मंदसौर में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी पहुंचे तो उन्होंने भी किसानों को लुभाने के लिए बड़ा ऐलान यही किया कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सत्ता आई तो 10 दिन के भीतर किसानों का कर्ज माफ कर दिया जाएगा.

लेकिन क्या किसानों की कर्ज माफी से उनके अच्छे दिन आ जाएंगे? या जिन राज्यों में किसानों का कर्ज माफ कर दिया गया है, वहां किसानों के अच्छे दिन आ गए? हाल के दिनों में देखें तो उत्तर प्रदेश में योगी सरकार बनते ही 86 लाख किसानों का 30,729 करोड़ का कर्ज पूरी तरह माफ किया किया गया. और यूपी में भी किसानों को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार में वादा यही किया था कि पहली कैबिनेट मीटिंग में किसानों का कर्ज माफ होगा. महाराष्ट्र में फडणवीस सरकार ने 35 लाख किसानों का 1.5 लाख रुपए तक का कर्ज माफ किया. पंजाब में नई सरकार ने 5 एकड़ जमीन रखने वाले किसानों के लिए 2 लाख रुपए तक की कर्ज माफी की. लेकिन क्या इन राज्यों में किसानों के दिन फिर गए?

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रिपोर्ट के अनुसार देश भर में किसानों पर 12.60 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का कृषि कर्ज है

दरअसल, सच यही है कि कर्ज माफी किसानों की समस्या का इलाज नहीं है. 1990 में प्रधानमंत्री रहते हुए विश्वनाथ प्रताप सिंह ने किसानों की 10 हजार करोड़ की कर्ज माफी की थी. करीब 30 साल पहले 10 हजार करोड़ रुपए की रकम बहुत भारी भरकम थी, और इतनी बड़ी रकम का कर्ज माफ करने से बैंकों की हालत पतली हो गई थी. लेकिन, इतने बड़े स्तर पर कर्ज माफी के बावजूद किसानों के दिन नहीं सुधरे.

सीएजी ने 2008 में मनमोहन सिंह सरकार के किसान पैकेज पर सवाल उठाए थे

फिर 2008 में मनमोहन सिंह ने 52 हजार करोड़ रुपए का पैकेज दिया. उस वक्त यही उम्मीद जताई गई थी कि 52 हजार करोड़ रुपए के पैकेज से किसानों की जिंदगी में बड़ा बदलाव आएगा लेकिन हुआ कुछ नहीं. आलम यह कि सीएजी ने ही मनमोहन के किसान पैकेज पर सवाल उठा दिए थे. सीएजी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 13.46 प्रतिशत किसानों को बैंकों ने उपयुक्त नहीं माना, जबकि वो कर्ज माफी के योग्य थे. जो 8.5 फीसदी किसान इसके हकदार नहीं थे, उन्हें कर्ज माफी मिल गई. 8.64 करोड़ रुपए के 2824 मामले ऐसे थे, जिनमें कागजों से छेड़छाड़ या किसी तरह का फर्जीवाड़ा हुआ था. 21,182 मामलों में कर्ज माफी मिली नहीं पर दस्तावेजों में बताया गया कि माफी हो गई.

दरअसल, 28 वर्ष से देश की सरकारें कर्ज माफी का खेल खेल रही हैं, और अब किसानों को लुभाने के लिए कर्ज माफी का लॉलीपॉप थमाना आम हो चला है. जबकि किसानों के कर्ज का सच यह है कि उन पर 12 लाख 60 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का कर्ज है. और 41.6 प्रतिशत गैर-संस्थागत संस्थाओं का कर्ज है खासकर साहूकारों का. साहूकार कभी कर्ज माफ करते नहीं- यह कड़वी सच्चाई है.

योगी आदित्यनाथ यूपी में बीजेपी के सभी 9 उम्मीदवारों के राज्यसभा चुनाव जीतने से गदगद हैं

2017 में उत्तर प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनने के 10 दिन के अंदर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने किसानों का 30,729 करोड़ रुपए का कृषि कर्ज माफ कर दिया था

किसान कर्ज माफी के बाद भी बैंक से, साहूकारों से कर्ज लेंगे क्योंकि एक फसल खराब होते ही उनके सामने जीने-मरने का संकट खड़ा हो जाता है, जिससे उबारने का कोई सिस्टम नहीं है. फसल बीमा योजना भी अभी सफल साबित नहीं कही जा सकती. वक्त-वक्त पर अलग-अलग इलाकों से किसानों को मुआवजे के नाम पर 2 रुपए, 100 रुपए या 2 हजार रुपए के चेक पकड़ाकर भद्दा मजाक किए जाने की खबरें आती रहती हैं. उपज लागत से डेढ़ गुना मिलने का वादा आज भी वादा है. भंडारण की पर्याप्त सुविधाएं नहीं हैं तो बंपर फसल होने पर भी किसान ही खुद को ठगा महसूस करता है.

कर्ज माफी किसानों के लिए चंद दिनों की राहत हो सकती है लेकिन हल नहीं

कर्ज माफी की संभावनाओं के बीच भी किसान की मुश्किलें बढ़ती ही हैं, क्योंकि वो कई मामलों में कर्ज चुकाना नहीं चाहता या चुका नहीं सकता अलबत्ता नए कर्ज मिलने की संभावना बिलकुल खत्म हो जाती है. कर्ज माफी किसानों के लिए चंद दिनों की राहत तो कभी-कभी हो सकती है लेकिन हल नहीं. तो सवाल कर्ज माफी का नहीं, सिस्टम का है. और सिस्टम किसान के पक्ष में नहीं है. हां, राजनेताओँ को समझ आ गया है कि किसान अपने आप में अभी तक एक वोटबैंक नहीं है, चुनाव के वक्त किसान भी जातियों में बंट जाता है तो किसान को राजनीति आसानी से ठग सकती है.

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