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एक पत्रकार बीजी वर्गीस भी थे, जो आधी सैलरी पर पूरा काम करना चाहते थे

वर्गीस की साफगोई से एक पत्रकार की निष्ठा और जीवन पद्धति का पता चलता है

Updated On: Jun 26, 2017 11:31 AM IST

Surendra Kishore Surendra Kishore
वरिष्ठ पत्रकार

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एक पत्रकार बीजी वर्गीस भी थे, जो आधी सैलरी पर पूरा काम करना चाहते थे

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी के मारे चर्चित पत्रकार बी जी वर्गीस जनता सरकार के दौर में जयप्रकाश नारायण की सलाह पर भूमि सुधार के लिए बिहार गए थे. पर वहां भी निहित स्वार्थियों ने उनकी एक न चलने दी. निराश वर्गीस जब बिहार छोड़ रहे थे तो उनकी आंखों में आंसू थे.

वर्गीस को आपातकाल में हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक के पद से हटना पड़ा था क्योंकि उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री के खिलाफ लिख दिया था. याद रहे कि वर्गीस 1966 से 1969 तक प्रधानमंत्री के सूचना सलाहकार भी रह चुके थे. यानी वह कोई अभियानी पत्रकार नहीं थे पर वह जन सरोकार की भावना से ओत प्रोत जरूर थे.

21 जून 1927 को पैदा हुए वर्गीस का 30 दिसंबर 2014 को निधन हो गया. उन्हें मैगसैसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था. वह आजीवन अपने सिद्धांतों पर डटे रहे. यानी सादा जीवन उच्च विचार. उनके बारे में एक अजूबी बात मुझे जनसत्ता के प्रधान संपादक प्रभाष जोशी ने बताई थी. उन्होंने जब इंडियन एक्सप्रेस ज्वाइन किया तो उन दिनों संपादक की तनख्वाह 20 हजार रुपए मासिक थी.

वर्गीस ने मालिक रामनाथ गोयनका से कहा कि मेरा काम दस हजार से ही चल जाएगा. गोयनका जी ने उन्हें यह कह कर समझाने की कोशिश की कि इस पद के लिए इतनी ही तनख्वाह तय है. उससे कम हम कैसे दे सकते हैं ?

इस पर उन्होंने कहा कि पत्रकार के पास अधिक पैसे नहीं आने चाहिए. अधिक पैसे आने के बाद फिर वह पत्रकार नहीं रह जाता. रामनाथ जी ने इस पर कहा कि ‘तुम्हें यहां नहीं बल्कि वेटिकन सिटी में रहना चाहिए था.’

खैर जो हो. बाद में यह पता नहीं चल सका कि उन्होंने दस हजार ही लिए या उन्हें बीस हजार लेना पड़ा. पर इससे एक पत्रकार की निष्ठा और जीवन पद्धति का पता जरूर चलता है.

उन्होंने टाइम्स आॅफ इंडिया में अपनी पत्रकारिता शुरू की. वह 1969 से 1975 तक हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादक थे. 1982 से 1986 तक इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे.

Jaiprakash Narayan

जयप्रकाश नारायण

कोशी क्षेत्र में भूमि सुधार और विकास का कार्यक्रम

साल 1978 की बात है. तब बिहार में जनता पार्टी की सरकार थी. कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री थे. जयप्रकाश नारायण का सपना था कि कोशी क्षेत्र में माॅडल भूमि सुधार और विकास का कार्यक्रम चलाया जाए. जेपी ने इस काम के लिए गांधी शांति प्रतिष्ठान से गांधीवादी बी जी वर्गीस को पटना बुलाया.

सुधार कार्यक्रम के तहत समस्याओं से घिरे पूर्णिया जिले के पांच प्रखंडों के भूमि रिकाॅर्ड को अद्यतन करना था. हदबंदी से फाजिल घोषित जमीन का अधिग्रहण करना और उसे भूमिहीनों में वितरित करना था. साथ ही बटाइदारों के अधिकारों को स्वीकृति दिलानी थी. इसका नाम दिया गया था कोशी क्रांति योजना. इसके तहत उन पांच प्रखंडों का सर्वांगीण विकास करना था.

