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लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत क्यों नहीं जुटाते सीताराम येचुरी

प्रकाश करात, वृंदा करात, सीताराम येचुरी जैसे नेता वो साल भूल गए होंगे जब शायद उन्होंने कोई चुनाव लड़ा होगा

Arun Tiwari Arun Tiwari Updated On: Jul 26, 2017 05:52 PM IST

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लोकसभा चुनाव लड़ने की हिम्मत क्यों नहीं जुटाते सीताराम येचुरी

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया- मार्क्सवादी (सीपीएम) के राष्ट्रीय महासचिव सीताराम येचुरी अब राज्यसभा सासंद नहीं रहेंगे. उनकी पार्टी अपने संविधान के हिसाब से तीसरी बार उन्हें राज्यसभा चुनाव में कैंडिडेट नहीं बनाएगी. हालांकि पार्टी के भीतर इस निर्णय को लेकर मदभेद था लेकिन अंतिम में यही तय हुआ कि येचुरी को अब राज्यसभा उम्मीदवार नहीं बनाया जाएगा.

उच्च सदन में सीताराम येचुरी ने एक से एक कमाल के भाषण दिए हैं. लोग उनके दिए गए भाषणों को याद रखते हैं, कोट करते हैं. अब शायद लोग सदन में उनके भाषण न सुन पाएं. लेकिन आम व्यक्ति के मन में ये सवाल जरूर उठता होगा कि आखिर सीताराम येचुरी लोकसभा का चुनाव क्यों नहीं लड़ते? ऐसा सोचने के कई कारण भी हैं.

येचुरी अक्सर अपने भाषणों में मजदूरों, कामगारों, किसानों, अल्पसंख्यकों और दलितों का जिक्र करते हैं. हर बार वो सरकारों पर निशाना साधते हैं कि समाज के कमजोर तबकों का ध्यान क्यों नहीं रखा जाता? वो विरोध प्रदर्शनों में खूब नजर आते हैं? उनका भरोसा है कि देशभर के शोषित और वंचित उनकी पार्टी के साथ हैं. तो सीताराम येचुरी क्यों एक बार लोकसभा चुनाव नहीं लड़ते?

कश्मीर से कन्याकुमारी तक देश में 543 लोकसभा सीटों में क्या एक सीट भी नहीं जिस पर उन्हें जीत का भरोसा हो?

sitaram yechury

विरोध में आगे, चुनाव लड़ने में पीछे क्यों?

2014 में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बने थे. वो भी भारी बहुमत के साथ. गुजरात दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी की छवि एक बेहद सांप्रदायिक नेता की बनाई गई थी. नरेंद्र मोदी को पीएम बनने से रोकने के लिए यूएन में भारत के 65 सांसदों की तरफ एक चिट्ठी लिखी गई थी जिसमें सीताराम येचुरी ने भी हस्ताक्षर किए थे. यानी पूरे चुनाव के दौरान सीताराम येचुरी ने सिर्फ भाषण दिए लेकिन पूरे देश में कोई एक भी सीट नहीं थी जहां से वो चुनाव लड़ते.

सीताराम येचुरी भारत में जिस तरीके की राजनीति करते हैं या करते हुए प्रतीत होते हैं उसे वो वंचित तबकों की राजनीति का जामा पहनाते हैं. तो क्या ये मान लिया जाए कि इस देश में वंचित तबका नहीं बचा है जो उनके चुनाव में खड़े होने पर चुनाव जिता सके.

सीपीएम की सीटें लगातार घट रही हैं लेकिन कमाल की बात ये है कि उनका शीर्ष नेतृत्व सिर्फ जुबानी बयानबाजी के जरिए ही राजनीति में बना रहना चाहता है. कम्युनिस्ट पार्टी के सामने बनी न जाने कितनी क्षेत्रीय पार्टियां न सिर्फ राज्यों में अपनी सरकार बनाने में कामयाब रही हैं. कई ऐसी क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियां रही हैं जो सिर्फ एक राज्य में होने के बावजूद जिनके सांसद सीपीएम से ज्यादा रहे हैं.

जबकि खुद सीताराम येचुरी लोकसभा में ज्यादा ताकत की बात समझते हैं. यूपीए1 सरकार के समय में 123 डील को लेकर सीपीएम ने सरकार के साथ खूब विवाद किया था. सीपीएम इसी बात पर सरकार से अलग भी हो गई थी.

हालांकि इसका कोई असर डील पर नहीं हुआ और डील साइन हुई. लेकिन इस सदी की भारतीय राजनीति में वो आखिरी बार हुआ थी कि सीपीएम के विरोध ने खूब सुर्खियां बटोरी थीं और ये खबर देशभर में मुद्दा बनी थी. बहुत सारे लोग सीपीएम के स्टैंड के साथ थे. ऐसा क्यों हो पाया? ऐसा हो पाने के पीछे एक अहम वजह ये भी थी कि 2004 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम 59 सीटें जीतकर आई थी. ये पार्टी के सबसे बेहतरीन प्रदर्शनों में से एक था.

sitaram yechury

सिर्फ आइडियोलॉग के लेवल कब तक काम करेंगे?

लेकिन इसके बावजूद भी पार्टी ने कोई सीख नहीं ली. भले ही पार्टी नेता ये दावा करें कि वो जनता की बातें करते हैं लेकिन वास्तविकता ये है कि जनता के बीच जाकर येचुरी अपनी लोकप्रियता का टेस्ट देने से डरते हैं. सीपीएम के जिन कुछ बड़े नेताओं को लोग जानते हैं, वो चुनाव ही नहीं लड़ते हैं. प्रकाश करात, वृंदा करात, सीताराम येचुरी जैसे नेता वो साल ही भूल गए होंगे जब शायद उन्होंने कोई चुनाव लड़ा होगा.

चुनावों को भारतीय लोकतंत्र में महापर्व के रूप में देखा जाता है लेकिन सीपीएम के बड़े नेता इस महापर्व से हमेशा दूरी बनाकर ही रखते हैं. वो सिर्फ आइडियोलॉग के लेवल पर ही काम करते हैं.

सीताराम येचुरी इस समय देश में वामपंथ के सबसे बड़े चेहरों में से एक हैं. पार्टी द्वारा राज्यसभा टिकट न दिए जाने के बाद क्या वो पुरानी पार्टी पर चलेंगे या फिर जनता के बीच जाने का जोखिम उठाएंगे?

क्या भारत की संसद में जाने का राज्यसभा वाला ही रास्ता ही उनका रास्ता रहेगा या फिर वो पार्टी की परिपाटी तोड़ कर देश की किसी भी सीट से अपनी वास्तविक लोकप्रियता आंकेंगे?

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