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मायावती का साथ क्यों चाहती है हर राजनीतिक पार्टी

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने बीएसपी सुप्रीमो मायावती को अगला प्रधानमंत्री बनाने की बात कही है.

Updated On: Oct 08, 2018 06:30 PM IST

Amitesh Amitesh

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मायावती का साथ क्यों चाहती है हर राजनीतिक पार्टी

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला ने बीएसपी सुप्रीमो मायावती को अगला प्रधानमंत्री बनाने की बात कही है. चौटाला का कहना है, ‘हम साथ काम करके सभी विपक्षी दलों को एक कर मायावती को अगला पीएम बनाने का काम करेंगे.’

आईएनएलडी सुप्रीमो ओमप्रकाश चौटाला ने यह बयान हरियाणा के गोहाना में आईएनएलडी-बीएसपी की साझा रैली के दौरान कही. आईएनएलडी और बीएसपी दोनों ने 2019 के संसदीय चुनावों से पहले हरियाणा में गठबंधन बनाया है. गोहाना में इनेलो सुप्रीमो ओम प्रकाश चौटाला ने रैली के जरिए शक्ति प्रदर्शन किया.

पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पिता चौधरी देवीलाल की 105 वीं जयंती के मौके पर चौटाला की तरफ से मायावती को लेकर दिया गया यह बयान हरियाणा ही नहीं देश की मौजूदा राजनीति के हिसाब से भी काफी मायने रखता है.

हरियाणा में पहले भी हो चुका है सफल प्रयोग

Om Prakash Chautala

ओम प्रकाश चौटाला

बात अगर हरियाणा की करें तो बीएसपी का हरियाणा में प्रभाव पहले से रहा है. 1998 के लोकसभा चुनाव में भी आईएनएलडी और बीएसपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था. आईएनएलडी 6 और बीएसपी ने 4 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें आईएनएलडी के खाते में 4 और बीएसपी के खाते में 1 सीट आई थी. यानी दोनों दलों के गठबंधन ने 10 में से 5 सीटों पर कब्जा जमा लिया था. लेकिन, 1999 ने आईएनएलडी ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया था, जिसके चलते उनका बीएसपी से नाता टूट गया था.

अब एक बार फिर बीस साल पहले के फॉर्मूले को आजमाने की तैयारी हो रही है. 2014 के विधानसभा चुनाव में भी हरियाणा में बीजेपी ने 33.20 प्रतिशत वोट शेयर के साथ हरियाणा में सरकार बना लिया था. जबकि कांग्रेस को 20.58, आईएनएलडी को 24.73 और बीएसपी को 4.37 फीसदी वोट हासिल हुआ था. यानी खराब हालत में भी अगर आईएनएलडी और बीएसपी के वोटों का प्रतिशत जोड़ दिया जाए तो यह कांग्रेस से ज्यादा है.

इसी गणित के सहारे चौटाला ने मायावती के साथ केमेस्ट्री बनाने की कोशिश की है. उन्हें लगता है कि एससी समुदाय को साथ लेने के लिए मायावती का साथ जरूरी है. अगर बीएसपी का साथ मिल गया तो एक बार फिर से हरियाणा की राजनीति में हाशिए पर खड़ी आईएनएलडी फिर से अपने पैरों पर खड़ी हो सकती है.

चौटाला को एससी मतों की फिक्र

ओमप्रकाश चौटाला का मायावती को प्रधानमंत्री बनाने के बारे में दिया बयान भी बीएसपी के कोर वोटर को दिया गया संदेश है. चौटाला को लगता है कि बीएसपी के कोर वोटर को भी पता है कि हरियाणा में बीएसपी का नेता मुख्यमंत्री पद का दावेदार नहीं हो सकता, लिहाजा बीएसपी की सर्वेसर्वा मायावती के नाम को देश के प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवार के तौर पर प्रोजेक्ट कर हरियाणा में एससी तबके का वोट हासिल करने की उनकी कोशिश हो रही है.

गोहाना की रैली में ओमप्रकाश चौटाला ने कहा कि विपक्षी दलों को मिलाकर मायावती को अगला पीएम बनाने का काम किया जाएगा. पैरोल पर जेल से बाहर आए चौटाला का लोकसभा चुनाव से पहले मायावती के समर्थन में दूसरे विपक्षी दलों से भी मिल कर आगे बढ़ने की बात कर रहे हैं.

