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नए आर्मी चीफ के नाम पर सरकार की क्या है दुविधा?

जनरल दलबीर सुहाग के बाद आर्मी की कौन संभालेगा कमान, सस्पेंस बरकरार

Updated On: Dec 15, 2016 08:26 AM IST

Prakash Nanda

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नए आर्मी चीफ के नाम पर सरकार की क्या है दुविधा?

नए साल की शुरुआत में देश को नया आर्मी चीफ मिलेगा. मौजूदा आर्मी चीफ जनरल दलबीर सिंह सुहाग का कार्यकाल खत्म होने वाला है. लेकिन सरकार ने अब तक नए आर्मी चीफ के नाम की घोषणा नहीं की है.

ये बात अब काफी चर्चा में है क्योंकि आम तौर पर सरकार तीनों ही सेनाओं के नए प्रमुख का एलान मौजूदा आर्मी चीफ के रिटायरमेंट से करीब दो महीने पहले कर देती है.

ऐसे में इस बार नए आर्मी चीफ के नाम के एलान में देरी का मामला राजनीतिक रंग लेता जा रहा है. दो साल पहले जनरल दलबीर सुहाग की नियुक्ति भी इसी तरह विवादों में पड़ गई थी.

आमतौर पर उप-सेनाध्यक्ष जो कि आर्मी चीफ के बाद दूसरे सबसे सीनियर अफसर होते हैं, उन्हें ही आर्मी चीफ बनाया जाता है.

Gn Dalbir suhag

आर्मी चीफ जनरल दलबीर सिंह सुहाग

सरकार ने तोड़ी परंपरा

आर्मी चीफ का कार्यकाल तीन साल या 62 साल की उम्र तक (दोनों में से जो भी पहले हो) का होता है. वो भी तब जब 60 साल में उन्हें रिटायर न किया जाए.

यानी अगर कोई साठ साल की उम्र पूरी होने के आखिरी दिन आर्मी चीफ नियुक्त होता है तो उसकी नौकरी दो साल अपने आप बढ़ जाती है.

लगता है कि सरकार ने ये परंपरा तोड़ दी है. नए आर्मी चीफ के कार्यभार संभालने में अब सिर्फ एक पखवाड़े का समय बचा है.

लेकिन जैसा कि इंडियन एक्सप्रेस ने खबर दी थी कि सरकार ने अब तक लेफ्टिनेंट जनरल प्रवीण बख्शी को उप-सेनाध्यक्ष नहीं नियुक्त किया है.

जनरल बख्शी कोलकाता स्थित ईस्टर्न कमांड के प्रमुख हैं. उनकी जगह उनसे जूनियर अफसर को उप-सेनाध्यक्ष बनाया गया है. न ही सरकार ने जनरल बख्शी को अभी अगला आर्मी चीफ मनोनीत किया है.

जैसा कि अखबार ने अटकलें लगाईं हैं कि जनरल बख्शी का आर्मर्ड कोर से होना उनके खिलाफ जा रहा है. क्योंकि आर्मी चीफ आम तौर से इन्फैंट्री से होते हैं.

आज तक सिर्फ जनरल के. सुंदरजी ही ऐसे आर्मी चीफ बने हैं जो आर्मर्ड कोर से थे. ये बात भी दो दशक से ज्यादा पुरानी हो गई है.

हालांकि इन बातों का ये मतलब नहीं कि जनरल बख्शी अगले आर्मी चीफ नहीं होंगे. सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि सरकार नए आर्मी चीफ के नाम का एलान करने में देर कर रही है.

अगर सरकार जनरल बख्शी की जगह उनके किसी जूनियर को आर्मी चीफ नियुक्त करती है तो 1983 में जनरल एस के. सिन्हा के बाद वो दूसरे आर्मी अफसर होंगे, जिनके जूनियर को आर्मी चीफ बनाया जाएगा.

लेकिन जब मनमोहन सिंह की सरकार ने 2014 में जनरल दलबीर सुहाग को आर्मी चीफ नियुक्त किया था. तब भी इसे लेकर सवाल उठे थे.

जनरल सुहाग का नाम उस वक्त के आर्मी चीफ जनरल बिक्रम सिंह के रिटायर होने से तीन महीने पहले ही घोषित कर दिया गया था.

जल्दबाजी की वजह क्या थी?

जनरल बिक्रम सिंह 31 जुलाई 2014 को रिटायर होने वाले थे. लेकिन मनमोहन सरकार ने जनरल सुहाग का नाम मार्च 2014 में ही घोषित कर दिया था. जबकि आम तौर पर सरकार दो महीने पहले ही नए आर्मी चीफ के नाम का एलान करती है.

