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नरेंद्र मोदी अंबेडकर की इन बातों पर खामोश क्यों हैं?

नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में अंबेडकर को दिव्य पुरुष के रूप में पेश करते नजर आते हैं

Updated On: Dec 07, 2016 12:42 PM IST

सुरेश बाफना
वरिष्ठ पत्रकार

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नरेंद्र मोदी अंबेडकर की इन बातों पर खामोश क्यों हैं?

बाबा साहेब अंबेडकर की राजनीतिक व सामाजिक विरासत को हड़पने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले तीन सालों से विशेष प्रयास कर रहे हैं. इस साल अप्रैल माह में अंबेडकर की जन्मभूमि मध्यप्रदेश के महू में आयोजित कार्यक्रम में मोदी ने कहा था कि बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान का ही नतीजा है कि आज एक चायवाला प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर बैठा हुआ है.

भारतीय जनता पार्टी स्वघोषित रूप से हिन्दुत्ववादी पार्टी है और राजनीति में नरेंद्र मोदी को हिन्दू ह्रदय सम्राट के तौर पर पेश किया जाता रहा है. राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक होने के नाते भी मोदी की छवि कट्‍टर हिन्दू नेता के रूप में रही है. अंबेडकरवादियों को इस बात पर आश्चर्य होता है कि मोदी अंबेडकर की विरासत के हकदार कैसे हो सकते हैं?

दिव्य पुरुष की तरह करते हैं पेश 

नरेंद्र मोदी अपने हर भाषण में अंबेडकर को दिव्य पुरुष के रूप में पेश करते नजर आते हैं.  हिन्दुत्व के बारे में अंबेडकर द्वारा की गई कटु टिप्पणियों के बारे में उनकी खामोशी से यह उजागर होता है कि मोदी की नजर अंबेडकर के माध्यम से केवल दलित वोट बैंक पर ही है.

क्या मोदी अंबेडकर की इस बात से सहमत है कि ‘यदि हिन्दू एकता स्थापित करना है तो हिन्दुत्व को खत्म करना पड़ेगा. हिन्दुत्व व सामाजिक एकता दो अलग-अलग ध्रुव है. सामाजिक विभाजन ही हिन्दुत्व का मूल आधार है. मोदी जी व भाजपा की सामाजिक समरसता की बात अंबेडकर की दृष्टि में एक छलावे से अधिक कुछ नहीं है.

अंबेडकर ने कहा था कि ‘हर कीमत पर हिन्दू राज का विरोध किया जाना चाहिए. यदि हिन्दू राज स्थापित हो गया तो यह देश के लिए भयंकर आपदा से कम नहीं होगा. हिन्दूवाद से स्वतंत्रता, समानता व बंधुत्व खतरे में पड़ जाएगा. यह प्रजातंत्र-विरोधी भी है.’ मोदी जी को यह बताना चाहिए कि क्या वे हिन्दुत्व के बारे में अंबेडकर की इन टिप्पणियों से सहमत है?

अंबेडकर ने लिखा कि ‘उच्च जाति के हिन्दू नेता हिन्दू समाज पर हावी रहते हैं. वे समाज के सभी संसाधनों पर अपना कब्जा बनाए रखने की कोशिश करते हैं. शिक्षा व संपदा पर अपना एकाधिकार जमाकर उन्होंने सत्ता पर भी अपना कब्जा कर लिया है. उच्च जाति के हिन्दू नेता निम्न वर्ग ही नहीं, बल्कि मुस्लिम समुदाय के लोगों को भी शिक्षा, संपदा व राज्य में हिस्सेदारी से वंचित रखते हैं.’ यदि मोदी वास्तव में दलित व वं‍चित वर्गों के मसीहा बनना चाहते हैं तो अंबेडकर के विचारों से सार्वजनिक तौर पर अपनी सहमति प्रकट करना चाहिए.

कई सवालों से बचा नहीं जा सकता 

वीर सावरकर के हिन्दू राज और मोहम्मद अली जिन्ना के मुस्लिम राज के बारे में अंबेडकर का कहना है कि दोनों ही एक-दूसरे के पूरक है. उन्होंने कहा कि ‘हिन्दू समाज के निचले तबकों और मुस्लिम समुदाय की आर्थिक, राजनीतिक व सामाजिक स्थिति में कोई अंतर नहीं है. इन तबकों एकजुट होकर उच्च जाति के हिन्दुओं की राजनीतिक व सामाजिक सत्ता को चुनौती देना चाहिए.’ आज मायावती अंबेडकर के इसी सपने के पूरा करने की कोशिश कर रही है. यदि मोदी अंबेडकर की विरासत को आत्मसात करना चाहते हैं तो वे इन सवालों के जवाब से बच नहीं सकते.

अंबेडकर जिंदगी भर हिन्दू धर्म में मौजूद वर्ण व्यवस्था के शिकार रहे और संघर्ष करते रहे. अपने जीवन के अंतिम सालों में उन्होंने हिन्दू धर्म छोड़कर बुद्ध धर्म अपनाया. 14 अक्टूबर 1956 को नागपुर में उन्होंने कहा था कि असमानता व अत्याचार के प्रतीक बने अपने पुरातन हिन्दू धर्म को छोड़ते हुए मुझे लग रहा है कि मेरा पुनर्जन्म हुआ है. हिन्दू धर्म पर अंबेडकर की यह कठोर टिप्पणी थी.

अंबेडकर की उक्त टिप्पणियों और संघ-प्रेरित हिन्दुत्व के बीच गंभीर वैचारिक टकराव है. मोदी यदि अंबेडकर की विरासत को पाना चाहते हैं तो उन्हें इस टकराव से पैदा होनेवाले सवालों का जवाब देना होगा.

 

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