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कौन थे चार्वाक ऋषि जिनका पीएम मोदी ने दिया हवाला

जानिए, उन ऋषि चार्वाक को, जिन्होंने खाओ-पियो-ऐश करो का दर्शन दिया

Updated On: Dec 11, 2016 10:32 AM IST

Mridul Vaibhav

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कौन थे चार्वाक ऋषि जिनका पीएम मोदी ने दिया हवाला

शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनासकांठा के अपने भाषण में एक भारतीय ऋषि को याद किया. पीएम यहां एक डेयरी प्लांट का उद्घाटन करने आए थे. मोदी ने जिन्हें याद किया उनका नाम लेने से अक्सर या तो लोग बचते हैं या फिर उन्हें नकारात्मक रूप से याद करते हैं.

चार्वाक संभवत: इस दुनिया के पहले ऐसे ऋषि थे, जिन्होंने खुले तौर पर वेदों, वैदिक ऋषियों और वैदिक कर्मकांड को चुनौती दी. वे नास्तिक थे.

चार्वाक ऐसे टेंपरामेंट में विश्वास रखते थे, जिसे आजकल रेशनलिज्म कहा जाता है.

चार्वाक का पूरा दर्शन इस बात पर टिका है कि खाओ, पियो और ऐश करो. भले इसके लिए आपको कर्ज भी क्यों न लेना पड़े. आप चिंता मत करो, क्योंकि एक बार मृत्यु हो जाने पर यह देह फिर जन्म लेने नहीं आने वाली. इसलिए कुंठाओं से चिंताओं से मुक्त जीवन जियो.

चार्वाक के जो संस्कृत श्लोक आजकल मिलते हैं, वे या तो महाभारत से या फिर जैन और बौद्ध दर्शन ग्रंथों से मिलते हैं.

चार्वाक के जो संस्कृत श्लोक आजकल मिलते हैं, वे या तो महाभारत से या फिर जैन और बौद्ध दर्शन ग्रंथों से मिलते हैं.

चार्वाक का दर्शन बहुत लोकप्रिय भी हुआ, लेकिन बौद्धों, जैनों और अद्वैतवादी दर्शन के उभार के बाद चार्वाक को पूरी तरह भुला दिया गया.

न तो ऋषि चार्वाक के बारे में कोई सटीक जानकारी मिलती है और न ही उनका दर्शन ही पूरी तरह कहीं उपलब्ध है. यह तय है कि चार्वाक वेदों के बाद और बौद्धों-जैनों से पहले हुए. वेदों की वे आलोचना करते हैं और बौद्धों तथा जैनों के दर्शन में चार्वाक का जिक्र है.

चार्वाक के जो संस्कृत श्लोक आजकल मिलते हैं, वे या तो महाभारत से या फिर जैन और बौद्ध दर्शन ग्रंथों से मिलते हैं.

स्वामी दयानंद सरस्वती ने भी उनके काफी श्लोक अपने ग्रंथ सत्यार्थप्रकाश में उद्धृत किए थे.

चार्वाक, वृहस्पति और लोकायत

चार्वाक ने कहा कि वेद धूर्त लोगों ने लिखे हैं और उन्हें मानने का कोई मतलब नहीं है.

चार्वाक ने कहा कि वेद धूर्त लोगों ने लिखे हैं और उन्हें मानने का कोई मतलब नहीं है.

चार्वाक को लोकायत कहा जाता है. कुछ जगह उनका नाम वृहस्पति भी बताया जाता है.

कई विद्वान् कहते हैं कि चार्वाक पहले हुए. वृहस्पति उनको लोकप्रिय बनाने वाले एक और दार्शनिक थे, जो चार्वाक पंथ को मानते थे और वृहस्पति ने ही चार्वाक दर्शन को लोगों के बीच पहुंचाया.

इनका कहना था: जो कुछ भी है, इस जीवन में है, इसी धरती पर है.

आर्ट ऑव जॉयफुल लिविंग के जनक थे चार्वाक

चार्वाक पूरी तरह भौतिकवादी थे. आप उनके दर्शन को समझकर कह सकते हैं कि वे आर्ट ऑव जॉयफुल लिविंग के जनक थे. उनका कहना था कि जो सुख का त्याग करते हैं, वे मूर्ख हैं. उनका कहना था कि जैसे किसान गेहूं से भूसे को अलग करके गेहूं रख लेते हैं और भूसे को छोड़ देते हैं, वैसे ही इंसान को सुख को ग्रहण करना चाहिए और दुख को छोड़ देना चाहिए.

चार्वाक ने कहा : वेद धूर्त लोगों ने लिखे हैं

चार्वाक ने कहा कि वेद धूर्त लोगों ने लिखे हैं और उन्हें मानने का कोई मतलब नहीं है. वेदों के ऋषि सुख को छोड़ने और दु:ख को गले लगाने को कहते हैं. यह गलत है. आप सुख को गले लगाओ और दु:ख से किनारा कर लो. दु:ख को लगे लगाने की बात कहने वाले पूरी तरह आपके जीवन को बर्बाद कर देंगे.

जो कुछ भी है वह यही लोक है, परलोक-वरलोक कुछ नहीं है

चार्वाक ने कहा कि कुछ मूर्ख लोग इस धरती के सुख को छोड़कर परलोक में जाकर सुख हासिल  करने की कामना लेकर पूजा-पाठ, अग्निहोत्र, यज्ञ, कर्म, उपासना आदि सब करते हैं.  ऐसा करके ये लोग अपने अज्ञान का प्रदर्शन करते हैं.

जब परलोक है ही नहीं और सिर्फ लोक ही है तो लोक के सुख की उपेक्षा करके अगले जन्म में सुख मिलने की उम्मीद करना तो मूर्खता ही है.

हिन्दू शास्त्रों में वेदों को ब्रह्मा के मुख से निकला हुआ बताया गया है.

हिन्दू शास्त्रों में वेदों को ब्रह्मा के मुख से निकला हुआ बताया गया है.

चार्वाक का वह दर्शन जिसने हिला दी थी वैदिक धर्म की नींव

-अग्निहोत्रं त्रयो वेदा…यानी अग्निहोत्र करना, तीन वेदों को मानना और भस्म रमाना बुद्धिहीन लोगों का काम है. ऐसा माना जाता है कि चार्वाक के समय तक तीन ही वेद थे चौथा अथर्ववेद बाद में जुड़ा. प्राचीन भारतीय दर्शन में वेद त्रयी की बात की जाती है - ऋगवेद यजुर्वेद और सामवेद.

चार्वाक के कुछ श्लोक कहते हैं:

-न कोई स्वर्ग है और न कोई नर्क. न कोई परलोक में जाने वाली आत्मा है और न कोई कर्मफल. जो कुछ है यहीं है.

-जो यज्ञ में पशु को मारकर स्वर्ग जाने की बात कहते हैं तो वे अपने पिता या दादा को, मां या दादी को मारकर उन्हें स्वर्ग क्यों नहीं भेजते?

-श्राद्ध करना पागलपन है. अगर कौए को खिलाया हुआ पितरों को पहुंचता है तो कौए का खिलाया हुआ विदेश गए आपके पिता तक क्यों नहीं पहुंचता?

उनका सबसे प्रसिद्द श्लोक है जिसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शनिवार को बनासकांठा में लोगों को भाषण देते हुए कहा.

यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः ॥

अर्थ है कि जब तक जीना चाहिये सुख से जीना चाहिये, अगर अपने पास साधन नही है, तो दूसरे से उधार लेकर मौज करना चाहिये, शमशान में शरीर के जलने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है?

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