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2019 की जीत की आधारशिला है यूपी की 'महाजीत'

यूपी में मिले बहुमत को सिर्फ हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से जोड़कर देखना एक भूल हो सकती है

Kinshuk Praval Kinshuk Praval Updated On: Mar 23, 2017 10:54 AM IST

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2019 की जीत की आधारशिला है यूपी की 'महाजीत'

यूपी के चुनावी नतीजों ने पिछले 25 साल के सारे राजनीतिक फॉर्मूलों को फ्लॉप कर दिया. वोटरों ने जातिवाद-परिवारवाद से ऊपर उठ कर बीजेपी को जनादेश दिया.

ये जनादेश कई मायनों में बीजेपी की नीतियों- योजनाओं और फैसलों पर भी पुरजोर मुहर है. इस बहुमत को सिर्फ हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से जोड़कर देखना एक भूल हो सकती है. ऐसा होता तो 90 के दशक में राम लहर के बूते बीजेपी की ही सूबे में सरकार बनी रहनी चाहिए थी. इस चुनाव की जिन बातों ने तस्वीर बदली उन्हें समझने और स्वीकार करने की जरूरत है.

यूपी चुनाव को लेकर ‘मोदी-मंत्र’ नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक तक सीमित नहीं था. एक साल पहले ही केंद्र सरकार उन योजनाओं को जमीन पर उतार चुकी थी जिनका फायदा 6 महीने के भीतर दिखाई देने लगा.

अमूमन सरकार की योजनाएं लंबी अवधि की वजह से जमीन पर जल्दी असर नहीं दिखा पाती हैं. लेकिन पीएम मोदी की कुछ योजनाओं ने कम समय में ही ज्यादा का असर दिखाया.

मोदी सरकार की योजनाएं महिलाओं के लिए बनी सौगात

केंद्र सरकार की योजनाएं गरीब महिलाएं, दलितों, किसानों को केंद्र में रख कर सामाजिक न्याय की पैरवी कर रही हैं. इन योजनाओं को विकास और सामाजिक न्याय से जोड़ कर देखा जा सकता है.

1 मई 2016 को यूपी के बलिया से प्रधानमंत्री ने 8 हजार करोड़ रुपए की उज्ज्वला योजना की शुरुआत की थी. योजना के तहत देश की पांच करोड़ महिलाओं को 3 साल के भीतर चूल्हे के धुएं से मुक्ति देने के लिए मुफ्त रसोई गैस देने का लक्ष्य रखा गया.

गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली करोड़ों महिलाओं के लिए ये योजना सहूलियत और सौगात है. इस जरूरत को महिलाएं पीढ़ी दर पीढ़ी महसूस करती आईं हैं लेकिन उसे पूरा करना आसान नहीं था. घर आए चमचमाते गैस सिलेंडर और चूल्हे ने उन परिवारों को कोयले और गीली लकड़ी से निजात दिला दी.

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यूपी में सबसे ज्यादा गैस कनेक्शन बांटे गए. इस योजना का सबसे ज्यादा लाभ गरीब और दलित महिलाओं को मिला. सोचने की बात ये है कि क्या इसके बावजूद उन परिवारों का वोट जाति या धर्म के आधार पर बंट सकता था जिन्हें बिना किसी भेदभाव के उज्जवला योजना का हिस्सा बनाया गया?

अगर सरकार वाकई 3 साल में 5 करोड़ गरीब महिलाओं के घर मुफ्त रसोई गैस पहुंचाने में कामयाब हो जाती है तो इक्कीसवीं सदी में इसे गरीबों के हित में बड़ी क्रांति माना जा सकता है.

उधर किसानों के लिए केंद्र सरकार की योजनाएं बीजेपी के लिए वोट मांगने का आधार बना रही थीं. छोटे किसानों को 3 लाख रुपए तक का लोन 7 फीसदी ब्याज पर देने की शुरुआत की गई. फसल लोन योजना से कम से कम उन किसानों को बड़ी राहत मिली जिनके पास जमीन तो थी लेकिन बीज और बुवाई-रोपाई का पैसा नहीं था.