परंपरा के मुताबिक जनरल बिक्रम सिंह के बाद के आर्मी चीफ के नाम का एलान 31 मई 2014 को होना चाहिए था. तब तक केंद्र में नई सरकार होती.

ऐसे में सवाल उठता है कि मनमोहन सिंह की सरकार ने क्यों नए आर्मी चीफ के नाम का एलान इतने पहले कर दिया था? इस जल्दबाजी की वजह क्या थी? इन सवालों के जवाब अब तक नहीं मिल सके हैं.

मोदी सरकार ने अब तक पहले से तय परंपरा का ही पालन किया है. जब सरकार ने नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा के नाम का एलान 40 दिन पहले किया.

INS BETWA

उनसे पहले के नौसेना प्रमुख एडमिरल आर के. धोवन के नाम का एलान भी यूपीए सरकार ने कुछ इसी तरह किया था.

जब उनसे पहले के नौसेना प्रमुख एडमिरल डी के. जोशी ने वक्त से पहले इस्तीफा दे दिया था. तो एडमिरल धोवन के नाम का एलान करने में सरकार ने दो महीने लगाए थे.

दो महीने तक नौसेना बिना प्रमुख के रही थी. देश के इतिहास में ये पहला मौका था जब नौसेना बिना प्रमुख के रही थी.

सरकार ने तय नियम कई बार तोड़ा

परंपरा के मुताबिक किसी सेना प्रमुख का सबसे सीनियर अफसर होने के साथ अनुभवी कमांडर होना भी जरूरी है. सभी लेफ्टिनेंट जनरल, वाइस एडमिरल और एयर मार्शल कमांडर रहे हों ये जरूरी नहीं.

यूपीए सरकार ने इस पहले से तय नियम को कई बार तोड़ा था. यूपीए सरकार ने जनरल सुहाग को सबसे सीनियर अफसर और कमांडर होने की वजह से आर्मी चीफ बनाया.

मगर एडमिरल आर के धोवन के मामले में इस नियम की अनदेखी कर दी गई. एडमिरल धोवन जब नेवी चीफ बने तो न तो वो सबसे सीनियर वाइस एडमिरल थे और न ही उनके पास कमांडर होने का तजुर्बा था.

भारतीय नौसेना की दो ऑपरेशनल कमांड हैं. मुंबई स्थित वेस्टर्न कमांड और विशाखापत्तनम स्थित ईस्टर्न नेवल कमांड. कोच्चि में सदर्न नेवल कमांड भी है. लेकिन ये ऑपरेशनल कमांड नहीं बल्कि ट्रेनिंग के लिए है.

अब तक एडमिरल सुशील कुमार के सिवा नौसेना का कोई चीफ नहीं हुआ जो सदर्न कमांड का कमांडर रहा हो.

एडमिरल सुशील कुमार को 1998 में उस वक्त की एनडीए सरकार ने तब नौसेना अध्यक्ष बनाया था. जब नेवी चीफ विष्णु भागवत को बर्खास्त कर दिया गया था.

लेकिन यूपीए सरकार ने एडमिरल आर के धोवन को बिना कमांडर होने के तजुर्बे के नेवी चीफ बना दिया था.

उस वक्त नौसेना प्रमुख एडमिरल डी के जोशी के इस्तीफे के बाद वेस्टर्न कमांड के प्रमुख वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा नेवी के सबसे सीनियर अफसर थे.

नियम के मुताबिक उन्हें ही नौसेना प्रमुख बनाया जाना चाहिए था. लेकिन जब उनकी जगह एडमिरल धोवन को नेवी चीफ बना दिया गया तो वाइस एडमिरल सिन्हा ने इस्तीफा दे दिया था.

सरकार के मंत्री की हो जिम्मेदारी

कहते हैं कि उनके वेस्टर्न कमांड के प्रमुख रहते हुए नौसेना में कई हादसे हुए थे. इन्ही में से एक हादसे की वजह से एडमिरल जोशी ने इस्तीफा दिया था. इसीलिए वाइस एडमिरल शेखर सिन्हा की जगह एडमिरल धोवन को नेवी चीफ बनाया गया था.

हालांकि ये तर्क सही नहीं क्योंकि तीनों ही सेनाओं पर सरकार का नियंत्रण है. ऐसे में किसी भी हादसे की जिम्मेदारी सरकार के मंत्री की होनी चाहिए.

इस मामले में एडमिरल जोशी की बजाय उस समय के रक्षा मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए था. जैसा कि रेल मंत्री रहते हुए लाल बहादुर शास्त्री ने इस्तीफा देकर किया था.

उन्होंने रेल हादसे के बाद रेलवे बोर्ड के चेयरमैन को इस्तीफा देने को नहीं कहा था. मगर वो और दौर था. अब किसी हादसे के बाद कोई मंत्री नैतिक आधार पर इस्तीफा नहीं देता.

