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ओबीसी का बंटवारा करने से क्यों ठिठक गई मोदी सरकार?

दोनों की स्थितियां ठीक नहीं हैं. अगर सरकार को पता ही नहीं था कि ओबीसी लिस्ट को पिछड़ा और अति पिछड़ा में बांटना इतना मुश्किल है, तो यह सरकार की सूझबूझ पर प्रश्न चिन्ह है

Updated On: Dec 01, 2018 06:04 PM IST

Dilip C Mandal Dilip C Mandal
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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ओबीसी का बंटवारा करने से क्यों ठिठक गई मोदी सरकार?

पिछले साल 2 अक्टूबर को केंद्र सरकार ने ओबीसी यानी अन्य पिछड़ा वर्ग के बंटवारे के लिए एक कमीशन गठित किया और कहा कि ओबीसी में शामिल जिन जातियों को आरक्षण का पूरा लाभ नहीं मिल पाया है, उन तक आरक्षण का लाभ पहुंचाया जाएगा तो अति पिछड़ी जातियों में उम्मीद की रोशनी जगी.

कमेटी की अध्यक्षता रिटायर्ट जस्टिस जी. रोहिणी को सौंपा गया. इस कमेटी को 12 हफ्तों में अपनी रिपोर्ट सौंपनी थी. कमेटी को बने 13 महीने हो गए हैं, लेकिन कमेटी की रिपोर्ट अब तक नहीं आई है.

यह प्रशासनिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक फैसला है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में 22 नवंबर, 2018 को हुई कैबिनेट की बैठक में इस कमीशन को चौथी बार एक्सटेंशन यानी कार्यविस्तार दे दिया गया. आयोग को काम पूरा करने के लिए अब 31 मई, 2018 तक का समय दिया गया है. (पढ़ें सरकार का फैसला) जाहिर है, तब तक केंद्र में अगली सरकार आ चुकी होगी. यानी नरेंद्र मोदी सरकार ने ओबीसी के बंटवारे की जिस प्रक्रिया को शुरू किया, उसे मंजिल तक नहीं पहुंचाया.

Indian Prime Minister Narendra Modi

इस आयोग को दिए गए चौथे कार्यविस्तार के लिए वजह यह बताई गई कि उसे अभी और काम करना है. सरकार के मुताबिक ‘आयोग ने राज्‍य सरकार, राज्‍य पिछड़ा वर्ग आयोग, सामाजिक संगठनो और पिछड़े वर्गों से जुड़े आम नागरिकों के साथ बैठकें की हैं. साथ ही, उच्‍च शि‍क्षा संस्‍थानों में पढ़ रहे ओबीसी छात्रों और केंद्र सरकार के विभागों, पीएसयू, सरकारी बैंकों और वित्‍तीय संस्‍थानों में ओबीसी के प्रतिनिधित्‍व के आंकड़े जुटाए हैं. आयोग को लगता है कि आंकड़ों के परीक्षण और विश्‍लेषण के आधार पर राज्‍यों और उनके पिछड़े वर्ग आयोगों के साथ चर्चा की जरूरत है.’

यह बात आश्चर्यजनक है कि केंद्रीय ओबीसी की लिस्ट को पिछड़ा और अति-पिछड़ा में बांटने के लिए आयोग को राज्य सरकारों और उनके पिछड़ा वर्ग आयोगों से और चर्चा करनी है. जिस काम के बारे में केंद्र सरकार को लगता था कि ये काम 12 हफ्ते में पूरा हो जाना है, वह काम पूरा हो ही नहीं रहा है. क्या केंद्र सरकार और आयोग को इन परिस्थितियों का अंदाजा नहीं था, या फिर सरकार खुद ही नहीं चाहती कि आयोग अपनी रिपोर्ट जमा कर दे और उसे इस बारे में कोई फैसला करना पड़े?

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दोनों की स्थितियां ठीक नहीं हैं. अगर सरकार को पता ही नहीं था कि ओबीसी लिस्ट को पिछड़ा और अति पिछड़ा में बांटना इतना मुश्किल है, तो यह सरकार की सूझबूझ पर प्रश्न चिन्ह है. पिछड़ी जातियों की लिस्ट का बंटवारा इससे पहले भी हो चुका है. देश के 10 राज्यों में पिछड़ी जातियों की एक से ज्यादा लिस्ट हैं. वे राज्य हैं- तमिलनाडु, कर्नाटक, बिहार, हरियाणा, महाराष्ट्र, पुदुच्चेरी, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, पश्चिम बंगाल और झारखंड. इन राज्यों में अगर अति पिछड़ी जातियों को अलग से आरक्षण दिया जा सकता है, तो केंद्र में क्यों नहीं?