विपक्षी गोलबंदी के केंद्र में मायावती क्यों ?

मौजूदा वक्त में विपक्ष की राजनीति की बात करें तो मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सभी दलों के साथ मिलकर 2019 में मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने की कोशिश तेज कर दी है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एसपी-बीएसपी-आरजेडी-टीएमसी समेत लेफ्ट पार्टियों को भी साथ लेकर चलने की कोशिश में हैं. दक्षिण के राज्यों में भी टीडीपी, जेडीएस, डीएमके को भी साथ लेकर चलने की तैयारी हो रही है. कांग्रेस का लक्ष्य हर हाल में मोदी को रोकना है.

बीएसपी ने मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के साथ गठबंधन की सभी संभावनाओं को खत्म कर अलग चुनाव लडने का ऐलान कर दिया है. फिर भी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी लोकसभा चुनाव में मायावती को साथ लेने की कोशिश में अभी भी लगे हुए हैं.

उधर, एसपी अध्यक्ष अखिलेश यादव पहले से ही मायावती के साथ गठबंधन करने को लेकर नरम रुख अपना रहे हैं. अखिलेश भी बार-बार बीएसपी के साथ गठबंधन की कवायद कर रहे हैं.

चौटाला से लेकर राहुल तक और राहुल से लेकर अखिलेश यादव तक सबकी कोशिश मायावती को साथ लेने की है. ये अलग बात है कि चौटाला के अलावा किसी और ने मायावती को खुलकर प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और दावेदार के तौर पर प्रोजेक्ट नहीं किया है. लेकिन, बदलते सियासी समीकरण के बीच मायावती की अहमियत काफी बढ़ गई है. क्योंकि जिस पार्टी को 2014 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट हासिल नहीं हुई थी, उस पार्टी को सब साथ लेकर चलने के लिए तैयार हो गए हैं. बल्कि यूं कहें कि पिछले लोकसभा चुनाव में खाता भी नहीं खोल सकने वाली पार्टी की नेता को साथ रखने के लिए सब बेचैन हैं तो कोई गलत नहीं होगा.

मायावती को साथ लेने से सभी पार्टियों को लगता है कि उनका वोट बैंक आसानी से ट्रांसफर हो जाता है. दूसरा बीएसपी के साथ गठबंधन बनाकर एससी समुदाय को साधने की है, क्योंकि अपने बुरे दौर के बावजूद मायावती का एससी समुदाय में व्यापक असर है.

मायावती अपने इस महत्व को समझती हैं. यही वजह है कि वो कांग्रेस के साथ दिखने के बजाए छोटे क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर अपने-आप को देश भर में बीजेपी विरोधी ताकतों के केंद्र में रखना चाहती हैं. इसी रणनीति के तहत मायावती ने हरियाणा में चौधरी ओमप्रकाश चौटाला से और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी से हाथ मिलाया है. आने वाले दिनों में हो सकता है मायावती यूपी के भीतर लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव से भी हाथ मिला लें, लेकिन, इसमें उनकी भूमिका अखिलेश यादव से बड़ी होगी.

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मायावती को भी लगता है कि मोदी विरोध के केंद्र में अगर उनको रखा जाता है तो वो कई क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर एक तीसरी ताकत के लिए तैयार हो सकती हैं. लेकिन, चुनाव से पहले कांग्रेस के साथ आने से शायद वो परहेज करें, क्योंकि, चुनाव बाद वो सौदेबाजी की बेहतर हालत में होंगी.

विपक्षी दलों की तरफ से की जा रही घेरेबंदी में चंद्रबाबू नायडू से लेकर ममता बनर्जी तक कई ऐसे नायक बनने का सपना पाल रहे हैं. लेकिन, इन सबकी सीमा अपने राज्य के भीतर ही है. मायावती इन सबसे अलग हैं. उनकी सीमा यूपी से बाहर कई राज्यों तक है. मायावती की इसी यूएसपी ने 2014 के लोकसभा चुनाव में शून्य पर आउट होने के बावजूद उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी गोलबंदी के केंद्र में ला दिया है.

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