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दिल्ली: बवाना चुनाव हारकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक जमीन खो दी है

बवाना उपचुनाव बीजेपी और आप से ज्यादा कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण था लेकिन पार्टी ने ये मौका भी गंवा दिया

Aparna Dwivedi Updated On: Sep 01, 2017 11:26 AM IST

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दिल्ली: बवाना चुनाव हारकर कांग्रेस ने अपनी राजनीतिक जमीन खो दी है

बवाना उपचुनाव में ऐसी क्या खास बात है कि फैसला आने के एक हफ्ते बाद भी इसकी चर्चा हो रही है. और चर्चा जीतने वाली पार्टी नहीं बल्कि हारने वाली में पार्टी में चर्चा हो रही है. बवाना उपचुनाव से कांग्रेस को काफी उम्मीद थी, इस उपचुनाव में अगर कांग्रेस जीतती तो वर्तमान विधानसभा में अपना खाता खोल पाती.

क्या खास था इस उपचुनाव में

इस उपचुनाव के जरिए कांग्रेस 2015 की हार को भूल कर विधानसभा में अपना खाता खोलना चाहती थी. इसीलिए कांग्रेस ने तीन बार विधायक रह चुके सुरेंद्र कुमार को टिकट दिया था. साथ ही अपनी पूरी ताकत झोक दी थी. कांग्रेस ने पार्टी 40 पूर्व विधायक, 20 मौजूदा पार्षद और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा को यहां प्रचार के काम में लगाया है. क्योंकि यहां के गांव में जाटों की आबादी अच्छी-खासी थी. लेकिन बावजूद इसके कांग्रेस तीसरे नंबर पर आई.

SHEILA

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने इस हार का ठीकरा प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन पर फोड़ा और खुल कर कहा कि उन्हें इस हार की जिम्मेदारी लेनी चाहिए. हालांकि इस हार के कई कारण हैं.

कांग्रेस में उत्साह की कमी

चुनाव के दिन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने कोई उत्साह नहीं दिखाया. बूथों पर भी कांग्रेसियों में जोश नहीं दिखाई दिया. वोटरों के प्रति अपील करने की कोई इच्छा भी नहीं दिखी. चुनाव की तारीख का ऐलान हो जाने के बाद भी प्रचार में कांग्रेस के बड़े नेता नहीं आए. प्रचार में पहले दिन से ही नेताओं में जोश नहीं दिखा. आम आदमी पार्टी ने जहां पर अपनी पूरी ताकत लगा दी, उनके शीर्ष नेता से लेकर कार्यकर्ताओं में जोश दिखता रहा, यहां तक कि बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष भी चुनाव क्षेत्र में घूमते नजर आए लेकिन कांग्रेस की तरफ से केंद्रीय स्तर का कोई बड़ा नेता नहीं दिखा.

आंतरिक कलह

पार्टी में टूट तो नजर आने लगी थी. दिल्ली कांग्रेस के बड़े नेता अरविंदर सिंह लवली के बीजेपी में जाने के बाद तो ये साफ दिखने लगा कि दिल्ली में कांग्रेस में सबकुछ ठीक नहीं है. धीरे-धीरे टूटते लोगों ने कांग्रेस की कमर तोड़ दी. जिस हिसाब से दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने पार्टी और दिल्ली अध्यक्ष अजय माकन पर निशाना साधा, ये खुल कर बता रहा है कि दिल्ली में सब ठीक नहीं है.

लोगों से दूरी

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पिछले कुछ महीनों से जनता की समस्याओं को जानने के लिए अस्पतालों, स्कूलों का दौरा किया और अधिकारियों के साथ लगातार बैठकें की. उससे लोगों को नई उम्मीद नजर आई.

arvind kejriwal

बवाना में मुख्यमंत्री ने खुद विकास कार्यों पर नजर रखी. साथ ही दिल्ली राज्य के संयोजक गोपाल राय ने भी अपनी टीम के साथ रात-दिन बवाना में काम किया. लेकिन साठ-सत्तर नेताओं की टीम के बावजूद कांग्रेस जनता में अपना विश्वास नहीं कायम कर पाई. दिल्ली के अनुभवी जानकार नेताओं की कमी कार्यकर्ताओं को खलती रही.

केंद्रीय नेतृत्व का उदासीन होना

आप और बीजेपी से ज्यादा महत्वपूर्ण था कांग्रेस के लिए ये चुनाव जीतना. लेकिन कांग्रेस के लिए ये जीवन और मरण का सवाल था. साल 2014 में आम चुनाव, फिर साल 2015 के विधानसभा चुनाव में और एमसीडी चुनाव में मिली हार के बाद कांग्रेस पार्टी के नेताओं के साथ-साथ पार्टी कार्यकर्ताओं का भी मनोबल कमजोर हुआ है.वैसे भी ये दिल्ली का राज्य स्तर का आखिरी चुनाव था, इसके बाद 2019 में लोकसभा चुनाव होगा. ऐसे में ये एक चुनाव दिल्ली में ही नहीं केन्द्रीय स्तर पर भी इसका असर सकारात्मक होता.

हालांकि कांग्रेस को पिछले चुनाव में मिले 7.8 फीसदी वोटों के बाद अब 25 फीसदी वोट मिले हैं जो दिल्ली में कांग्रेस की स्थिति में सुधार का संकेत है. पर इस से कांग्रेस को ज्यादा खुश नहीं होना चाहिए. साल के अंत में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद अगले साल कर्नाटक के चुनाव होने हैं जो कांग्रेस के शासन वाला इकलौता बड़ा राज्य है.

इसके बाद 2019 की सबसे बड़ी लड़ाई लोकसभा का चुनाव है. कांग्रेस अगर दिल्ली में अच्छा प्रदर्शन करती तो कार्यकर्ताओं के मनोबल पर इसका अच्छा असर पड़ता. फिलहाल कांग्रेस को हर तरह से जोशीले कार्यकर्ता चाहिए तभी गुजरात और कर्नाटक जैसे राज्यों में कांग्रेस का प्रदर्शन बेहतर होने की उम्मीद होती. कांग्रेस के लिए इस समय हर चुनाव महत्वपूर्ण है. बीजेपी जिस तरह से कांग्रेस को हाशिए पर ले आई ऐसे में जरूरत है कि कांग्रेस लोगों से जुड़े और अपनी जमीन को वापस पाने की कोशिश करे.

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