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शशिकला इतनी बुरी हैं, जितना उन्हें बताया जा रहा है?

शशिकला को लेकर इतनी जल्दी किसी निर्णय पर पहुंचना गलत होगा.

Updated On: Dec 11, 2016 08:15 AM IST

G Pramod Kumar

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शशिकला इतनी बुरी हैं, जितना उन्हें बताया जा रहा है?

गरीबों की ‘अम्मा’ और आम आदमी की मुख्यमंत्री जयललिता की मृत्यु के बाद तमाम बहसें शुरू हो गई हैं. इनमें जिस बात ने सबका ध्यान खींचा, वह था लंबे समय से साथ रही उनकी दोस्त शशिकला नटराजन की भूमिका पर उपजा संदेह. शशिकला को एक कुटिल अवसरवादी की तरह पेश किया गया जो योजनाबद्ध तरीके से जयललिता की राजनीतिक और आर्थिक विरासत हड़पना चाहती हैं.

शशिकला के दुख से अंजान मीडिया 

मीडिया के एक बड़े हिस्से ने ऐसा मान लिया कि शशिकला को अपने सबसे करीबी व्यक्ति के जाने का दुख नहीं है. जिस व्यक्ति के साथ वे तीन दशकों से ज्यादा रहीं, उसके जाने पर शोक करने की बजाय वे अपने परिवार, जिसे जयललिता ने उनसे अलग कर दिया था, के साथ मिलकर कोई योजना बना रही हैं.

59 साल की एक धीर महिला जो पूरे दिन जयललिता के शव के पास आँखों में आंसू लिए खड़ी थी, मीडिया की नजरों में नहीं आती बल्कि साथ में खड़ा उसका परिवार सबका ध्यान खींचता है.

शशिकला के दुख का किसी को कोई अंदाजा नहीं है. यहां तक कि चेन्नई की मीडिया के वे पढ़े-लिखे संभ्रांत लोग भी शशिकला के मामले में इस बात को कोई तवज्जो नहीं देना चाहते कि किसी प्रियजन की मृत्यु से मानसिक तनाव के साथ शारीरिक परेशानियां भी होती हैं. उनके लिए शशिकला को शोक करने का भी हक नहीं है क्योंकि वह और उनका ‘मन्नारगुडी माफिया’ वहां सिर्फ जयललिता की संपत्ति को लूटने के लिए मौजूद था.

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इस बात को लेकर सभी एकमत हैं कि इतने सालों से शशिकला ही जया के जीवन को नियंत्रित करती थीं. उन्होंने इस बात का पूरा ध्यान रखा कि जया की बीमारी और ट्रीटमेंट की जानकारी पूरी तरह से गोपनीय रहे. लोगों का यह भी मानना है कि अपोलो हॉस्पिटल में जया के जीवन के आखिरी कुछ घंटों में वे सत्ता पाने के षड्यंत्र रच रही थीं.

यूं तो इस बात को मानने के लिए कोई विश्वसनीय तथ्य मौजूद नहीं है. यह सिर्फ परिस्थितियों के आधार पर लोगों द्वारा बनाई गयी धारणा है. हालांकि इस बात पर कोई ध्यान नहीं देना चाहता कि अगर अपोलो हॉस्पिटल में ऐसा कुछ गलत हो रहा था तो वहां मौजूद महत्वपूर्ण व्यक्तियों यानी खुद राज्यपाल और अपोलो के वरिष्ठ अधिकारियों की नजर में क्यों नहीं आया?

यह एक मेटानैरेटिव है यानी ऐसी धारणा जो किसी की जिंदगी के अनुभवों और जीवन मूल्यों के आधार पर एकतरफा समझ से बनी है. यहां बनी यह धारणा शशिकला की प्रचलित ‘शोषक’ की छवि, उन पर निर्भर उनके परिवार और जयललिता की नरमदिल छवि से मेल खाती है.

