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गोरक्षा पर कमलनाथ के सख्त फैसले से दिग्विजय सिंह खफा क्यों हैं?

मध्यप्रदेश में सरकार भले ही बदल गई लेकिन बीजेपी के बनाए 'गऊ गमन पथ' पर अब कमलनाथ सरकार का चलना मजबूरी बन गया है

Updated On: Feb 08, 2019 09:55 PM IST

Kinshuk Praval Kinshuk Praval

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गोरक्षा पर कमलनाथ के सख्त फैसले से दिग्विजय सिंह खफा क्यों हैं?

मध्यप्रदेश के सीएम कमलनाथ ने राजनीति का वो दौर भी देखा है जब ‘गाय और बछड़ा’ कांग्रेस का चुनाव चिन्ह हुआ करता था और अब वो दौर भी देख रहे हैं जब उन्हें गोरक्षा की कसम खानी पड़ी है. दरअसल, मध्यप्रदेश में सरकार भले ही बदल गई लेकिन बीजेपी के बनाए 'गऊ गमन पथ' पर अब कमलनाथ सरकार का चलना मजबूरी बन गया है.

इसी मजबूरी में गोरक्षा के नाम पर उनके सख्त फैसले उनके ही दाएं हाथ यानी दिग्विजय सिंह को रास नहीं आ रहे हैं. दरअसल, मध्यप्रदेश में कमलनाथ सरकार ने खंडवा में गोकशी के मामले में तीन लोगों पर रासुका लगा दी. कमलनाथ सरकार के इस कदम पर दिग्विजय सिंह ने विरोध जताया और कहा कि रासुका की बजाए आरोपियों के खिलाफ गोरक्षा अधिनियम के तहत कार्रवाई होनी चाहिए.

जाहिर तौर पर अल्पसंख्यक समुदाय के प्रति दिग्विजय सिंह की घोषित चिंता के पीछे वो दबाव है जो पार्टी के आरिफ मसूद और नसीम खान जैसे नेता बढ़ा रहे हैं. एक तरफ गोरक्षा के नाम पर कांग्रेस मुसलमानों को सीधा नाराज नहीं करना चाहती है तो दूसरी वो गोकशी के मुद्दे पर हिंदुओं की नाराजगी भी नहीं झेलना चाहती. ऐसे में कमलनाथ को अपने गऊ प्रेम के प्रदर्शन के बावजूद ये भी कहना पड़ा कि राज्य में गोरक्षकों की गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

खंडवा को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माना जाता है और गोकशी को लेकर खंडवा की छवि पर कई दाग हैं. गिरफ्तार किए गए तीन लोगों पर सांप्रदायिक हिंसा करने के भी आरोप लगे हैं. ऐसे में कमलनाथ सरकार ने आरोपियों के खिलाफ रासुका लगा कर सॉफ्ट हिंदुत्व के प्रति कांग्रेस की निष्ठा का सबूत देने की कोशिश की है. लेकिन दूसरी तरफ गोकशी के आरोपियों के खिलाफ रासुका का विरोध कर दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की तुष्टीकरण की नीति का नमूना भी पेश कर दिया.

बीजेपी के मुद्दों को हाईजैक करने की कांग्रेस जितनी भी कोशिश करे, कहीं न कहीं वो खुद अपने ही दांव से गच्चा खाने का काम कर जाती है. गोकशी के मुद्दे पर यही हुआ. पहले अल्पसंख्यक समुदाय के तीन लोगों के खिलाफ रासुका लगी तो बाद में गौरक्षकों की गुंडागर्दी को कमलनाथ ने जमकर फटकारा क्योंकि तूल पकड़ते मामले को बैलेंस करना था.

दरअसल, मध्यप्रदेश में कांग्रेस की 'डबल-टीम' यानी कमलनाथ और दिग्विजय सिंह दोनों समुदाय के बीच संतुलन बनाने का काम कर रहे हैं. हालांकि विधानसभा चुनाव के दौरान कमलनाथ का एक कथित वीडियो भी वायरल हुआ था.

