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राजस्थान कांग्रेस: चुनावी साल में किसके मन में फूट रहा है लड्डू?

अशोक गहलोत ने इशारों-इशारों में प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद का सपना न देखने की हिदायत दी है. उनके इस बयान के बाद राजस्थान कांग्रेस में तूफान खड़ा हो गया है

Updated On: Jan 15, 2018 03:05 PM IST

Mahendra Saini
स्वतंत्र पत्रकार

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राजस्थान कांग्रेस: चुनावी साल में किसके मन में फूट रहा है लड्डू?

कहते हैं मौन सबसे अच्छा भाषण है. लेकिन थोड़े शब्दों में कही गई बात भी लंबे भाषणों से ज्यादा वजनी साबित होती है. कांग्रेस महासचिव अशोक गहलोत के एक छोटे से बयान ने राजस्थान कांग्रेस के अंदर बड़ा तूफान खड़ा कर दिया है.

गहलोत ने सीकर में पत्रकारों से कहा कि किसी के प्रदेश अध्यक्ष बनते ही लोग उसे मुख्यमंत्री बनने के सपने दिखाने लगते हैं. इसलिए प्रदेश अध्यक्ष को ऐसे 'सपनों' से बचना चाहिए.

अशोक गहलोत राजस्थान में ऐसी शख्सियत हैं जिनके राजनीतिक कौशल तक पहुंच पाना हर एक के बस की बात नहीं है. वो 'दिग्विजय' नेता नहीं हैं जो कुछ भी बोल दें या जिनकी बात को हल्के में लिया जाता हो. वो कोई भी बात मौका, वक्त और नफा-नुकसान देख कर ही करते हैं. जाहिर है प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को मुख्यमंत्री पद का सपना न देखने की हिदायत भी यूं ही नहीं दी गई होगी.

ज्यादातर चुप रहना और जोर का झटका धीरे से देना गहलोत की पुरानी आदत है. राजस्थान कांग्रेस में अरसे से नेतृत्व को लेकर गुटबंदी चरम पर देखी जा रही है. पहले यहां गहलोत और सीपी जोशी के दो गुट माने जाते थे. लेकिन सचिन पायलट के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद से ही इस साल होने वाले चुनाव के बाद कौन बनेगा मुख्यमंत्री का सवाल रह-रहकर उठ रहा है. शायद ऐसी चर्चाओं को विराम देने के लिए या किसे पता, नए सिरे से आगे बढ़ाने के लिए ही गहलोत ने यह बयान दिया हो.

Ashok Gehlot

अशोक गहलोत ने इशारों-इशारों में राजस्थान कांग्रेस के अध्यक्ष सचिन पायलट की महत्वकांक्षा पर निशाना साधा है

शतरंज के शातिर खिलाड़ी हैं अशोक गहलोत

शह और मात के खेल में अशोक गहलोत का कोई सानी नहीं है. सचिन पायलट तो इस बिसात पर नए खिलाड़ी माने जाते हैं. यहां तो मनोविज्ञान के प्रोफेसर सीपी जोशी तक गच्चा खा चुके हैं. वर्ष 2008 में जोशी के राजस्थान के मुख्यमंत्री बनने के पूरे आसार जताए जा रहे थे (उस समय जोशी भी प्रदेश अध्यक्ष थे). लेकिन जोशी समर्थक दबी जुबान में स्वीकारते हैं कि उनके नेता की एक वोट से हुई हार के पीछे गहलोत की 'जादूगरी' भी थी. कहने की जरूरत नहीं है कि इसी हार ने जोशी के पास जा रही मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली.

हालांकि सचिन पायलट के आने के बाद समीकरण बदलते नजर आ रहे थे. अकसर पायलट खेमे के नेता कहते हैं कि उन पर राहुल गांधी का हाथ है. अशोक गहलोत को बार-बार राजस्थान के बाहर के मुश्किल समझे जाने वाले टास्क दिए जाने को भी इसी से जोड़कर देखा जाता है. चर्चा है कि ये सब गहलोत को नाकाम साबित करने के लिए ही किया जाता है.

हाल के समय में गहलोत को पंजाब भेजा गया और गुजरात प्रभारी बनाए जाने के बाद तो लगा जैसे कि वो भंवर में फंस ही गए हैं. लेकिन पंजाब में मिली जीत, अहमद पटेल की राज्यसभा में हारी हुई बाजी में जीत और गुजरात विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सामने लगभग जीत को हारने से पहले 27 साल में पहली बार कांग्रेस का टक्कर में आना, इन सब ने निश्चित रूप से हाईकमान के सामने गहलोत का कद घटाने के बजाय बढ़ा दिया है.

शायद ये कद बढ़ने से आया कॉन्फिडेंस ही है कि उन्होंने पहली बार खुलकर सचिन पायलट पर तंज किया है. अशोक गहलोत ने 1980 के दशक में पहले इंदिरा गांधी के सामने खुद को साबित किया. बाद में राजीव गांधी के सामने, सदी के आखिरी और 21वीं सदी के पहले दशक में सोनिया गांधी के सामने खुद को साबित किया. अब लग रहा है जैसे राहुल गांधी के सामने भी अपनी जादू की छड़ी घुमा पाने में वो कामयाब हो गए हैं.