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किसानों के लिए ही केंद्र सरकार ने फसल बीमा योजना का भी ऐलान किया. साल 2017 के बजट में फसल बीमा योजना के लिए  9 हजार करोड़ रुपए का ऐलान किया गया. साथ ही बीजेपी ने अपने घोषणा-पत्र में किसानों के कर्जा माफ करने की बात कर मास्टरस्ट्रोक चला.

दलितों और गरीब महिलाओं को अपना रोजगार शुरू करने के लिए भी सरकार ने एक तीर से कई निशाने साधे. बाबू जगजीवन राम के जन्मदिवस पर उत्तर प्रदेश से स्टैंड अप इंडिया योजना की शुरुआत की गई ताकि महिलाएं और दलित वर्ग अपना व्यवसाय शुरू कर सकें.

इससे पहले जन धन योजना की शुरुआत कर गरीबों के खाते खोलने का काम पीएम मोदी को घर-घर मोदी बना चुका था. ये काम युद्ध स्तर पर चला था जिसने 45 करोड़ खाते खोलने का रिकॉर्ड बनाया.

'काम बोलता है' पर भारी पड़ा विकास का एजेंडा

विकास के एजेंडे की योजनाएं खुदबखुद यूपी में बीजेपी की चुनाव की तैयारियों को पुख्ता कर रही थीं.

मोदी अपनी हर रैली में इन योजनाओं का बखान करते थे. चुनाव में मोदी की 27 से ज्यादा रैलियों में इन योजनाओं का उन्होंने जिक्र किया. जबकि सपा-कांग्रेस के पास दो नारे ही थे जो वो गूंज पैदा नहीं कर सके.

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तस्वीर: पीटीआई

चाहे बात ‘काम बोलता है’ की हो या फिर ‘यूपी के ये साथ पसंद है’ की हो. जनता ये समझने में उलझ चुकी थी कि कौन सा काम कहां बोल रहा है या फिर ये साथ किसको पसंद है?

इतना ही नहीं बल्कि यूपी में एक दर्जन सड़कों को नेशनल हाईवे का दर्जा दिया गया और तकरीबन 30 हाईवे पर काम की रफ्तार बढ़ाई गई. अखिलेश का एक्सप्रेस हाइवे समाजवादी पार्टी के लिए विकास का सिर्फ एक सिंबल बन कर रह गया क्योंकि ये ग्रामीण इलाकों में कौतूहल नहीं जगा सका.

पीएम मोदी अपनी यूपी में हर रैली में बिजली का जिक्र करते आए. वो ये बखूबी जानते थे कि अखिलेश सरकार को इस मोर्चे पर जोरदार तरीके से घेरा जा सकता है. बिजली के तारों पर नोंक-झोंक भी हुई. अखिलेश ने ये तक कहा कि बिजली के तारों को छूकर पता किया जा सकता है कि यूपी में बिजली आती है या नहीं.

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लेकिन काशी विश्वनाथ मंदिर में ऐन दर्शन के समय बिजली का जाना मोदी को मौका दे गया. ऐसे ही मौकों से निपटने के लिए केंद्र सरकार दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के जरिए खामोशी से आगे बढ़ रही है. इस योजना के तहत यूपी में 1 मई 2018 तक 18452 गांवों में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है.

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ऊर्जा मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक 16 अप्रैल 2016 तक 7258 गांवों में विद्युतीकरण का काम पूरा किया जा चुका है. अगर वाकई सरकार साल 2018 तक दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना के तय लक्ष्य तक पहुंच जाए तो उसके लिए साल 2019 के चुनाव में बोलने के लिए आधार होगा कि – काम बोलता है.

जाहिर तौर पर साल 2019 के लिए अभी से तैयारियां विकास के एजेंडे के साथ आगे बढ़ रही हैं जिनका चुनावी फायदा मिल सकता है.

राजनीतिक पंडितों को ये मानने में अब हिचकना नहीं चाहिये की पीएम मोदी न सिर्फ देश के बल्कि सियासत के भी सबसे बड़े ब्रांड बन चुके हैं. राजनीति के बाजार और जनता के मिजाज को समझने में उन्होंने हर जोखिम को उठाने में देर नहीं की. यही रिस्क लेने की उनकी क्षमता बीजेपी की ताकत बनती चली गई. 8 नवंबर की रात को नोटबंदी का ऐलान कर मोदी ने समूचे देश को लाइन में लगा दिया था.

