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आखिर मुस्लिम संगठनों ने क्यों की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग?

जमीयत उलेमा हिंद का तर्क है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित होने पर पूरे देश में बीफ पर पांबदी लग जाएगी. तो इससे जुड़ी हिंसा को रोका जा सकेगा

Updated On: Feb 05, 2018 08:31 AM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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आखिर मुस्लिम संगठनों ने क्यों की गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग?
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गौहत्या के खिलाफ कानून लाने की मांग लगातार चल रही है. शुक्रवार को बीजेपी के राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने प्राइवेट मेंबर बिल पेश किया. जिसमे ये मांग की गई कि गौहत्या करने वाले को मौत की सजा दी जाए. हालांकि कृषि मंत्री राधामोहन सिंह के निवेदन पर स्वामी ने ये बिल वापस ले लिया. लेकिन इस बिल ने कई विवाद को जन्म दे दिया है.

इस बहस की शुरुआत करते हुए स्वामी ने कहा कि सरकार एक ऐसा कानून लाए जिसकी दरकार है. स्वामी के बिल में जिस तरह की बातें थी, उससे सरकार की राय अलग थी. राधामोहन सिंह ने कहा कि एनडीए सरकार आने के बाद से गाय के सरंक्षण को लेकर कई योजनाएं शुरू की गई हैं.

लेकिन समाजवादी पार्टी के सांसद जावेद अली ने गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करने की मांग कर डाली. जावेद अली का कहना था क्योंकि ‘गाय को लेकर राजनीतिक स्वार्थ पूरे किए जा रहे है. इसलिए सरकार को सुब्रमण्यम स्वामी का बिल मान लेना चाहिए.’

कांग्रेस के नेता राजीव शुक्ला ने कहा कि ‘बीजेपी मनोहर पर्रिकर से बात क्यों नहीं करती क्योंकि गोवा के मुख्यमंत्री ने हाल में ही बीफ ट्रेडर्स का समर्थन किया था.’

हालांकि प्राइवेट मेंबर बिल सरकार मानने के लिए बाध्य नहीं है. लेकिन सुब्रमण्यम स्वामी के इस बिल से सरकार को मुस्लिम संगठन कटघरे में खड़ा करने की तैयारी कर रहे हैं.

बीजेपी को कटघरे में खड़ा करने की तैयारी

मुस्लिम संगठनों में इस बात को लेकर एक राय है कि गाय की संरक्षा को लेकर सरकार कोई कानून बनाएगी तो उसको मानने के लिए वो तैयार हैं. मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा हिंद के सदर अरशद मदनी एक कदम आगे हैं. अरशद मदनी का कहना है कि ‘सरकार को गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कर देना चाहिए. जिससे गाय को संरक्षित किया जा सके और वही कानून लागू होना चाहिए जो अन्य संरक्षित जानवरों के लिए है. ’

प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर)

प्रतीकात्मक तस्वीर (रायटर)

मुस्लिम संगठन को आरोप है कि बीजेपी राजनीति के लिए गाय का इस्तेमाल कर रही है. बल्कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित कराने के लिए जमीयत उलेमा हिंद ने मुंबई मे एकता कॉन्फ्रेंस किया और बकायदा लोगों को शपथ दिलाई गई है, जिससे इस मुहिम को आगे बढ़ाया जाए. हालांकि कुछ मुस्लिम संगठनों की राय थोड़ा अलग है.

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जमाते इस्लामी हिंद के सचिव सलीम इंजीनियर का कहना है कि सरकार जो भी कानून बनाएगी उसकी हिमायत करेंगे. लेकिन अपनी तरफ से कोई मांग इस सिलसिले में नहीं रखेंगे. मुंबई की एकता कॉन्फ्रेंस में आर्यसमाजी और सोशल एक्टिविस्ट स्वामी अग्निवेश ने कहा कि ‘जो लोग जानवरों को छुट्टा छोड़ते हैं. उनके खिलाफ भी सरकार को कानून बनाना चाहिए. खासकर जब गाय दूध देना बंद कर देती है और बैल बूढ़े हो जाते हैं.’

जमीयत उलेमा हिंद के इस मांग का समर्थन शिया पर्सनल लॉ बोर्ड के यासूब अब्बास ने भी किया है. यासूब अब्बास ने कहा कि ‘उनके यहां बकायदा ये फतवा है कि अगर किसी को इस तरह के काम करने पर तकलीफ हो तो ये हराम है.’ लेकिन स्वामी के बिल से वो इत्तेफाक नहीं रखते हैं. यासूब अब्बास का कहना है कि इंसान की जान ज्यादा जरूरी है.

जाहिर है हालात का अंदाजा मुस्लिम संगठनों को भी है. उनका साफ आरोप है कि सरकार की दोहरी नीति है. कहीं पाबंदी है तो कहीं कोई रोक-टोक नहीं है. चाहे बीजेपी शासित गोवा हो या फिर नगालैंड जहां बीजेपी सरकार का हिस्सा है.

जमीयत उलेमा हिंद का तर्क है कि गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित होने पर पूरे देश में बीफ पर पांबदी लग जाएगी. तो इससे जुड़ी हिंसा को रोका जा सकेगा. इस मसले पर बीजेपी के लिए दिक्कत पैदा हो सकती है. राजनीतिक तौर पर इस मसले का फायदा बीजेपी उठाती रही है. मुस्लिम संगठनों के इस तरह की मांग से बीजेपी की मुश्किल बढ़ सकती है.

गौहत्या के खिलाफ क्या है कानून?

