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कर्नाटक चुनाव: मोदी और सिद्धारमैया की टक्कर में किसकी होगी जीत?

इस बार कर्नाटक चुनाव में भी सिद्धारमैया खुशी-खुशी बीजेपी के 'सीएम बनाम पीएम चुनाव' में उतरने के लिए तैयार हैं

Updated On: Feb 25, 2018 04:54 PM IST

FP Staff

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कर्नाटक चुनाव: मोदी और सिद्धारमैया की टक्कर में किसकी होगी जीत?

कर्नाटक में अप्रैल-मई में विधानसभा चुनाव होने हैं. भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बीएस येदियुरप्पा को कर्नाटक में पार्टी का मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया है. पीएम मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह कई मौकों पर येदियुरप्पा के लिए प्रचार भी कर चुके हैं. लेकिन, जैसे-जैसे चुनाव के दिन नजदीक आ रहे हैं, बीजेपी खेमे में हलचल तेज हो गई है. पार्टी से ऐसे संकेत मिल रहे हैं कि बेशक कर्नाटक में येदियुरप्पा सीएम चेहरा हैं, लेकिन पार्टी पीएम मोदी के नाम पर ही जनता से वोट मांगेगी.

 क्या होगा मोदी बनाम सिद्धारमैया का?

74 साल के येदियुरप्पा राज्य बीजेपी यूनिट के अध्यक्ष हैं. वह विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में पूरी लगन से जुटे हैं. लेकिन, अमित शाह ने बीजेपी कार्यकर्ताओं से पीएम मोदी के नाम पर वोट मांगने की अपील की है. हाल ही में दक्षिण कन्नड़ जिले में बूथ कार्यकर्ताओं से बात करते हुए अमित शाह ने कहा कि वे सिर्फ कमल (बीजेपी का चुनाव चिह्न) और मोदी की तस्वीर की ओर देखें.'

सूत्रों और ग्राउंड लेवल से मिले फीडबैक पर अगर गौर करें तो, बीजेपी की रणनीति में हुए इस बदलाव ने कर्नाटक चुनाव को मोदी बनाम सिद्धारमैया बना दिया है. सूत्रों का मानना है कि शायद बीजेपी नेतृत्व ने यह आंकलन किया हो कि अगर इस चुनाव में मौजूदा सीएम सिद्धारमैया और बीजेपी के सीएम उम्मीदवार येदियुरप्पा के बीच सीधा मुकाबला दिखाया जाए, तो उसका परिणाम क्या हो सकता है.

बीजेपी की चुनावी रणनीति में आए इस नए मोड़ से राजनीतिक संचार को लेकर दिलचस्प विश्लेषण सामने आए हैं.

हाल के दिनों में ऐसे संकेत मिल रहे थे कि सामान्य तौर पर बीजेपी और विशेष तौर पर प्रधानमंत्री कर्नाटक में 'नरेंद्र मोदी बनाम सिद्धारमैया' के रूप में व्यक्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.

अगर मौजूदा हालात की बात करें, तो मोदी बीजेपी के सबसे बड़े 'वोट कैचर' के तौर पर देखे जा रहे हैं. 2014 में केंद्र की सत्ता में आने के बाद बीजेपी ने ऐसी कोई भी चुनावी रणनीति नहीं बनाई, जिसमें पीएम मोदी केंद्र बिंदु न हो. बीजेपी नेतृत्व ने जितनी भी चुनावी रणनीति बनाई है, उसमें केंद्र में पीएम मोदी को ही रखा है. इसका फायदा बीजेपी को मिला भी है.

इसमें सिर्फ 2015 का दिल्ली विधानसभा चुनाव और बिहार विधानसभा चुनाव ही अपवाद है.

Phulbari: Prime Minister Narendra Modi gestures during his speech at BJP campaign rally ahead of Meghalaya Assembly elections at Phulbari on Thursday. PTI Photo (PTI2_22_2018_000136B)

दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में बीजेपी की रणनीति में कई समानताएं थीं:-

-दोनों ही राज्यों में पीएम मोदी के खिलाफ विपक्ष का नेतृत्व मजबूत पार्टी के नेता कर रहे थे.

-इन दोनों राज्यों में प्रांतीय नेता गैर कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व कर रहे थे.

-चुनाव प्रचार के आखिरी दिन विधानसभा चुनाव द्वि-ध्रुवीय चुनाव में बदल गए.

सिद्धारमैया एक क्षेत्रीय नेता नहीं हैं

दिल्ली में अरविंद केजरीवाल और बिहार में नीतीश कुमार मतदाताओं को यह विश्वास दिलाने में कामयाब रहे कि मतदान देश के प्रधानमंत्री के लिए नहीं हो रहे, बल्कि मुख्यमंत्री को चुनने के लिए हो रहे हैं. एक ऐसा मुख्यमंत्री जो राज्य के लोगों की बुनियादी समस्याओं का निपटारा कर सके.

इस बार कर्नाटक चुनाव में भी सिद्धारमैया खुशी-खुशी बीजेपी के 'सीएम बनाम पीएम चुनाव' में उतरने के लिए तैयार हैं. कांग्रेस की रैलियों में सिद्धारमैया ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया भी है. उनके मामले में अंतर बस इतना है कि केजरीवाल और नीतीश की तरह सिद्धारमैया एक क्षेत्रीय नेता नहीं हैं. लेकिन, वो राज्य में कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व जरूर कर रहे हैं.

इन सबके बावजूद हर चुनाव का अपना अलग सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक मंथन और अभ्यास होता है. कई लोगों का मानना है कि जेडी (एस) और बीएसपी गठबंधन के रूप में त्रि-ध्रुवीय दल एक त्रिशंकु विधानसभा की ओर बढ़ रहा है. पिछले पांच सालों में बहुत कम राज्यों ने ऐसा किया है. पिछले वर्ष के पहले पंजाब में भी ऐसा नहीं था, जब विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और अकाली दल के बीच मुकबला हुआ था. अब देखना है कि क्या कर्नाटक भी इसी रास्ते पर चलेगा या वहां कुछ अलग होगा?

(न्यूज़18 के लिए सुमित पांडे की रिपोर्ट)

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