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बीजेपी में खेमेबाजी का पुराना रोग कैसे खत्म होगा...?

लालू से सियासी लड़ाई में सुशील मोदी को न तो केंद्रीय नेतृत्व और न ही राज्य इकाई से साथ मिलता दिखाई दे रहा है

Nishant Nandan Updated On: May 27, 2017 07:32 PM IST

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बीजेपी में खेमेबाजी का पुराना रोग कैसे खत्म होगा...?

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार की राजनीति में जब-जब कोई बड़ी हलचल हुई है पूरे देश की सियासत इससे प्रभावित हुई है. यहां के बड़े राजनीतिक चेहरे हमेशा ही विश्लेषकों के आलेखों में सुर्खियां पाते रहे हैं.

बिहार विधानसभा चुनाव ने पूरे देश में सुर्खियां बटोरी तो विपरीत धुरियों के नेताओं का महागठबंधन आज हर रोज किसी ना किसी वजह से देश के अखबारों में छाया रहता है.

अभी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और बिहार बीजेपी के दिग्गज नेता सुशील कुमार मोदी की जंग चर्चा में हैं. 1000 करोड़ रुपए की बेनामी संपत्ति अर्जित करने का आरोप, भूमि घोटाले का आरोप, मिट्टी घोटाले का आरोप और ऐसे ही कितने संगीन आरोप अब तक सुशील मोदी ने लालू और उनके कुनबे पर लगाए हैं.

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सुशील मोदी का बिहार में बीजेपी की जड़ें जमाने में अहम योगदान रहा है

हालांकि लालू पर घोटालों के आरोप तो पहले भी लगते रहे हैं. लेकिन अभी इन आरोपों की अहमियत इसलिए भी अधिक है क्योंकि कहीं न कहीं नीतीश कुमार इस महागठबंधन से मन ही मन खुश नहीं हैं. सियासी गलियारे में लालू-नीतीश के गठबंधन को मजबूरी का गठबंधन भी कहा जाता रहा है.

बहरहाल यहां चर्चा महागठबंधन की नहीं बल्कि लालू के खिलाफ सीधे मोर्चा खोलने वाले सुशील मोदी की हो रही है, जो अपने साहसी कदम के लिए पार्टी में सराहे तो जा रहे हैं लेकिन पार्टी के बड़े नेता उन्हें इस लड़ाई में अकेले छोड़ चुके हैं.

केंद्रीय नेतृत्व साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा

देखने से तो ऐसा ही लगता है कि सुशील मोदी इस लड़ाई में अकेले खड़े हैं और पार्टी के कई नेता उनसे दूरी बनाए हुए हैं. सिर्फ बिहार बीजेपी ही नहीं केंद्रीय नेतृत्व भी सुशील मोदी के साथ खड़ा नजर नहीं आ रहा है.

जिस महागठबंधन ने बिहार विधानसभा चुनाव के वक्त मोदी लहर को बिहार आने से रोक दिया उस महागठबंधन के कद्दावर नेता के खिलाफ इतने संगीन मुद्दे हाथ आने के बाद भी बीजेपी के वो बड़े नाम जिनका जुड़ाव बिहार से रहा है मसलन: शाहनवाज हुसैन, रविशंकर प्रसाद, मुख्तार अब्बास नकवी आदि ने एक बार भी सुशील कुमार मोदी के समर्थन में खड़े होने का इशारा तक नहीं किया है.

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सुशील मोदी ने लालू और उनके परिवार के कथित भ्रष्टाचार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि राज्य में बीजेपी की जड़ें जमाने में सुशील मोदी का अहम योगदान रहा है. 90 के दशक से राजनीति में सक्रिय सुशील मोदी पहले आरएसएस से जुड़े थे. राज्य में कई जगहों पर संघ की शाखा खोलने और लोगों को इससे जोड़ने में उनकी बड़ी भूमिका रही है.

वर्ष 1995 में मोदी बीजेपी विधानमंडल के मुख्य सचेतक निवार्चित हुए. साल 2004 में बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने. पार्टी में उनकी कार्यकुशलता और जनता के बीच पहुंच की वजह से वो 2005 में बिहार बीजेपी के अध्यक्ष चुने गए.