इसे कार्य रूप देने के लिए जेपी की सलाह पर कर्पूरी ठाकुर सरकार ने एक सरकारी कोषांग का गठन कर दिया. उसमें उपायुक्त और कई स्तरों के 119 लोकसेवक थे. वर्गीस उस सरकारी दल के सलाहकार बने. इस संबंध में जेपी के आवास पर बैठक हुई थी. उसमें जेपी, मुख्यमंत्री, वर्गीस और संबंधित सरकारी अफसरान मौजूद थे.

जिन प्रखंडों का सर्वांगीण विकास होना था, उनमें भवानीपुर, बनमनखी, धमदाहा, बरहरा कोठी और रूपौली प्रखंड शामिल थे. भूमि सुधार कार्यों की शुरुआत होते ही सत्ताधारी दल जनता पार्टी के कई विधायकों ने राज्य सरकार के खिलाफ हल्ला बोल दिया. वे विधायक या तो खुद उस इलाके के बड़े भूस्वामी थे या उनके हितों के संरक्षक थे. तब पूर्णिया जिले में 10 हजार ऐसे भूस्वामी थे जिनके पास सौ एकड़ या उससे अधिक जमीन थी.

कोशी क्रांति योजना अधूरी रह गई

बिहार जनता पार्टी के विक्षुब्ध गुट के नेता के यहां उन विधायकों की बैठक हुई. उन लोगों ने तय किया कि यदि यह कार्यक्रम जारी रहा तो हम कर्पूरी सरकार को गिरा देंगे. कर्पूरी ठाकुर दबाव में आ गए. जेपी भी उन स्वार्थी तत्वों के सामने लाचार हो गए. राज्य सरकार ने काम रोक दिया. कोशी क्रांति योजना अधूरी रह गयी यानी विफल हो गई. बी जी वर्गीस अपनी आंखों में आंसू लिए दिल्ली लौट गए.

इस बीच एक और घटना हुई. पटना के एक अखबार को वर्गीस ने बिहार की भूमि समस्या पर दो किस्तों में छापने के लिए अपना एक लंबा लेख दिया था. संपादक की अनुमति से लेख की पहली किस्त छप भी गयी. पर पता नहीं क्यों दूसरी किस्त नहीं छपी.

दूसरी किस्त छपवाने के लिए वर्गीस कई दिन उस अखबार के दफ्तर में गए. पर उन्हें लगा कि लेख नहीं छापने का संपादक पर कहीं से जबरदस्त दबाव था. यानी मीडिया पर भी निहितस्वार्थियों के वर्चस्व का वह एक नमूना था. यदि कोशी क्रांति पर काम पूरा हो गया होता तो बिहार को पिछड़ापन से मुक्त करने की दिशा में वह मील का पत्थर साबित हो सकता था.

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कर्पूरी ठाकुर को श्रद्धांजलि देते हुए लालू प्रसाद यादव (फोटो: हिंदी न्यूज़ 18)

परसबिगहा कांड की पुनरावृति

उस कोशी क्रांति योजना के बारे में पीटीआई ने 2 अप्रैल, 1981 को एक खबर जारी की थी. उस खबर के अनुसार, ‘पूर्णिया के पांच प्रखंडों में तीन साल पहले शुरू की गई योजना भूस्वामियों और भूमिहीनों के बीच सीधा टकराव पैदा कर अपने ही भार से दबी जा रही है. यहां अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस योजना की सफलता की उम्मीद नगण्य है क्योंकि राजनीतिक संरक्षण प्राप्त कुछ भूस्वामी इस योजना के प्रत्येक स्तर पर अवरोध पैदा कर रहे हैं. स्थानीय नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि भूमि सुधार के काम बंद नहीं किए गए तो परसबिगहा कांड की पुनरावृति हो सकती है.’

याद रहे कि मध्य बिहार के जहानाबाद जिले के परसबिगहा ने भूमिस्वामियों ने बाहर से बंद कर एक मकान में आग लगा दी थी. उस घटना में मकान के भीतर 13 दलित जलकर मर गए थे. याद रहे कि उस नरसंहार का मुख्य अभियुक्त 2014 में ही गिरफ्तार हो सका था.

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