ओबीसी के बंटवारे के सवाल पर, ऐसा लगता है कि, केंद्र सरकार को कोई जल्दबाजी नहीं है. आयोग को दिया गया चौथा कार्यविस्तार इतना लंबा (छह महीने) किए जाने का और कोई मतलब नहीं है. यह प्रशासनिक से कहीं ज्यादा राजनीतिक फैसला है.

बीजेपी का शुरुआती गणित यह था कि ओबीसी का बंटवारा करने से अति पिछड़ी जातियां उसके पाले में आ जाएंगी. अनुमान है कि इन जातियों की संख्या राजनीति को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त हैं. इन जातियों में ये सोच है (मुमकिन है कि आंकड़ों से उसकी पुष्टि भी हो) कि आरक्षण का ज्यादातर फायदा कुछ आगे बढ़ी हुई और ज्यादा संख्या वाली पिछड़ी जातियों को मिल जाता है और अति पिछड़ी जातियां वंचित रह जाती हैं. इसके पीछे तर्क यह है कि ओबीसी बहुत बड़ा समूह है, जिसमें देश की 52 फीसदी आबादी है. इन जातियों की हैसियत में काफी अंतर है. इनमें कुछ जातियां सक्षम हैं तो कुछ ज्यादा ही पिछड़ी हैं.

केंद्र सरकार ने इस तर्क को सही माना और ओबीसी बंटवारे के लिए आयोग बनाते हुए उसे इस अंतर का पता लगाने का कार्यभार सौंपा. आयोग को इस अंतर के आधार पर ओबीसी जातियों को अलग-अलग लिस्ट में बांटने का काम भी करना है. लेकिन यह तो सरकार का घोषित लक्ष्य था.

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नेताओं को तमाम पिछड़ी जातियों का नेता बने रहने से रोका जाए

बीजेपी इसके साथ एक और निशाना साध रही थी. कई राज्यों में पिछड़ी जातियों के नेताओं की प्रभावशाली राजनीति पिछले कई दशक से चल रही है. उत्तर भारत में राममनोहर लोहिया ने पिछड़ी जातियों के राजनीतिक सशक्तिकरण की जो प्रक्रिया शुरू की, उसकी वजह से कई राज्यों में पिछड़ी जातियों के मुख्यमंत्री बने. ऐसा दक्षिण भारत में भी हुआ. इस क्रम में यादव, कुर्मी, वोक्कालिगा, नाडार, जाट (कई राज्यों में पिछड़ी जातियों में शामिल) आदि जातियों के कई नेता उभरे. ये नेता आम तौर पर कांग्रेस और बीजेपी के पाले के बाहर हैं.

बीजेपी चाहती है कि इन जातियों को एक अलग ब्लॉक में डालकर इन जातियों के नेताओं को तमाम पिछड़ी जातियों का नेता बने रहने से रोका जाए.

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अब समस्या यह है कि ओबीसी के बंटवारे के प्रस्ताव से ये तथाकथित प्रभावशाली जातियां बीजेपी से नाराज हो जा सकती हैं. ये नाराजगी बीजेपी को महंगी पड़ सकती है. इन जातियों के बड़े नेता बेशक बीजेपी में नहीं हैं. लेकिन इन जातियों के मतदाताओं का एक हिस्सा बीजेपी को भी वोट करता है. मिसाल के तौर पर, हरियाणा में यादवों का सबसे बड़ा हिस्सा इस समय बीजेपी के साथ है. यूपी में कुर्मियों का बड़ा हिस्सा बीजेपी और उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल के साथ हैं.

बिहार में नीतीश कुमार की वजह से कुर्मी जाति का बड़ा हिस्सा एनडीए के साथ है. खासकर जब बीजेपी हिंदू मुद्दे के आसपास ध्रुवीकरण कर पाती है, तो ये प्रभावशाली पिछड़ी जातियां बीजेपी के साथ गोलबंद हो जाती हैं. पश्चिम उत्तर प्रदेश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की वजह से जाटों के बड़े हिस्से ने पिछले चुनाव में बीजेपी को वोट डाला.

बीजेपी इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं है कि ओबीसी के बंटवारे से उसे अति पिछड़ों का वोट मिल जाएगा. लेकिन उसे इस बात का डर जरूर है कि ओबीसी की प्रभावशाली जातियां उसके खिलाफ हो जाएंगी. इस चुनावी गणित ने बीजेपी को ओबीसी का बंटवारा करने से रोक दिया है.

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