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रोजगार नहीं, पूंजी निवेश नहीं, कहां गए मोदी के अच्छे दिन

कुछ लोग देश की प्रतिष्ठा गिरा रहे हैं तो पीएम मोदी को बताना चाहिए कि 3.7 फीसदी विकास दर का आंकड़ा फर्जी है या असली

Rajesh Raparia Rajesh Raparia Updated On: Oct 05, 2017 06:34 PM IST

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रोजगार नहीं, पूंजी निवेश नहीं, कहां गए मोदी के अच्छे दिन

कंपनी सेक्रेटरीज के गोल्डन जुबली समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों पर करारा हमला करने वालों पर फूट पड़े. मोदी ने यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी या अन्य विरोधियों का नाम लिए बगैर कहा कि कुछ लोगों को निराशा फैलाने में बड़ा मजा आता है. उन्होंने जोर देकर कहा कि देश सही दिशा में आगे बढ़ रहा है तो ऐसे लोगों को परेशानी हो रही है और इनको अर्थव्यवस्था का विकास होते नहीं दिख रहा है.

इसके साथ ही उन्होंने अपनी सरकार की तमाम उपलब्धियां गिनाईं जिन्हें सैंकड़ों बार प्रधानमंत्री मोदी और उनके मंत्रिमडल के शागिर्द दोहरा चुके हैं. पर उन्होंने यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी या अन्य विरोधियों के तथ्यपरक सवालों का कोई तार्किक उत्तर नहीं दिया और सेबों में से अमरूद घटाकर अपनी उपलब्धियों को जायज ठहराने की भरपूर कोशिश की.

सबसे हैरानी करने वाली बात ये है कि 60 मिनट के अपने भाषण में उन्होंने तमाम आंकड़े पेश किए, लेकिन रोजगार पर गोलमोल बातें कहीं और ये नहीं बताया कि उनके राज में कितने रोजगार पैदा हुए. किसानों के देशव्यापी असंतोष को सिरे से पी गए. अरसे से अर्थव्यवस्था की मूल समस्या निजी निवेश के ठहराव या बैंकों के एनपीए पर विस्तार से बोलना उन्होंने मुनासिब नहीं समझा.

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने विरोधियों पर हमला करते हुए कहा कि कुछ लोगों को निराशा फैलाने में मजा आता है. सत्तर सालों में देश में कुछ नहीं हुआ, इसका ढोल पीटने में वो सबसे आगे हैं. 2014 के लोकसभा चुनावी संग्राम में कांग्रेस के 70 साल के कुप्रबंध से निजात दिलाकर उच्च आर्थिक विकास दर हासिल करने का वायदा एक बार नहीं कई बार किया.

युवाओं को हर साल एक करोड़ रोजगार देने का वायदा भी उन्होंने किया. किसानों को उनकी लागत का पचास फीसदी लाभप्रद मूल्य देने का वायदा भी उन्होंने किया था. तब विदेश में जमा कालाधन वापस लाकर हर नागरिक के खाते में 15 लाख रुपए जमा करने की बात भी की गई थी. अच्छे दिन लाने के लिए उन्होंने जनता से 60 महीने का समय मांगा था.

आर्थिक गतिविधियां लकवाग्रस्त 

अब 60 महीनों में से 40 महीने गुजर चुके हैं और देश की विकास दर तीन साल में जून 2017 की तिमाही में न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है. पर प्रधानमंत्री पूछते हैं कि क्या देश में पहली बार विकास दर 5.7 फीसदी हुई है? उन्होंने बताया कि कांग्रेस के राज में 8 बार विकास दर 5.7 फीसदी या फिर उससे नीचे रही है.

लेकिन उन्होंने ये नहीं बताया कि उनके राज में लगातार पिछली पांच तिमाहियों से विकास दर गिर रही है. जेहन में ये सवाल उठना वाजिब है कि क्या तीन साल में प्रधानमंत्री मोदी के इतने बुरे दिन आ गए, जिनको वो दिनरात अकर्मण्य, भ्रष्ट कहते थे, उनकी विफलताओं से अपनी सफलताओं की तुलना कर रहे हैं.

जाहिर है कि प्रधानमंत्री मोदी का अडिग अति आत्मविश्वास डोल चुका है. उन्होंने बढ़ते विदेशी मुद्रा कोष और चालू खाते के घाटे के कम होने का जिक्र बड़े फक्र से किया. पर वह ये भूल गए की जून 2017 की तिमाही में चालू खाते का घाटा जीडीपी के 2.4 फीसदी के स्तर पर पहुंच गया है, जो कि पिछले चार साल का सर्वाधिक घाटा है. यह घाटा तब बढ़ा है जब अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 2012-13 की तुलना में पचास फीसदी से अधिक की गिरावट है.

