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सवर्ण आंदोलन और देशव्यापी बंद पर सियासी दलों की चुप्पी का क्या मतलब ?

गुरुवार 6 सितंबर को सुबह से ही मध्यप्रदेश से लेकर बिहार तक सड़कों पर आगजनी, हंगामा, धरना-प्रदर्शन की तस्वीरें सामने दिख रही थी.

Updated On: Sep 06, 2018 08:28 PM IST

Amitesh Amitesh

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सवर्ण आंदोलन और देशव्यापी बंद पर सियासी दलों की चुप्पी का क्या मतलब ?
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गुरुवार 6 सितंबर को सुबह से ही मध्यप्रदेश से लेकर बिहार तक सड़कों पर आगजनी, हंगामा, धरना-प्रदर्शन की तस्वीरें सामने दिख रही थी. कई शहरों में ट्रेन रोककर विरोध-प्रदर्शन किया जा रहा था. मध्यप्रदेश और बिहार के अलावा यूपी और राजस्थान में भी बंद समर्थकों ने जमकर विरोध किया.

क्षत्रीय महासभा, करणी सेना, परशुराम सेना से लेकर सवर्णों के संगठनों की तरफ से पहले से घोषित भारत बंद के दौरान विरोध खूब दिख रहा था. लेकिन, ज्यादा बवाल मध्यप्रदेश में दिखा जहां जल्द ही विधानसभा के चुनाव होने हैं. लेकिन, उत्तर भारत के लगभग सभी राज्यों में बंद का असर दिखा.

मध्यप्रदेश और राजस्थान में विधानसभा चुनाव से ठीक पहले सवर्णों के गुस्से को लेकर अब बीजेपी परेशान नजर आ रही है. सवर्ण मतदाताओं का बड़ा तबका बीजेपी का कोर-वोटर रहा है. हिंदी भाषी राज्यों में खासकर सवर्ण मतदाता पिछले चुनावों में लगातार बीजेपी का ही साथ देते रहे हैं. लेकिन, अब विधानसभा चुनावों से ठीक पहले उनकी नाराजगी कुछ इस तरह झलक रही है.

supreme court

एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए संसद से कानून पास कराने के सरकार के फैसले को लेकर उनके भीतर अब नाराजगी बढ़ गई है. एक साथ एक जुट होकर सवर्णों के सभी संगठन एक हो रहे हैं. उनकी मांग है सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक ही चले. एससी-एसटी एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बदलने की कोशिश नहीं करे. ऐसा नहीं करने पर नोटा का बटन दबाने की धमकी दी जा रही है. यही धमकी सत्ताधारी बीजेपी के लिए चुनौती बनती जा रही है.

मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से लेकर कई केंद्रीय मंत्रियों और सांसदों-विधायकों का विरोध हो रहा है. उनसे सवर्ण समाज इस मुद्दे पर जवाब मांग रहा है. लेकिन, उनके पास जवाब नहीं सूझ रहा है. पार्टी के नेता इस मुद्दे पर चुप्पी साधे हुए हैं. लेकिन, उम्मीद है कि वक्त के पास सबकुठ ठीक हो जाएगा.

सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी के नेता यह मान रहे हैं कि सवर्ण समाज का गुस्सा कुछ दिनों बाद शांत हो जाएगा. क्योंकि सवर्णों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है. सवर्ण तबका बीजेपी का कोर-वोटर रहा है जो वापस बीजेपी के पास ही रहेगा. लेकिन, पार्टी समाज के गुस्से को भांपकर फिलहाल चुप रहकर ही आगे बढ़ना चाहती है, जिससे मामला और ज्यादा न भड़के.

बीजेपी को पता है कि अब उसकी तरफ से एससी-एसटी एक्ट में आगे बढ़ाए जा चुके कदम से पीछे हटना नामुमकिन है. लिहाजा इस मुद्दे पर चुप्पी साधकर सवर्ण समाज को साधने के लिए दूसरे विकल्पों पर विचार किया जा रहा है.

kalraj mishra

पार्टी के वरिष्ठ नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री और देवरिया से बीजेपी सांसद कलराज मिश्र ने इस मुद्दे पर सवर्ण तबके का खुलकर समर्थन कर दिया है. पार्टी के भीतर सवर्ण नेताओं की तरफ से उठ रही आवाज को लेकर अब पार्टी ज्यादा चिंतित है. पार्टी को लगता है कि इस मुद्दे पर ज्यादा चर्चा और इस मुद्दे का गरमाना उसे राजनीतिक तौर पर नुकसान पहुंचा सकता है.

दूसरी तरफ, कांग्रेस इस मुद्दे पर चतुराई से अपना कदम बढ़ा रही है. कांग्रेस ने एससी-एसटी एक्ट के मसले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद काफी दबाव बनाया था. दलित संगठनों के साथ-साथ विपक्षी पार्टियों की तरफ से सरकार पर बनाए गए दबाव के बाद ही सरकार ने एससी-एसटी एक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने का फैसला  किया था. इस मुद्दे पर कांग्रेस भी दलितों की हितैषी के तौर पर अपने-आप को दिखा रही थी. लेकिन, अब जबकि सवर्णों का इस मुद्दे पर विरोध हो रहा है, तो कांग्रेस खुलकर कुछ भी बोलने से बच रही है. कांग्रेस को लग रहा है कि इस मुद्दे पर सवर्णों की नाराजगी का फायदा अंत में उसे ही होगा. कांग्रेस मान रही है कि मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में जहां बीजेपी के साथ उसकी आमने-सामने की लड़ाई है, वहां सवर्णों की नाराजगी से उसे सियासी मजबूती मिलेगी.

कांग्रेस नेता रणदीप सिंह सूरजेवाला का हाल में यह कहना कि कांग्रेस के डीएनए में ब्राम्हणों का खून है, अपने-आप में कांग्रेस की मंशा को दिखाता है. कांग्रेस बीजेपी के साथ जुड़ चुके सवर्णों को फिर से अपने पाले में लाने का यह सुनहरा मौका देख रही है. इसकी शुरुआत वो मध्यप्रदेश और राजस्थान के विधानसभा चुनावों से ही करना चाहती है.

randeep surjewala

सवर्ण मतदाताओं को बीजेपी और कांग्रेस दोनों ही दलों ने अबतक हाशिए पर रखा था. एससी-एसटी और पिछड़ों की राजनीति कर उन्हें लुभाने की कोशिश में लगी दोनों ही पार्टियों को अब सवर्णों के आंदोलन के बाद उनकी याद आ रही है. बीजेपी की तरफ से उनकी कोशिश हो रही है फिर से मनाने की. लेकिन, सवर्ण तबका अगर पिछले चुनाव की तरह वोट देने सड़क पर नहीं उतरा या यूं कहें कि सवर्ण तबके ने कांग्रेस-बीजेपी दोनो से दूरी बनाकर चुनाव में उदासीन रवैया अपना लिया तो फिर यह भी बीजेपी पर भारी पड़ सकती है. यही वजह है कि इस मुद्दे पर सभी दल फिलहाल चुप्पी साध कर संभलते हुए आगे बढ़ना चाहते हैं.

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