इसी साल सुशील मोदी लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर बिहार विधान परिषद के सदस्य बने थे. 2012 में वो दोबारा बिहार विधानसभा के सदस्य बने. सुशील मोदी दो बार बतौर बिहार के उपमुख्यमंत्री भी रह चुके हैं.

बिहार की राजनीति की उन्हें बारीक समझ

सुशील मोदी के इस बैकग्राउंड से जाहिर है कि बिहार की राजनीति की उन्हें बारीक समझ है. उन्हें मालूम है कि अगर लालू के खिलाफ मोर्चा खोलकर वो उसे बड़े मंच पर ले जाने में कामयाब रहे तो बिहार में बीजेपी जनता की सहानुभूति तो बटोर ही लेगी. इसके अलावा अपने पुराने साथी नीतीश कुमार को भी फिर से साथ लाने के लिए एक बड़ा माहौल भी तैयार हो जाएगा.

लेकिन लालू और उनकी इस लड़ाई की अहमियत क्या बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व नहीं समझता...? या फिर पार्टी के अंदर सुशील मोदी का विरोधी धड़ा यह नहीं चाहता कि बिहार में बीजेपी की जमीन बनाने का श्रेय सुशील मोदी को जाए आखिर बीजेपी में यह आपसी कश्मकश क्यों है...?

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बिहार में नीतीश-लालू के महागठबंधन में पिछले कुछ समय में खटपट की खबरें आई हैं

लालू के खिलाफ मोर्चाबंदी विपक्ष की एकजुटता के खिलाफ बड़ा हथियार

तो क्या नई टीम को केंद्रीय नेतृत्व का आशीर्वाद हासिल है और इसीलिए वो पार्टी के पुराने और वरिष्ठ नेताओं के साथ कदमताल नहीं कर रही. यह मान भी लें कि सुशील मोदी इन आरोपों के जरिए पार्टी में अपना पुराना कद हासिल करना चाहते हैं तो भी इसमें फायदा तो पूरी पार्टी का ही नजर आ रहा है, क्योंकि लालू के खिलाफ मोर्चाबंदी विपक्ष की एकजुटता के खिलाफ केंद्र सरकार का बड़ा हथियार साबित हो सकता है.

बीजेपी के मौजूदा नेतृत्व की सबसे बड़ी कमजोरी यह रही है कि वो हमेशा ही अपनों की नाराजगी को नजरअंदाज करती आई है. शायद यही वजह है कि लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं के साथ मंच पर पार्टी का मौजूदा नेतृत्व थोड़ा असहज नज़र आता है.

इसी कड़ी में एक बड़ा नाम है शत्रुघ्न सिन्हा का. सच तो यह है कि बीजेपी को भी नहीं मालूम की शत्रुघ्न पार्टी के दुश्मन हैं या ‘शत्रु’. केजरीवाल और लालू जैसे बीजेपी के बड़े विरोधियों के पक्ष में ट्वीट कर शत्रुघ्न पार्टी ने अपनी ही पार्टी को कटघरे में खड़ा कर दिया.

हालांकि शीर्ष नेतृत्व ने इसे नजरअंदाज कर यह दिखाने की कोशिश की कि वो शुत्रुघ्न की बातों को तरजीह नहीं देती. लेकिन बिहार में शत्रुघ्न बनाम सुशील मोदी की नई जंग छिड़ गई है और सुशील मोदी ने शत्रुघ्न को गद्दार तक कह दिया.

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सुशील मोदी ने शत्रुध्न सिन्हा को हाल ही में 'गद्दार' तक करार दे दिया है

आपसी कलह का खामियाजा भुगत रही बीजेपी...? बीजेपी आज जिस मुकाम पर खड़ी है उसे वहां तक ले जाने का श्रेय नरेंद्र मोदी और अमित शाह को दिया जा रहा है. लेकिन इन दो नामों के गुणगान में डूबी पार्टी को यह याद रखना होगा कि वरिष्ठ नेताओं की अनदेखी और आपसी कलह 2019 के लोकसभा चुनाव में उसे भारी भी पड़ सकती है.

बिहार का संदर्भ इसलिए बड़ा है क्योंकि यहां बीजेपी की लड़ाई अपने सबसे बड़े दुश्मन लालू यादव से है. लेकिन कश्मकश तो यह है कि पार्टी में खेमेबाजी का पुराना रोग आखिर खत्म होगा कैसे..?

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