तो क्या यूपीए सरकार को एडमिरल जोशी का इस्तीफा ठुकरा देना चाहिए था? जैसा कि पंडित जवाहर लाल नेहरू ने किया था.

जब उनकी सरकार के दौरान सेना प्रमुख के. एस. थिमैया ने रक्षा मंत्री कृष्णा मेनन से मतभेद के बाद इस्तीफा दिया तो पंडित नेहरू ने उनका इस्तीफा ठुकरा दिया था.

जहाज पहले भी डूबे हैं. एयरफोर्स के विमान अब भी क्रैश हो रहे हैं और पहले भी सैनिक शहीद होते रहे हैं. लेकिन इसकी सजा किसी प्रमुख को नहीं दी गई.

हादसों की वजह से किसी और सैन्य अफसर के करियर पर असर नहीं पड़ा. फिर आखिर एडमिरल जोशी और शेखर सिन्हा के साथ ही ये ज्यादती क्यों हुई?

सेना में सीनियर अफसरों की नियुक्ति के राजनीतिकरण का दोष सरकारों का है.

दिक्कत तब और बढ़ जाती है, जब रक्षा मंत्रालय से सेनाओं के बारे में जानकारियां लीक होती हैं. पिछले कुछ बरसों में ऐसा कई बार हुआ है.

आर्मी चीफ के तौर पर जनरल वी. के. सिंह के कश्मीर में एक्शन से जुड़ी फाइलों का सार्वजनिक होना एक मिसाल है.

विवादों से बचने की कोशिश करनी चाहिए

आर्मी चीफ के तौर पर जनरल सिंह ने जब दिल और दिमाग अभियान शुरू किया था. तो वो अपने से पहले के प्रमुख की शुरू की हुई परंपरा का ही पालन कर रहे थे. जैसा कि जनरल शंकर रॉय चौधरी ने सद्भावना अभियान शुरू करके किया था ताकि कश्मीर में स्थिरता आ सके.

आर्मी चीफ के तौर पर जनरल वी. के. सिंह के कदम को उस समय के रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी का पूरा समर्थन हासिल था. लेकिन जब उनके साथी गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने मामले की सीबीआई जांच की मांग की. तो रक्षा मंत्री ए. के. एंटनी ने इसका विरोध नहीं किया.

सरकार को ऐसे विवादों से बचने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए. किसी भी सेना का प्रमुख सबसे सीनियर अफसर ही हो, ये जरूरी नहीं.

जब अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने जनरल मार्टिन डेंपसे को ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ बनाया, तो वो सबसे सीनियर अफसर नहीं थे.

ओबामा ने उन्हें सेना प्रमुख बनाने के एक महीने बाद ही ज्वाइंट चीफ ऑफ स्टाफ बना दिया था. वो उस समय अमेरिका के सबसे सीनियर सैन्य अधिकारी नहीं थे.

Barack obama

क्या जनरल डेंपसे भारत में सेना प्रमुख बन सकते थे? अगर उनकी उम्र और दूसरे पहलुओं पर ध्यान दिया जाता तो वो कभी सेना प्रमुख नहीं बन सकते थे. लेकिन ओबामा ने उनकी काबिलियत को अहमियत दी.

भारत में भी ऐसे सेना प्रमुख की जरूरत है जो काबिल हो. उसकी उम्र सबसे बड़ा पैमाना न बन जाए. हालांकि किसी को इसलिए भी प्रमुख बनाया जाना ठीक नहीं क्योंकि उसकी उम्र कम है.

बराक ओबामा ने जनरल डेंपसे को इसलिए चुना कि वो बाकी अफसरों से युवा थे. मगर उसी अमेरिका ने जनरल मैकार्थर को 1938 में रिटायरमेंट के तीन साल बाद वापस ड्यूटी पर बुलाया था.

इसी तरह जनरल पीटर जान स्कूमाकर दिसंबर 2000 में रिटायर हो गए थे. मगर अगस्त 2003 में उन्हें वापस यूएस आर्मी सेना का प्रमुख बनाया गया था.

चयन का पैमाना सिर्फ काबिलियत

कहने का मतलब ये कि सेनाओं के प्रमुखों के चुनाव का पैमाना सिर्फ उनकी काबिलियत होनी चाहिए, उम्र नहीं.

भारत एशिया के उन गिने-चुने देशों में है जहां सेनाओं पर सिविलियन सरकार का नियंत्रण है.

हमें अपनी सेनाओं पर गर्व करना चाहिए कि उन्होंने सरकारी नियंत्रण का आदर किया है. ऐसे में सेना प्रमुखों की नियुक्ति पर राजनैतिक विवाद निराश करने वाला है.

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