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विपक्ष के लिए ये मौका मुद्दों की बरसात सा था. यहां तक कि नोटबंदी की वजह से मंदी की आशंका बढ़ी. पैसा निकालने वालों को लंबी लाइनों में घंटो खड़ा रहना पड़ा. एकबारगी लगा ये कि ये फैसला बीजेपी के लिए ‘बूमरैंग’ करेगा.

लेकिन पीएम मोदी ने उसी वक्त जनता से 50 दिनों तक धैर्य बनाए रखने की अपील की. अपील का असर भी हुआ. लाइन में खड़ी जनता ने तकलीफ सही लेकिन किसी ने नोटबंदी की बुराई नहीं की.

नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक से यूपी में दिखा 56 इंच का सीना

तमाम अर्थशास्त्री नोटबंदी को देश का सबसे बड़ा नुकसान बताने में व्यस्त थे. लेकिन पीएम मोदी जनता को ये समझाने में कामयाब रहे कि उनका ये जोखिम भरा फैसला कालेधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ है और राजनीतिक दलों की बेचैनी दरअसल उसी कालेधन को लेकर है जिसे नोटबंदी ने रद्दी बना दिया.

नोटबंदी ने समाज में गरीबों को ये खुशफहमी दे दी कि अब उनके अमीरों के बीच फर्क ज्यादा नहीं रह जाएगा. उससे पहले पाकिस्तान की जमीन पर सर्जिकल स्ट्राइक कर 56 इंच की गूंज को बढ़ा दिया गया.

हालांकि ये फैसला भारत-पाक युद्ध की वजह भी बन सकता था. लेकिन इसके बाद पाकिस्तान के रुख में बदलाव भी आया तो मोदी की छवि में भी तेज बढ़ा. इसे मोदी के रिस्क लेने की प्रवृत्ति की इंतेहाई कहा जा सकता है.

यूपी चुनाव के जानकार हमेशा जातीय समीकरण और मुस्लिम वोट बैंक के तराजू में तौल कर देखते और सुनाते थे. पिछले 25 साल का यूपी में राजनीतिक इतिहास गवाही देता आया कि यहां दो वर्गों की राजनीति के पास ही सत्ता की चाबी होती थी. दलित और यादव-मुस्लिम फैक्टर.

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इस बार मोदी की योजनाओं और फैसलों के सामने नेस्तनाबूद हो गया. दलितों को मोदी में समाजिक न्याय का नया चेहरा दिखा तो दूसरी जातियों को विकास की योजनाओं में भरोसा दिखा. सीटों के समीकरणों के हिसाब से बीजेपी ने अपने उम्मीदवार खड़े किए.

लेकिन इन उम्मीदवारों की असल जीत के पीछे केंद्र की योजनाओं का बड़ा सहारा था तो साथ ही मोदी की रैलियों में इन योजनाओं का ऐलान वोटरों को लुभाने में काम आया.

यही एक वजह मानी जा सकती है कि मोदी को अपनी योजनाओं पर इतना भरोसा था कि उन्हें यूपी में सीएम चेहरा प्रोजेक्ट करने की जरुरत नहीं महसूस हुई. उन्होंने खुद इसे साल 2019 के चुनाव से पहले के सेमीफाइनल की तरह लिया तभी आखिरी चरण में बनारस में 3 दिन रह कर पूरी ताकत झोंक डाली.

बनारस में उनका रहना भी चुनाव की आखिरी रिस्क था. अगर फैसले उलट होते तो इस वक्त न सिर्फ नोटबंदी पर सवाल खड़े होते बल्कि मोदी की लोकप्रियता के गिरे ग्राफ पर देशभर में बहस खड़ी हो चुकी होती. लेकिन अब ये कहा जा सकता है कि मोदी से नहीं बल्कि मोदी की योजनाओं से विपक्ष को डर लगता है.

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