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यूपी में बीएसपी-एसपी क्यों लंबे समय तक नहीं टिकेगा ये प्रयोग

मुलायम-कांसीराम की जोड़ी बहुत मजबूत थी जिसने मंदिर लहर के बाद भी अपना वोट बैंक बचाए रखा

Updated On: Mar 06, 2018 03:32 PM IST

Ajay Singh Ajay Singh

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यूपी में बीएसपी-एसपी क्यों लंबे समय तक नहीं टिकेगा ये प्रयोग

विज्ञान तो सियासत में आने वाले भूंकप का भी होता है लेकिन अपने मिजाज के लिहाज से यह विज्ञान तनिक कच्चा होता है. समाज-सागर भीतर ही भीतर बड़े चुप्पे अंदाज में करवट बदलते रहता है और हमारी नजरों से यह बदलाव अक्सर ओझल रहता है. ऐसे में खुद को सियासत का लाल-बुझक्कड़ मानने वालों की बुरी गत होती है. वे सियासी बदलावों की भविष्यवाणी करते हैं और भविष्यवाणी गलत निकलती है सो उन्हें अफसोस में अपने हाथ मलने पड़ जाते हैं.

उत्तरप्रदेश में शक्ल लेती सियासी तस्वीर इस सिद्धांत की पुष्टि करती है. फूलपुर और गोरखपुर में लोकसभा के लिए होने जा रहे उप-चुनाव में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का आपस में हाथ मिलाना कोई साधारण घटना नहीं जो उसकी अनदेखी कर दी जाए. ये दोनों दल जिन सामाजिक तबकों की नुमाइन्दगी करते हैं उसे देखते हुए ये माना जा सकता है कि यह घटना सूबे की सियासत में उथल-पुथल मचाने वाली साबित होगी.

अब सवाल ये बनता है कि क्या ऐसा हो पाएगा या नहीं? इसमें कोई संदेह नहीं कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी और मायावती की बहुजन समाज पार्टी एक-दूसरे के तगड़े प्रतिद्वन्दी रहे हैं. एक-दूसरे से दंगल लड़ते हुए अपने अकेलेपन में इन दोनों पार्टियों को देर से ही सही लेकिन समझ में आ गया है कि बंटकर रहने की सूरत में उन्हें सियासी तौर पर खात्मे का नहीं तो भी तकरीबन अपने विनाश जैसी स्थिति का सामना करना पड़ सकता है. लेकिन साथ ही यह मान लेना भी गलत होगा कि दोनों पार्टियों के एक साथ आ जाने से वे सामाजिक तबके भी एकजुट हो जाएंगे जिनकी वे नुमाइंदगी करते हैं.

क्या कहता है इतिहास

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ऐतिहासिक रुप से देखें तो समाजवादी पार्टी सूबे में अन्य पिछड़ी जाति(ओबीसी) की सियासत की नुमाइंदगी करती है और इस सियासत का उभार 1990 के दशक में लागू मंडल कमीशन की रिपोर्ट के संदर्भ में हुआ है. उस वक्त मुलायम सिंह यादव सूबे में ओबीसी के सबसे कद्दावर नेता थे और उनका पुरजोर निजी आकर्षण गैर-यादव ओबीसी जातियों को समाजवादी पार्टी के पाले में खींच लाने के लिए काफी था. मुलायम सिंह यादव सधे हुए नेता थे और अपनी राजनीतिक सूझ-बूझ से यह भांप चुके थे कि 6 दिसंबर 1992 के बाबरी-मस्जिद विध्वंस की घटना के बाद उनका राजनीतिक पराभव होना तय है. ऐसे में उन्होंने कांसीराम की बीएसपी के साथ गठबंधन बनाया. यूपी में दलित मतदाताओं की तादाद 22 फीसदी है और बीएसपी दलित जातियों की पार्टी बनकर उभरी थी.

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लेकिन उस वक्त भी एसपी-बीएसपी गठजोड़ को मीडिया के एक बड़े हिस्से में नाक-भौंह सिकोड़कर देखा जा रहा था. साल 1993 के विधानसभा चुनावों में यह गठबंधन सिर्फ बीजेपी ही नहीं बल्कि वीपी सिंह के जनता दल तथा कांग्रेस के बरखिलाफ खड़ा हुआ. दूसरी तरफ, मस्जिद के विध्वंस के बाद बीजेपी ने उत्साह के कुछ ऐसे उन्माद में आ गई कि उसके मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार कल्याण सिंह ने एक प्रेस-सम्मेलन में बोल पड़े कि बीजेपी अगर अच्छे-खासे बहुमत से नहीं जीतती तो मैं राजनीति छोड़ दूंगा. आखिर को हुआ यह कि कल्याण सिंह का दावा एकदम ही गलत निकला, एसपी-बीएसपी गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें मिलीं और इस नाते सरकार बनाने का दावा भी उसी का था

इसमें कोई शक नहीं कि मुलायम-कांसीराम की जोड़ी बहुत मजबूत थी. उस वक्त मुलायम की एक छवि हुआ करती थी, वे ऊर्जा से लबालब थे और उनमें वो दूरंदेसी भी थी कि बदलते हुए मंजर के हिसाब से खुद को ढाल लें. दूसरी तरफ कांसीराम बड़े कुशल संगठनकर्ता थे. बीते वक्तों में कई दफे हुई चुनावी हार के बावजूद वे अपनी पार्टी के सामाजिक जनाधार को एकजुट बचा रखने में कामयाब रहे थे. बामसेफ तथा डीएस4 जैसे उनके अग्रणी मोर्चे किसी कवच की तरह काम करते थे और पार्टी के दलित वोटशेयर में कमी नहीं आती थी. बाबरी-मस्जिद के विध्वंस के बाद बीजेपी हिन्दुत्व के आक्रामक प्रचार-अभियान पर जुटी लेकिन इसके बावजूद एसपी-बीएसपी ने अपना सामाजिक जनाधार बनाए रखा.

