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बीजेपी के 'कौन बनेगा पीएम' सवाल का जवाब क्यों नहीं देना चाहता एकजुट विपक्ष

ममता बनर्जी की मेगा रैली में जमावड़े के बाद बीजेपी ने नया सवाल उछाल दिया है. इस गठबंधन का नेता कौन होगा?

Updated On: Jan 22, 2019 11:37 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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बीजेपी के 'कौन बनेगा पीएम' सवाल का जवाब क्यों नहीं देना चाहता एकजुट विपक्ष

ममता बनर्जी की मेगा रैली में जमावड़े के बाद बीजेपी ने नया सवाल उछाल दिया है. इस गठबंधन का नेता कौन होगा? ममता बनर्जी ने साफ किया कि चुनाव के बाद तय होगा कि इस मेगा गठबंधन की अगुवाई कौन करेगा? हालांकि ममता का ये बयान कांग्रेस के लिए भारी पड़ रहा है जो सिर्फ इस बुनियाद पर कायम है कि सबसे बड़े दल का नेता ही संसदीय दल का नेता बन सकता है.

सवाल राहुल गांधी का है तो वो कई बार साफ कर चुके हैं कि वो दावेदार नहीं हैं. लेकिन कांग्रेस के साथी डीएमके के नेता एम.के. स्टालिन कह चुके हैं कि राहुल गांधी ही प्रधानमंत्री बनने के प्रबल दावेदार हैं.

मेगा रैली की सफलता बीजेपी के लिए फिक्र की बात है. इसको प्रधानमंत्री ने भी गंभीरता से लिया है. इसलिए पीएम ने कोलकाता रैली का राजनीतिक जवाब दिया है. बीजेपी ने विकल्प का सवाल उठाया. नरेंद्र मोदी का विकल्प कौन होगा, ये जवाब महागठबंधन के पास नहीं है. किसी का नाम लेना फूट डाल सकता है.

गठबंधन की कमजोर नस

महागठबंधन का कौन नेता होगा? ये दुखती रग है. जिसको दबाने से सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना है. हर नेता अपने हिसाब से समीकरण बिठाने का प्रयास कर रहा है. राजनीतिक बिसात इस कुर्सी को ध्यान में रखकर बिछाई जा रही है. कोई किसी से कम नहीं है. सबको लग रहा है कि 1996 के बाद ये मौका है जिसमें बाजी मारी जा सकती है.

H D Devegowda

एच डी देवगौड़ा

1996 में इस तरह का समां था, जब बीजेपी को रोकने की नीयत से कांग्रेस ने भी एचडी देवगौड़ा का समर्थन किया था. तब बीजेपी के नेता थे अटल बिहारी वाजपेयी जिनके मुकाबले में कोई नेता टिक नहीं रहा था. पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहाराव थे, लेकिन उन्हें कांग्रेस का ही समर्थन हासिल नहीं था. सोनिया गांधी से मतभेद सार्वजनिक हो गए थे. वीपी सिंह कोई पद लेना नहीं चाहते थे. 1996 के बाद से पूर्व प्रधानमंत्रियो में सिर्फ एचडी देवगौड़ा जीवित हैं, जो कई दलों की सरकार चला चुके हैं. हालांकि देवगौड़ा जब पीएम बने तो जनता दल के बीच सर्वमान्य नेता का अभाव था. लालू, मुलायम, रामविलास पासवान और शरद यादव सब एक दूसरे से होड़ लगा रहे थे.

कमोवेश यही स्थिति है. सब नेता होड़ में हैं. लेकिन एक दूसरे का नाम प्रस्तावित करने से कतरा रहे हैं. किसी नाम पर सहमति बनना भी मुश्किल हैं.इसलिए चुनाव बाद इस पर बात करने की वकालत की जा रही है. बीजेपी इस मसले को राजनीतिक मुद्दे के तौर पर पेश करना चाहती है. इसलिए मोदी के मुकाबले कौन का सवाल उछाला जा रहा है.

संसदीय प्रणाली में सांसद का चुनाव

जिस वेस्टमिनिस्टर तौर तरीके का चुनाव देश में है. उसमें प्रधानमंत्री का चुनाव नहीं होता है. जनता इस बहुदलीय व्यवस्था में दल के सांसद का चुनाव करती है. ये कह सकते हैं कि दल को प्रमुखता दी जाती है. लेकिन सांसद ही अपने नेता का चुनाव करते हैं, यही सही तरीका है ये बात दीगर है कि पार्टी के भीतर पहले से तय हो जाता है कि कौन नेता चुना जाएगा. 2004 में संसदीय दल की बैठक में सोनिया गांधी ने नेता बनने से इनकार कर दिया था. बदले में मनमोहन सिंह का नाम प्रस्तावित किया गया. ये वही चुनाव था जिसमें बीजेपी अटल जी का विकल्प पूछ रही थी, जनता ने लीडरलेस कांग्रेस को सत्ता सौंप दी थी. कहने का मकसद है कि हमेशा लीडर के नाम पर ही वोट नहीं मिलते हैं.