यहां इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं. हालांकि इसमें परेशानी यह है कि शशिकला और उनके परिवार के बारे में बनी इस धारणा को मजबूत करने के लिए सबके पास अपने पूर्वाग्रह और सुनी हुई कहानियां हैं.

शशिकला का दूसरा पहलू

लेकिन क्या यहां किसी दूसरे पहलू के बारे में बात की जा सकती है? क्या एक अलग नजरिए से देखने पर शशिकला की अलग छवि सामने आएगी? क्या वह उतनी बुरी हैं जितना उन्हें बताया जा रहा है? क्या उनकी जिंदगी को अलग एंगल से देखने पर कोई अलग तस्वीर बनेगी?

उपलब्ध तथ्यों और साक्ष्यों को सामने रखकर देखें तो एक अलग ही कहानी सामने आती है. कहानी वफादारी, दृढ़ इच्छाशक्ति और राजनीतिक दूरदर्शिता की. एक ऐसी कहानी जिसमें शशिकला भी जयललिता जितनी ही बहादुर नजर आ सकती हैं.

जया के जीवन में शशिकला करीब तीस साल पहले आईं. 1991 में 34 साल की उम्र से शशिकला जया के साथ रहने लगीं. तब से शशिकला को लोग जया के सहयोगी और देखभाल करने वाले के रूप में जानते आए हैं, जो दो बार कुछ समय के लिए निर्वासित किए जाने के बावजूद जया के साथ बनी रहीं. शशिकला हर वक्त उनके साथ रहतीं, चाहे घर हो, चुनावी कैंपेन हो, मंदिर हो या फिर जेल. या यूं कहें कि उन्होंने अपना जीवन ही जया को दे दिया था. वे हमेशा उनके साथ ही बनी रहीं. तब भी जब 1996 में उनके पास जया से अलग होने का मौका भी आया था.

जयललिता की परछाईं कहलाये जाने के इतर उनकी कोई और पहचान नहीं है. कुछ वरिष्ठ संपादक बताते हैं कि कई अवसरों पर जया, शशिकला का परिचय अपनी बहन के रूप में करवाया करती थीं. वरिष्ठ पत्रकार एन राम बताते हैं कि जया, शशिकला की तुलना अपनी माँ से किया करती थीं. वे कहती थीं, अगर उनकी माँ जीवित होतीं तो वे भी जया का वैसे ही ख्याल रखतीं जैसे शशिकला ने रखा. उन दोनों के संबंध इतने प्रगाढ़ थे कि दो बार उन्हें निकालने के कुछ ही समय में जया ने उन्हें वापस बुलाया था. यहां तक कि शशिकला को भी जया के साथ अपनी जिंदगी बिताने के लिए अपना वैवाहिक जीवन छोड़ना पड़ा.

फोटो. पीटीआई

जब वे जया के साथ आईं, तब वे एक जिंदादिल युवा थी जो अब जीवन के साठवें साल में प्रवेश करने वाली हैं. क्या इन सालों में बहुत कुछ बदला है? क्या शशिकला ही जया की एकमात्र करीबी हैं? अगर ऐसा है तो क्या शशिकला इस बात का फायदा उठा सकती हैं?

जयललिता का दाहिना हाथ

शशिकला जया की सहायक या परिचारिका मात्र नहीं थीं. वे राजनीतिक मसलों में भी उनके सपोर्ट सिस्टम के बतौर मौजूद थीं. जानकार बताते हैं कि वे पार्टी के मामलों में भी हिस्सा लेती थीं, खासकर चुनावों के समय कैंडीडेट चुनने, सीट के निर्णयों और संभावित सहयोगियों से समझौते करने में.