आज के हालात

Akhilesh_Mayawati

अब जरा इस तस्वीर की तुलना आज के हालात से कीजिए और आपको दोनों के बीच के फर्क का पता चल जाएगा. सियासत के मंच पर अखिलेश यादव का उभार हुआ तो है लेकिन पिता के विपरीत उनके लिए अपनी साख और धाक कायम करना अभी बाकी है. अखिलेश की राजनीति अभी पिता मुलायम सिंह यादव के कमायी सियासी पूंजी के भरोसे चल रही है. मुलायम सिंह यादव की छवि एक ऐसे नेता की थी जिसका आकर्षण पूरे सूबे यानि गाजियाबाद(पश्चिमी उत्तरप्रदेश) से लेकर गाजीपुर(पूर्वी उत्तरप्रदेश) तक कायम था. लेकिन इसके उलट मुख्यमंत्री के रुप में पांच साल गुजार लेने के बाद भी अखिलेश यादव अपनी छवि के भीतर ऐसा आकर्षण नहीं जगा पाए हैं.

यादव-कुनबे में पारिवारिक कलह जारी है और इस कलह के बीच समाजवादी पार्टी की सियासी पूंजी का बंटाधार हो रहा है. इसी तरह मुख्यमंत्री के रुप में मायावती का कार्यकाल घोटालों से घिरा रहा और दलित तबके के जनाधार का एक बड़ा हिस्सा जिसे कांसीराम ने बड़े जतन से संजोया था, अब उनसे दूर छिटक चुका है.

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इन बातों के मद्देनजर ऐसी संभावना नहीं दिखती कि अखिलेश-मायावती की जोड़ी पुरजोर उभार वाली उस बीजेपी को टक्कर दे पाएगी जिसने गैर-यादव ओबीसी तथा गैर-जाटव दलित तबके में अपनी पैठ बना ली है. एसपी और बीएसपी के बरअक्स सामाजिक इंजीनियरिंग की बीजेपी की कोशिशों को संगठन के मजबूत ढांचे का सहारा हासिल है और संगठन कल्याण सिंह के वक्त के उन्मादी उत्साह में नहीं बल्कि उपयोगितावाद के सिद्धांत की रोशनी में काम कर रहा है.

बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि गोरखपुर और फूलपुर के उप-चुनाव के नतीजे क्या रहते हैं. अगर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के सामाजिक जनाधार में हिन्दुत्ववादी ताकतों के खिलाफ एका बिना किसी गांठ के बन पाता है तो बहुत संभव है अखिलेश और मायावती सियासी प्रयोग के उसी रास्ते पर चलें जैसा कि बिहार में नीतीश कुमार और लालू यादव ने किया था. एक अहम तथ्य यह भी है कि जद(यू) और आरजेडी के बीच गठबंधन तभी बन सका जब 2015 से पहले हुए कई उप-चुनावों में इन दोनों दलों ने साथ मिलकर बीजेपी को सिलसिलेवार पटखनी दी. सो, लोकसभा के दो सीटों पर होने जा रहा उप-चुनाव उत्तरप्रदेश में शक्ल लेने वाले एक नए राजनीतिक प्रयोग की शुरुआती जमीन भी साबित हो सकता है.

मायावती की सियासत में तुनकमिजाजी का पुट है और अखिलेश यादव की राजनीति में एक किस्म की बेफिक्री का भाव सो इनके सामाजिक जनाधार का आपस में मिल पाना फिलहाल की स्थिति में तकरीबन नामुमकिन जान पड़ता है. क्या मायावती अखिलेश यादव की सरपरस्ती में काम करेंगी ? इस बात की संभावना तो नहीं दिखती कि बीएसपी के प्रमुख को सूबे की सियासत में अखिलेश यादव का दबदबा मंजूर होगा. दोनों सियासी खेमों के बीच दुश्मनी का एक इतिहास रहा है.

सो, आपसी वैर-भाव रखने वाले दो सामाजिक वर्गों के बीच साझा कायम करते हुए बीजेपी-विरोधी मोर्चे के रुप में उसमें जान फूंकने का काम फिलहाल की स्थिति में तो बहुत मुश्किल लग रहा है. लेकिन एक तथ्य यह भी है कि राजनीति अक्सर पूर्वानुमानों को गलत साबित करते आयी है. अगर उपचुनावों के नतीजे समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के बीच गठबंधन की राह बनाने वाले साबित हुए तो फिर इसमें कोई शक नहीं कि बनने वाला गठबंधन उत्तरप्रदेश में बीजेपी के उभार के लिए एक बड़ी चुनौती साबित होगा.

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