2017 के यूपी विधानसभा में अखिलेश यादव और मायावती का विकल्प बीजेपी ने नहीं दिया, लेकिन सरकार बीजेपी की बनी. यही हाल हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव में रहा, जहां बीजेपी की सरकार बनी है. 2018 में हुए चुनाव में तीन राज्यों में बीजेपी के लीडर्स के सामने कांग्रेस को जनादेश मिला है.

2014 से स्थिति बदली

manmohan singh

2014 में बीजेपी ने मनमोहन सिंह के मुकाबले नरेंद्र मोदी को पेश किया था. तत्कालीन यूपीए सरकार के गिरते ग्राफ और अन्ना, रामदेव, केजरीवाल के तिहरे वार का फायदा बीजेपी को मिला, जिसमें नरेंद्र मोदी को हर मर्ज का इलाज बताना कारगर साबित हुआ. लेकिन 5 साल के कार्यकाल के बाद ये सवाल गौण हो जाता है. सरकार का कामकाज सामने है. जिस पर जनता का ध्यान है. पीएम की इमेज सिर्फ सहायक साबित हो सकती है. बीजेपी को समझना होगा कि ये मुख्य मुद्दा नहीं बन सकता है.

2009 में बीजेपी ने सबक नहीं लिया है. लेकिन महागठबंधन ने लिया है. जब मनमोहन सिंह के खिलाफ एल.के. आडवाणी मैदान में थे. तब भी काला धन जैसा मुद्दा था, लेकिन मनरेगा और कर्जमाफी के आगे फेल हो गया. जाहिर है कि विरोधी दल किसी भी कीमत पर इस चुनाव को व्यक्तिगत रण में तब्दील नहीं होने देंगे बल्कि मोदी बनाम सब ये ज्यादा फायदेमंद है.

मोदी को हराने के लिए एकजुट

गैर एनडीए दल का कोई कॉमन एजेंडा है तो बीजेपी को हराना, बीजेपी की बढ़ती ताकत सबके वजूद के लिए खतरा है. एक जमाने में कांग्रेस के विरोध का यही कारण था. लेकिन सब एक पायदान पर हैं. कांग्रेस कमजोर है. कुछ एक राज्यों को छोड़कर बीजेपी लगातार मजबूत हो रही है. बंगाल में बीजेपी का संघर्ष चल रहा है. बीजेपी को हराना प्राइम टार्गेट है. बीजेपी की रणनीति है कि नेता के विवाद को उलझा दिया जाए, ताकि आपसी मतभेद जनता के सामने नजीर बन जाए. जिसका चुनाव में उल्लेख करके सियासी फायदा उठाया जा सकता है.

बीजेपी ने रखी गठबंधन की मजबूत बुनियाद

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1996 में 13 दिन की सरकार चलाई. अटल जी विश्वास प्रस्ताव के दौरान समझ गए कि सरकार बचाना संभव नहीं है. सरकार गिर गई. लेकिन सत्ता की दहलीज पर पहुंचकर बीजेपी महरूम रह गई, उसके बाद एनडीए का स्वरूप सामने आया, पहले 13 महीने बाद में पूरे कार्यकाल की सरकार चली. फारूख अब्दुल्ला जैसे नेता की पार्टी भी सरकार का हिस्सा बन गई. अटल जी की बुनियाद पर यूपीए ने 10 साल की सरकार चलाई. 2014 में भी बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिल गया, लेकिन एनडीए गठबंधन की सरकार चल रही है. अटल जी ने कई विवादित मुद्दों को तिलांजलि दी, कोलकाता में ममता बनर्जी की जिस ललकार पर बहस चल रही है, वो खुद एनडीए का हिस्सा रह चुकी हैं.

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मोरारजी देसाई (तस्वीर : scoopwhoop)

1977 में इंदिरा गांधी के खिलाफ पहला अभियान चला जिसमें जेपी, लोहिया जैसे अगुवा थे, लेकिन पीएम बने मोरारजी देसाई. बाद में चरण सिंह लेकिन सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई थी. 1989 में पहले वीपी सिंह और बाद में चंद्रशेखर की अगुवाई में मिली-जुली सरकार बनी. ये भी समय से पहले गिर गई. 1996 में देवगौड़ा बाद में इंदर कुमार गुजराल, इसका हश्र भी पहले की सरकार जैसा रहा. 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार जयललिता की वजह से 13 महीने में गिर गई लेकिन 1999 में चुनाव में एनडीए की सरकार दोबारा बन गई. अटलजी ने कार्यकाल पूरा किया, हालांकि समय से पहले चुनाव कराना नुकसानदेह साबित हुआ था.

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