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जब राष्ट्रवादी तिलक पर लगा था राजद्रोह, जिन्ना बने थे उनके मुहाफिज

जिन्ना ने तिलक का केस दो बार लड़ा लेकिन लेकिन पहली बार उन्हें कामयाबी हाथ नहीं लग पाई थी. लेकिन दूसरी बार अपनी सूझबूझ से वो तिलक को बचाने में कामयाब हो गए थे

Updated On: May 03, 2018 09:52 PM IST

FP Staff

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जब राष्ट्रवादी तिलक पर लगा था राजद्रोह, जिन्ना बने थे उनके मुहाफिज
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30 अप्रैल 1908 की बात है. दो राष्ट्रवादी बंगाली युवा क्रांतिकारियों प्रफुल्ल चाकी और खुदीराम बोस ने मुजफ्फरपुर में चीफ प्रेसीडेंसी मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड ऑफ कलकत्ता के काफिले पर बम से हमला कर दिया था. इस हमले में दो महिलाओं की मौत हो गई थी. हमले के बाद पकड़े जाने पर प्रफुल्ल चाकी ने आत्महत्या कर ली थी और खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई. फांसी से गुस्साए बाल गंगाधर तिलक ने अपने अखबार केसरी में न सिर्फ क्रांतिकारियों का बचाव किया बल्कि देश में तुरंत पूर्ण स्वराज्य की मांग कर डाली.

बाल गंगाधर तिलक के इस कदम से गुस्साई ब्रिटिश हुकूमत ने उन पर जल्द ही राजद्रोह का आरोप लगा दिया. हुकूमत का आरोप था कि उसके एक आला अधिकारी पर हमला हुआ है पकड़े गए आरोपी को मौत की सजा दी गई है तो आखिर बाल गंगाधर तिलक इसका बचाव क्यों कर रहे हैं? बाल गंगाधर तिलक पर केस चला. अपने मुकदमे में वो खुद का पक्ष ठीक से रख नहीं सके. जब मुकदमे के दौरान ऐसा लगने लगा कि तिलक अपना पक्ष ठीक से नहीं रख पा रहे हैं. तो उस समय कांग्रेस में उनके विरोधी धड़े के रूप में पहचाने जाने वाले मुहम्मद अली जिन्ना को केस में इनवॉल्व किया गया.

जिन्ना ने बाल गंगाधर तिलक का पक्ष बेहद मजूबती के साथ रखा लेकिन वो तिलक को उस समय बचा नहीं सके. तिलक को छह साल के कारावास की सजा हो गई, लेकिन तिलक तो तिलक थे. वो शायद आजादी के आंदोलन में इकलौते ऐसे नेता थे जिनके खिलाफ तीन बार राजद्रोह के आरोप लगे थे. दो बार उन्हें सजा मिली थी. अभी तक हम बात कर रहे थे 1908 की, इसके अलावा 1897 में भी बाल गंगाधर तिलक पर राजद्रोह का मुकदमा चला था और तब उन्हें 18 महीने कारावास की सजा हुई थी.

लेकिन दूसरी बार (1908) जब जिन्ना तिलक का केस लड़ रहे थे तो फिर उन्हें छह साल की सजा हुई. तिलक 1914 में जेल से छूट कर बाहर आए. पूर्ण स्वराज्य की उनकी मांग धीरे-धीरे उनके मन में बलवती होती जा रही थी. पूर्ण स्वराज्य की मांग को लेकर दिए गए उनके कुछ भाषणों की वजह से एक बार फिर (तीसरी बार) उन पर 1916 में राजद्रोह का आरोप लगा. इस बार भी उनके वकील मुहम्मद अली जिन्ना ही थे. इस बार जिन्ना शुरुआत से ही सजग थे.

नामी वकील और इतिहासकार एजी नूरानी ने अपने लेख में लिखा है कि तब तिलक चाहते थे कि यह केस भी राजनीतिक पहलुओं पर ही लड़ा जाए. लेकिन जिन्ना ने उन्हें समझाया कि अपना बचाव करने के लिए लीगल ग्राउंड बेहद  जरूरी है. इसी संदर्भ में तिलक ने यह भी स्पष्ट किया था कि उनके पूर्ण स्वराज्य की मांग क्या है ?

जिन्ना की बायोग्राफी लिखने वाले स्टैनली वोलपर्ट ने लिखा है कि इस केस में तिलक को जेल जाने से बचा लिया. इस केस में तिलक 20 हजार की जमानत देकर छूटे थे. ये शायद पहली बार था जब बाल गंगाधर तिलक राजद्रोह के आरोप के बावजूद भी जेल नहीं गए थे. और ये कमाल जिन्ना ने ही किया था.

दिलचस्प बात ये है कि बाल गंगाधर तिलक और जिन्ना के बीच कई बातों को लेकर आपस में मतभेद भी रहे. लेकिन इन सारी बातों के बावजूद उस समय देश की आजादी के लिए अपने साथी को ब्रिटिश सरकार के पंजों से निकाल लाने में जिन्ना जरा भी पीछे नहीं हटे.

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