आर्थिक हालात मजबूत, तो क्यों नहीं बढ़ रहा है निजी पूंजी निवेश? 

manmohan singh-narendra modi

नीतिगत पंगुता के लिए मनमोहन सिंह सरकार की चौतरफा कटु आलोचना हुई थी, पर मौजूदा मुख्य वृहद आर्थिक संकेतकों से लगता है फिलवक्त देश में आर्थिक गतिविधियां लकवाग्रस्त हो गई हैं.

प्रधानमंत्री मोदी स्वयं कह रहे हैं कि देश सही दिशा में आगे जा रहा है, आर्थिक हालात मजबूत हैं, तो फिर अरसे से निजी पूंजी निवेश क्यों नहीं बढ़ रहा है? निर्यात क्यों गिर रहा है या फिर उसमें ठहराव क्यों है? जाहिर है कि इन वृहद आर्थिक संकेतकों पर सरकारी विद्वान बोलेंगे तो, मोदी सरकार का भेद स्वयं खुल जाएगा.

यदि कुछ लोग देश की प्रतिष्ठा गिरा रहे हैं तो प्रधानमंत्री मोदी को अवश्य बताना चाहिए था कि 3.7 फीसदी विकास दर का आंकड़ा फर्जी है या असली. दुनियाभर में ये प्रैक्टिस है कि जब भी नए पैमानों पर आंकड़े तैयार होते हैं, तब साथ ही पुराने पैमानों पर भी उन आंकड़ों को बताया जाता है.

मोदी सरकार ने नए आधार पर जीडीपी की गणना शुरू कर दी, लेकिन पुराने पैमाने पर यह क्या होगी, यह बताने में कोई ईमानदारी नहीं बरती. शायद यही ईमानदारी का प्रीमियम है, जिसका जिक्र कल प्रधानमंत्री मोदी ने किया है. वैसे वह यह भी भूल गए कि विदेशी भूमि पर देश की आलोचना करने वाले संभवत: वह पहले प्रधानमंत्री हैं.

क्या हुआ तेरा वादा 

कल के भाषण में उन्होंने दुनिया जहान के आंकड़े गिनाए, लेकिन रोजगार पर कोई भी आंकड़ा बताने की जहमत उन्होंने नहीं उठाई, जो आज निराशा-हताशा का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है. 2014 में उन्होंने युवाओं को हर साल एक करोड़ रोजगार देने का वायदा किया था, जिसकी पूंछ पकड़ कर उन्होंने बंपर तरीके से लोकसभा की वैतरणी पार की.

भारत सरकार के श्रम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार, मोदी राज के शुरू के दो सालों में मनमोहन सिंह राज के सबसे खराब आखिरी दो साल 2012-13, 2013-14 में कम रोजगार सृजित हुए. इस ब्यूरो के सर्वे के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2015 और 2016 में 1.55 लाख और 2.13 लाख नए रोजगार सृजित हुए, जो पिछले आठ सालों का न्यूनतम स्तर है. जबकि मनमोहन सिंह राज के आखिरी दो सालों में 7.14 लाख नए रोजगार सृजित हुए थे.

2017 में रोजगार की स्थिति और भी भयावह होगी. मुक्त बाजार अर्थव्यवस्था के पैरोकार कहते हैं कि जीडीपी की वृद्धि दर में एक फीसदी की बढ़ोतरी होने से 10 लाख नए रोजगार पैदा होते हैं. नोटबंदी के बाद से जीडीपी की दर में तकरीबन दो फीसदी की गिरावट आई है.

जाहिर है कि इससे रोजगार की स्थिति और बदतर हुई होगी. अब पिछले कुछ महीनों से छंटनी की खबरें लगातार बढ़ रही हैं, इससे कार्यरत नव युवाओं में भी दहशत का आलम है. वेतनवृद्धि या आमदनी बढ़ने की बात तो दूर की कौड़ी है.

modi

जोश पर होश नहीं 

प्रधानमंत्री मोदी तो कल समारोह में पूरे जोश के साथ अपनी आर्थिक नीतियों, निर्णयों और उपलब्धियों के लिए अपनी पीठ ठोंक रहे थे. लेकिन उसके चंद घंटे पहले ही भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी द्विमासिक समीक्षा सार्वजनिक की. इसमें कहा गया है कि जीएसटी लागू होने से निवेश को पटरी पर आने में और विलंब होगा.

रिजर्व बैंक के सर्वेक्षण में घरेलू उपभोक्ताओं का विश्वास कमतर बताया गया है. इसके चलते ही भारतीय रिजर्व बैंक ने 2017-18 के लिए विकास दर के अनुमान को 7.3 फीसदी से घटाकर 6.7 फीसदी किया है. इससे पहले भी कई देसी-विदेशी रेटिंग एजेंसियां और वैश्विक वित्तीय संगठन 2017-18 के लिए विकास दर के अनुमानों को कम कर चुके हैं.

असल प्रधानमंत्री मोदी की दिक्कत यह है कि वो अपने वायदों के आइनों को खुद ही तोड़ रहे हैं, तो उनकी छवि, विश्वसनीयता, लोकप्रियता तो छिटकेगी ही.

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