गौहत्या के खिलाफ कोई केंद्रीय कानून नहीं है. लेकिन संविधान की धारा 48 के मुताबिक राज्यों को दूध देने वाले जानवरों जिसमें गाय भी शामिल है कि संरक्षा को लेकर कानून बनाने का अधिकार है. 26 अक्टूबर 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में माना कि गौहत्या के खिलाफ कानून बनाने का अधिकार राज्यों के पास है.

केंद्र सरकार ने मई 2017 में गाय-बैल के खरीद-फरोख्त पर पांबदी लगा दी थी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद सरकार ने नरम रुख अख्तियार कर लिया. देश के लगभग 24 राज्यों में गाय को मारने पर पाबंदी है.

लेकिन हर राज्य में कानून अलग-अलग हैं. मसलन महाराष्ट्र में मार्च 2015 के बाद नया कानून अमल में आया है. जिसमें गाय बैल और बछड़े के मांस के खरीद-फरोख्त पर 5 साल की सजा और दस हजार का जुर्माना लग सकता है. यूपी में सात साल की सजा का प्रावधान है. तो तमिलनाडु में गाय-बछड़े के स्लॉटर पर पांबदी है. लेकिन जो जानवर आर्थिक तौर पर लाभ नहीं दे सकते हैं उनके स्लॉटर पर पांबदी नहीं है. हालांकि गोवा नार्थ ईस्ट के कई राज्यों, केरल और बंगाल में किसी तरह की पांबदी नहीं है.

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मुगलकाल में गाय को मारने पर थी पांबदी

सुब्रमण्यम स्वामी ने बिल पेश करते हुए कहा कि मुगल काल में बाबर हुमांयू के ज़माने में भी गाय को मारने पर पाबंदी थी. बहादुरशाह ज़फर के वक्त में भी इसकी पांबदी लगी थी. लेकिन काउ स्लॉटर ब्रिटिश काल में शुरू किया गया है. मुगल काल के ज्यादातर वक्त में गाय को मारने पर पांबदी थी और इसके उल्लंघन पर सख्त सजा का प्रावधान था.

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औरंगज़ेब ने फतवे आलमगिरी के तहत ऐसा कृत्य को अपराध की श्रेणी से हटा दिया था. ब्रिटिश काल में गाय को लेकर 1880 से 1890 के बीच काफी हिंसा हुई जिसमें कई लोगों की जान गई थी.

हिंदू धर्म में गाय को मिला है महत्वपूर्ण स्थान

हिंदू धर्म के ऋग्वेद (1200-1500 ईसा पूर्व) का श्लोक 10:87:16 इंसान मवेशी और घोड़े को मारने पर पांबदी की बात करता है. और अग्नि से ऐसा करने वालों को सजा देने का आह्वान करता है. वहीं गाय को कृष्ण भगवान से भी जोड़कर देखा जाता रहा है. हिंदू धर्म के मुताबिक गाय की हत्या ब्रह्म हत्या के बराबर है. छांदोग्य उपनिषद् में किसी भी तरह के हिंसा को पाप माना गया है. सभी प्राणियों के प्रति अहिंसा का रुख रखने की वकालत की गई है.

इस तरह से बौद्ध जैन और सिख धर्मो मे गाय को मारने पर पांबदी है. जैन धर्म के लोगों ने अकबर से पर्यूषण पर्व के दौरान 12 दिन तक सभी तरह के जानवरों की हत्या पर पांबदी लगाने की अपील की थी, जिसे अकबर ने मान लिया. हालांकि जहांगीर ने इसे खत्म कर दिया था. लेकिन जैन धर्म की अपील के बाद इसे फिर से लागू कर दिया गया था.

फारसी यात्री अलबरुनी ने जिक्र किया है कि हिंदू धर्म में बीफ खाने पर पांबदी थी. ये बात दीगर है कि कई शक्तिपीठों में अभी भी जानवरों की बलि दी जाती है. अराध्य देवी और देवताओं को खुश करने के लिए ये मान्यता काफी पुरानी है. खासकर दशहरा के दिन लेकिन इसमें भी गाय की बलि नहीं दी जाती है.

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गाय को लेकर हिंसा

28 सितंबर 2016 में यूपी के दादरी में अखलाक की हत्या भीड़ ने कर दी. आरोप था कि बकरीद के अवसर पर फ्रिज में बीफ रखे हुए है. 5 अप्रैल 2017 को अलवर में पहलू खान की भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर दी कहा गया कि गाय की तस्करी में शामिल थे.

हालांकि पहलू खान के घर के लोगों ने कहा कि वो मवेशी को पालने के लिए ले जा रहे थे. इस तरह की वारदात झारखंड में भी हुई. एक रिपोर्ट के मुताबिक 2010-2017 के बीच 28 लोगों की हत्या कर दी गई और 125 लोगों गंभीर रूप से घायल हुए. जिसमें 4 हिंदू भी थे.

जुलाई 2016 में गुजरात के ऊना में दलित युवकों की पिटाई के बाद इस मामले ने तूल पकड़ा और गुजरात में बड़ा आंदोलन खडा हो गया. जिसके अगुवा रहे जिग्नेश मेवाणी गुजरात से विधायक चुने गए है. 2017 में गाय को लेकर 20 जगह हमले हुए. जिसमें गाय मारने की ज्यादातर बातें महज अफवाह पाई गई हैं. इस तरह की वारदात को लेकर प्रधानमंत्री को भी बयान देना पड़ा है.

ये बात दीगर है कि हिंसा का आरोप बीजेपी से जुड़े लोगों पर लगता रहा है.

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