अंग्रेजी दैनिक द इंडियन एक्सप्रेस की इस रिपोर्ट में एक बड़े वाम नेता कहते हैं, ‘शशिकला के राजनीतिक कौशल को कम आंकना बेवकूफी होगी...उनकी बातों से वे काफी तेज और चालाक मालूम देती हैं...वे बहुत समझदार हैं. किसी गठबंधन आदि के समय वे अपनी मांग को दृढ़ता से रखती हैं. कोई समझौता नहीं करतीं पर अगर कोई तर्कपूर्ण बात रखी जाए तो उसे मानने से नहीं झिझकतीं.’

वे लगभग 25 सालों तक जयललिता के साथ हर रोड शो, कैंपेन, जनसभाओं में मौजूद रहीं हैं. एआईडीएमके में शशिकला जितनी राजनीतिक ट्रेनिंग किसी और के पास नहीं है.

उनके अलावा कोई और इतने करीब से जयललिता को बतौर एक राजनीतिज्ञ नहीं जानता. हिंदुस्तान की राजनीति में परिवारवाद का बोलबाला है. यहां नेताओं के मित्र, परिजन या रिश्तेदार बिना किसी राजनैतिक समझ या ट्रेनिंग के राजनीति में आ जाते हैं. क्या वहां शशिकला का यह अनुभव उन्हें जयललिता की राजनीतिक विरासत का असली हकदार नहीं बनाता?

पर सबसे जरूरी सवाल, अगर जया के अंतिम समय में उन्होंने वह सब नहीं किया होता, जो करने का उनपर आक्षेप है तब एआईडीएमके का भविष्य क्या होता? जयललिता ने पार्टी में न केवल अपने आगे न कोई सेकंड लाइन लीडरशिप तैयार की, बल्कि जो संभावनाएं थीं, उन्हें भी जानबूझकर खत्म कर दिया. ऐसे में अगर शशिकला हस्तक्षेप नहीं करतीं तो बिना किसी आधिकारिक वारिस और उत्तराधिकार की प्रक्रिया के पार्टी जाति आदि पर कई टुकड़ों में बंट चुकी होती. उस वक्त जो फैसले शशिकला ने लिए उनका लिया जाना पार्टी के लिए बेहद जरुरी था. क्योंकि जया ने कभी किसी व्यक्ति को विशेष तवज्जो नहीं दी इसलिए इन फैसलों को लेने के अलावा कोई और रास्ता ही नहीं था.

जयललिता

जयललिता के अंतिम दर्शन को उमड़ी जनता

जनता तय करेगी शशिकला का भविष्य 

हां, शशिकला का परिवार जिसे मीडिया उसके गैरकानूनी कारनामों के कारण ‘मन्नारगुडी माफिया’ के नाम से बुलाती है. अगर वापस आकर, किसी गैर-संवैधानिक इकाई के रूप में काम करने लगे तो यह लोगों के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. लेकिन जयललिता के अंतिम संस्कार के समय उनके मौजूद होने भर को इस बात का संकेत नहीं माना जा सकता. हो सकता है वे इसे अपने लिए कोई अवसर समझ कर स्वयं ही आए हों या इस दुख के समय शशिकला ने सहयोग के लिए अपने परिवार को बुलाया हो.

शशिकला को लेकर इतनी जल्दी किसी निर्णय पर पहुंचना गलत होगा. अगर वे और उनका परिवार वैसा कुछ करते भी हैं तो जनता निर्णय करने के लिए बैठी है. जनता का फैसला फिर वही होगा जो शशिकला के परिवार के लापरवाह शासन के बाद 1996 में था.

ऐसे में विपक्ष खासकर डीएमके की राजनीतिक जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि यदि ऐसा हो तो वे सत्ता पक्ष की जवाबदेही सुनिश्चित करें. यहां पिछले कुछ अनुभवों के कारण एक दुविधा की स्थिति जरूर है.

फिदेल कास्त्रो के बारे में बोलते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने कहा था कि इतिहास सब याद रखेगा और उसके अनुसार फैसला देगा. इतिहास ऐसी कहानियों से भरा हुआ है जहां खलनायक भी नायक बन गए हैं.

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