इस वीडियो में उन्हें ये कहते हुए दिखाया गया था कि मुसलमानों का ज्यादा से ज्यादा वोट देना कांग्रेस के लिए कितना जरूरी है तो साथ ही ये भी कहते दिखाया गया था कि चुनाव जीतने के बाद वो संघ यानी आरएसएस से निपट लेंगे. लेकिन इसके बाद आश्चर्यजनक तरीके से कमलनाथ ने रुख बदला और सॉफ्ट हिंदुत्व के साथ गोरक्षा को लेकर अपना नया रूप गढ़ डाला.

2019 के लोकसभा चुनाव में  मुसलमानों की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहती कांग्रेस Digvijay Singh

बीजेपी के घोषणा-पत्र की गोशाला से कमलनाथ गायों को छुड़ाने की कोशिश में जुटे हुए हैं. गायों को लेकर कमलनाथ के प्रशासन को खुले निर्देश हैं कि वो सड़कों पर गोमाता को खुलेआम घूमते नहीं देखना चाहते हैं. कमलनाथ ने कहा है गोमाता सड़क पर नहीं दिखनी चाहिए क्योंकि ये उनकी निजी भावना है.

गऊ सेवा को लेकर कमलनाथ की राजनीतिक और निजी भावना पर सवाल नहीं उठा सकते क्योंकि वो अपने क्षेत्र छिंदवाड़ा को गौसेवा के रूप में राज्य में एक मिसाल बनाना चाहते हैं. लेकिन कांग्रेस हर उस संवेदनशील मुद्दे पर हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण से बचना चाहती है जिसका बीजेपी को सीधे तौर पर फायदा मिले. यही वजह है कि विधानसभा चुनाव के वक्त राहुल को शिवभक्त तो लोकसभा चुनाव के समय राहुल को रामभक्त बताकर प्रचारित किया जा रहा है.

राम मंदिर के मुद्दे पर भी कांग्रेस ने राहुल के भोपाल दौरे पर ऐसे पोस्टर छपवाए जिन पर लिखा था कि अयोध्या में कांग्रेस ही राम मंदिर का निर्माण कराएगी. इसके जरिए कांग्रेस ने एक तरह से बीजेपी के मुख्य एजेंडे को हाईजैक करने की कोशिश की.

हालांकि, कांग्रेस ने पोस्टर से पल्ला झाड़ लिया और उसे कार्यकर्ताओं का उत्साह बताकर टालने की कोशिश की लेकिन राम मंदिर के राजनीतिक इस्तेमाल में कांग्रेस ने नया दांव चल कर सबको चौंकाने का काम किया है. क्योंकि इससे पहले कांग्रेस के ही वरिष्ठ नेता और सीनियर वकील कपिल सिब्बल सुप्रीम कोर्ट में राम मंदिर पर लोकसभा चुनाव के बाद सुनवाई करने की अपील कर रहे थे.

साल 2019 के लोकसभा चुनाव में दरअसल कांग्रेस मुसलमानों की नाराजगी भी मोल नहीं लेना चाहती है. दिल्ली में अल्पसंख्यकों के अधिवेशन में राहुल गांधी का तीन तलाक कानून को खत्म करने का बयान दरअसल कांग्रेस का मुस्लिम झुकाव का ही ऐलानिया दस्तावेज भी है.

लेकिन कांग्रेस ये न भूले कि बाबरी विध्वंस के बाद मुसलमानों का दोबारा भरोसा जीतना उसके लिए इतना आसान नहीं है. साल 2019 में सत्ता में आने के लिए जिस मुस्लिम वोटबैंक का वो सपना पाल रही है उस पर समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी पहले ही 'डाका' डाल चुके हैं. ऐसे में कांग्रेस के लिए फिलहाल 'सॉफ्ट हिंदुत्व' को अपनाना ही चुनाव में 'न्यूनतम वोट गारंटी' है. तभी सीएम कमलनाथ पुराने कांग्रेसियों को गाय पर नया निबंध पढ़ा रहे हैं.

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