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ऐसा क्यों लग रहा है जैसे सारी पार्टियां करणी सेना समर्थक हैं

पार्टियां करणी समुदाय को ये मौका दे रही हैं कि पद्मावत के विरोध को पूरे राजपूत समुदाय से जोड़ दिया जाए जबकि वास्तविकता में ये सिर्फ एक संगठन का विरोध प्रदर्शन है

Updated On: Jan 25, 2018 02:54 PM IST

Amitesh Amitesh

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ऐसा क्यों लग रहा है जैसे सारी पार्टियां करणी सेना समर्थक हैं

पद्मावत फिल्म रिलीज हो गई है. लेकिन, इसके रिलीज होने और सिनेमा हॉल में दिखाए जाने को लेकर देश के कई हिस्सों में विरोध-प्रदर्शन हो रहा है. विरोध करने वाले करणी सेना के लोगों की तरफ से अहमदाबाद में हिंसक प्रदर्शन और तोड़-फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया था. यहां तक कि गुड़गांव में स्कूली बच्चों से भरी बस को भी नहीं बख्शा गया.

हिंसा जारी है. लेकिन, न ही सत्ताधारी दल और न ही विपक्षी दल इस मुद्दे पर खुलकर कुछ बोल रहे हैं. सरकारों की ढुलमुल नीति और कांग्रेस समेत विरोधी दलों का इसपर ढुलमुल रवैया करणी सेना के आंतक को और बढ़ाने वाला है. सवाल खड़ा होता है कि यह करणी सेना है क्या ? इस करणी सेना की हैसियत और ताकत क्या है ? क्या यह करणी सेना इतनी ताकतवर हो गई है कि देश की कानून-व्यवस्था को हाथ में ले लेगी और हमारी सरकारें मूक दर्शक बनकर उनके सामने घुटने टेक देंगी ?

करणी सेना का प्रभाव भले ही राजस्थान में हो लेकिन, बाकी हिस्सों में कुछ दिन पहले तक इसका कोई नाम लेवा तक नहीं था. लेकिन, फिल्म पद्मावत का विरोध करने को लेकर सड़कों पर उतरी करणी सेना की तरफ से की गई गुंडागर्दी के बाद धीरे-धीरे बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश और दूसरे राज्यों में भी कुछ असमाजिक तत्व जाति के नाम पर करणी सेना के साथ खडे हो गए हैं.

इनका करणी सेना से भले ही कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन, जाति की आड़ में अपनी गुंडागर्दी का प्रदर्शन ही इनके लिए इस वक्त सबसे प्रमुख हो गया है. लेकिन, करणी सेना के नाम पर हो रही गुंडागर्दी को रोकने के लिए राज्य सरकारें क्यों आगे नहीं आ रही हैं, जबकि, अधिकतर राज्यों में इस वक्त बीजेपी की ही सरकारें हैं. राजस्थान से लेकर हरियाणा तक, मध्यप्रदेश से लेकर गुजरात, उत्तर प्रदेश और बिहार तक हर जगह बीजेपी ही सत्ता में है.

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लेकिन, करणी सेना के इन गुंडों पर हाथ डालने की हिम्मत कोई क्यों नहीं कर पा रहा है ? वो भी तब जबकि सेंसर बोर्ड ने इस फिल्म को कुछ परिवर्तन के बाद मंजूरी भी दे दी है. जब सेंसर बोर्ड की मंजूरी मिल गई है तो अब विरोध किस बात का ?

जब विरोध के बाद बदल दिया गया नाम

सेंसर बोर्ड ने विरोध के बाद फिल्म का नाम बदलकर पद्मावती से पद्मावत कर दिया. घूमर डांस में कुछ बदलाव किया. यह डिस्क्लेमर भी दे दिया कि इस फिल्म का इतिहास से कोई लेना देना नहीं है. इसके अलावा फिल्म शुरू होने से पहले यह भी दिखाना अनिवार्य कर दिया कि इस फिल्म का मकसद सती प्रथा को बढ़ावा देना नहीं है.

सेंसर बोर्ड की तरफ से किए गए बदलाव के बावजूद आखिरकार इस फिल्म का विरोध करने वाले क्यों नहीं बदल रहे हैं ? राजपूत वोट बैंक के नाम पर हर दल के राजनेताओं की तरफ से की गई टिप्पणी और खुलकर करणी सेना का विरोध नहीं करने की कोशिश भी इन लोगों के मनोबल को बढ़ा रही है.