Ashok Gehlot And Rahul Gandhi

अशोक गहलोत को नेहरू-गांधी खानदार की पिछली तीन पीढ़ियों के साथ काम करने का अनुभव है

कद्दावर न होते हुए भी बढ़ाया कद

अशोक गहलोत का अब तक का राजनीतिक सफर दिखाता है कि उन्होंने मिले मौकों को भुनाने में रिस्क की कभी चिंता नहीं की है. 1998 में गहलोत ने ऐसे समय में कांग्रेस को पुनर्जीवित किया जब पार्टी का कोई भी स्थापित नेता भैरों सिंह शेखावत के सामने खड़े होते भी हिचकता था, खिलाफ बोलना तो दूर की बात थी. गहलोत ने न सिर्फ शेखावत का नीतिगत विरोध किया बल्कि कांग्रेस को चुनाव में दो-तिहाई बहुमत भी दिलाया.

1998 में 200 में से 153 सीटें जीत लेने के बाद राजनीतिक रूप से मजबूत जाट या ब्राह्मण जाति के नेता के ही मुख्यमंत्री बनने के कयास लगाए जा रहे थे. गहलोत के लिए तब हालात इतने विकट थे कि विधायक दल की बैठक में पर्यवेक्षक माधव राव सिंधिया की गहलोत का नाम प्रस्तावित करने की गुजारिश परसराम मदेरणा ने सिरे से खारिज कर दी थी. इसके बावजूद मुख्यमंत्री वो ही बने.

इसी तरह 2008 में मुख्यमंत्री पद के लिए जाट जाति के विधायकों ने हाईकमान को एक तरह से अल्टीमेटम दे दिया था. तब कांग्रेस को पूर्ण बहुमत नहीं मिल पाया था. पार्टी ने 200 में से 96 सीटें जीती थी और सरकार बनाने के लिए 5 और विधायकों की जरूरत थी. ऐसे समय में गहलोत ने एक बार फिर बेहतर प्रबंधनकर्ता के अपने कौशल का परिचय दिया और न सिर्फ कांग्रेस की सरकार बनवाई बल्कि खुद मुख्यमंत्री भी बने.

राजस्थान में राजनीतिक रूप से जाट, राजपूत और ब्राह्मण जातियों का वर्चस्व रहा है. गहलोत उस माली जाति से आते हैं जिसकी राज्य में जनसंख्या मात्र 3 फीसदी है. आम तौर पर कांग्रेस और बीजेपी से कुल मिलाकर इस जाति के 3-4 विधायक ही होते हैं. इसके बावजूद गहलोत ने अहम पदों पर काम कर के दिखाया है कि अपने जादूगर पिता से उन्होंने कितनी शिद्दत से जादू सीखा है. सीकर में ही उन्होंने खुद कहा कि वो राजनीति में पैदाइशी जादूगर हैं.

पायलट को तूफान से किश्ती निकालनी होगी 

29 जनवरी को 2 लोकसभा और 1 विधानसभा सीट पर होने जा रहे उपचुनाव से ठीक पहले मुख्यमंत्री पद को लेकर आए इस बयान ने अब गेंद सचिन पायलट के पाले में डाल दी है. पायलट अब चौतरफा दबाव में घिरे नजर आ रहे हैं. उपचुनाव में कांग्रेस अगर जीत गई तो भी पायलट पर ये आरोप लगेगा कि उन्होंने अपनी पुरानी सीट अजमेर से खुद उतरने का आत्मविश्वास नहीं दिखाया. और अगर बीजेपी जीत गई तो उनपर सवाल उठना तय है ही.

वैसे, कार्यकाल के पांचवें वर्ष में मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के खिलाफ एंटी इनकमबैंसी फैक्टर तेजी से काम करता नजर आ रहा है. जनता में राजे सरकार को लेकर भारी नाराजगी है. बीते 4 साल में युवा नौकरियों को लेकर तो किसान कर्ज माफी को लेकर गुस्से में हैं. पिछले कुछ महीनों से मुख्यमंत्री खुद विभिन्न जातीय समूहों से मिल रही हैं लेकिन लगता नहीं कि वो इनकी नाराजगी दूर कर पाई हैं.

Vasundhara Raje

वसुंधरा राजे के सामने इस साल होने वाले राजस्थान विधानसभा चुनाव को जीतकर सरकार बचाने की चुनौती होगी

तमाम कोशिशों के बावजूद राजपूत समुदाय ने बीजेपी के खिलाफ वैसे ही ताल ठोक दी है जैसे गुजरात में पाटीदारों ने. आनंदपाल एनकाउंटर से नाराज राजपूत समुदाय ने अजमेर लोकसभा सीट पर कांग्रेस उम्मीदवार रघु शर्मा को समर्थन देने का ऐलान कर दिया है. राजपूत बीजेपी के कोर वोटर हैं और उनकी नाराजगी को कम करने के लिए ही बीजेपी ने फिल्म पद्मावत के विरोध को अपना समर्थन दिया.

इस सबके बावजूद कांग्रेस की राह आसान नजर नहीं आ रही है तो सिर्फ और सिर्फ गुटबाजी के कारण. अगर गुटबाजी खत्म न की गई तो राजस्थान में भी हाथ आई जीत वैसे ही फिसल सकती है जैसे गुजरात में. गहलोत ने अब हालांकि सफाई देकर मामला रफा दफा करने की कोशिश की है. हमेशा की तरह ठीकरा मीडिया पर फोड़ा गया है कि बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया. लेकिन कांग्रेस नेताओं को समझना होगा कि असली नुकसान टूटे-फूटे बयान नहीं बल्कि लगातार मजबूत होती गुटबाजी करती है.

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