रह-रह कर अलग-अलग पार्टी के नेताओं की तरफ से आ रहे बयान भी इनके मनोबल को बढ़ा रहे हैं. फिल्म में बदलाव के बावजूद बीजेपी नेता और केंद्रीय मंत्री जनरल वी.के. सिंह का बयान भी चौंकाने वाला है.

जनरल वी के सिंह ने कहा है कि ‘जब चीजें सहमति से नहीं होती है तो वहां गड़बड़ी हो जाती है. जनरल सिंह ने कहा है कि ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इतिहास से छेड़छाड़ करने की इजाजत नहीं देता.’ वी.के. सिंह तो करणी सेना के साथ बातचीत करने की जरूरत देते दिखे.

वी के सिंह खुद राजपूत जाति से आते हैं और उनकी तरफ से दिया गया यह बयान बीजेपी के भीतर की उस उलझन को दिखाता है जो वो सत्ता में रहने के बावजूद खुलकर नहीं बोल पा रही है. उल्टा करणी सेना के समर्थन में ही दिख रही है.

देश के अलग-अलग राज्यों में हो रही हिंसा के बावजूद देश के गृह-मंत्री राजनाथ सिंह अभी भी इस मामले में चुप बैठे हैं. उनकी तरफ से कानून-व्यवस्था ठीक करने के नाम पर कुछ बयान नहीं दिया गया है. न ही उनकी तरफ से करणी सेना के कदम की आलोचना की जा रही है. मतलब साफ है वोट बैंक के खिसकने का डर बीजेपी और सरकार में बैठे उसके मंत्रियों को भी चुप्पी साधने पर मजबूर कर रहा है.

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यही हाल कांग्रेस का भी है. हर मुद्दे पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे कांग्रेस के नेताओं की तरफ से इस मुद्दे पर पहले तो चुप्पी साधी गई. फिर जो बयान आए उसमें भी करणी सेना के विरोध में कुछ बोलने की हिम्मत तक नहीं दिख रही है.

राहुल ने की 'सेलेक्टिव' आलोचना

अबतक इस मुद्दे पर चुप्पी साधे कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब अपनी चुप्पी तोड़ी तो भी उनकी तरफ से स्कूली बस पर किए गए हमले का जिक्र किया गया. राहुल ने ट्वीट कर कहा कि ‘बच्चों के खिलाफ हिंसा को जायज ठहराने के लिए कोई भी कारण बड़ा नहीं हो सकता. घृणा और हिंसा कमजोरों का हथियार होता है. बीजेपी घृणा और हिंसा का उपयोग कर देश में आग लगा रही है.’

राहुल गांधी ने पहली बार इस मुद्दे पर बोला, लेकिन, यहां भी उनकी हिम्मत करणी सेना के खिलाफ बोलने की नहीं हुई. कांग्रेस अध्यक्ष ने एक शब्द भी करणी सेना के खिलाफ नहीं बोला. उनकी तरफ से हिंसा के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा कर पुरानी रटी-रटाई परंपरा का निर्वहन कर दिया गया.

मतलब साफ था राहुल गांधी को भी उसी वोट बैंक का खतरा सता रहा है जिसको लेकर बीजेपी सरकार की तरफ से भी सख्त कार्रवाई करने से कन्नी काटा जा रहा है. रही-सही कसर कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता दिग्विजय सिंह ने पूरी कर दी. दिग्विजय सिंह का कहना था कि ‘इस तरह की फिल्म नहीं बननी चाहिए जिससे किसी भी जाति और धर्म की भावनाएं आहत हो रही हों.’

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दिग्विजय सिंह से तो इससे ज्यादा अपेक्षा क्या की जा सकती है. अपने बयानों से पहले से ही विवाद खड़ा करने वाले दिग्विजय सिंह की पार्टी के अध्यक्ष ही जब करणी सेना के सामने सरेंडर कर दिए हों, तो भला दिग्विजय सिंह इस पर और क्या बोल सकते हैं.

घिनौनी जातिवादी राजनीति और जातीय वोटगणित के नुकसान के डर से मुठ्ठी भर लोगों की एक टोली ने जिस अंदाज में पूरे देश में हड़कंप मचा दिया है, उसे किसी भी तरह से जायज नहीं ठहराया जा सकता.

लेकिन, उससे भी नाजायज और नागवार तो लग रहा है इस पर सत्ताधारी और विपक्षी दलों के नेताओं की करणी सेना के खिलाफ बरती जा रही चुप्पी. सचमुच वोट बैंक की राजनीति ने गुंडागर्दी पर उतारू मुठ्ठीभर लोगों के संगठन को इस वक्त ‘ताकतवर’ बना दिया है.

 

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