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अयोध्या: नाम तो बदल गया लेकिन कब होगा राम की नगरी का विकास

अयोध्या जैसी थी वैसी ही है. कुछ बदला नहीं है. चुनाव से पहले फिर अयोध्या लाइमलाइट में है

Updated On: Nov 09, 2018 09:49 PM IST

Syed Mojiz Imam
स्वतंत्र पत्रकार

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अयोध्या: नाम तो बदल गया लेकिन कब होगा राम की नगरी का विकास
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कई साल बाद अयोध्या जाना हुआ. रेलवे स्टेशन पर उतरते ही कोई आश्चर्य नहीं हुआ, कुछ नहीं बदला था. स्टेशन बिल्कुल वैसा ही था जैसा 7-8 साल पहले था. उतनी ही गंदगी, बंदरों का उत्पात वैसे ही बदस्तूर था. हां, कुछ एक नई ट्रेन ज़रूर अयोध्या होती हुई चली है. जिसमें बनारस के लिए इंटरसिटी भी शामिल है.

इस स्टेशन से गुज़रने वाली दून एक्सप्रेस उस दिन 15 घंटे लेट थी. लेकिन स्टेशन पर यात्रियों के लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है. साबरमती एक्सप्रेस भी तय समय से लेट चल रही थी. यात्री बार बार पूछताछ कार्यालय जाकर ट्रेन के आवागमन की जानकारी ले रहे थे.

अनाउन्समेंट सिस्टम से आवाज़ सही से सुनाई नहीं देने के कारण यात्रियों को बार बार पूछताछ कार्यालय जाकर ट्रेन का पता लगाना पड़ रहा था. सिर्फ मैनुयल सिस्टम सही था. यात्रा करने वालों में कुछ एक लोग गुजरात के थे, जो धार्मिक पर्यटन पर थे. कुछ माइग्रेंट लेबर जो दिवाली के लिए घर जा रहे थे. बाकी आसपास के छात्र या लोकल पैसेंजर थे.

शहर का हाल:

बाहर निकलते ही कोई बदलाव नहीं दिखाई दिया है. सिवाय एक नए बने जैसा दिख रहे सुलभ शौचालय के. यूपी पर्यटन का साकेत होटल पर नया रंग रोगन हुआ था. यह होटल भी काफी पुराना है.

स्टेशन से श्रीराम अस्पताल तक सड़क की हालत वैसी है. टूटी हुई नालियां, सड़क के किनारे वैसे ही होटल जैसे किसी रेलवे स्टेशन के किनारे होता है. रास्ते में जर्जर हालात में खड़ा नगर निगम का रैन बसेरा अपनी बदहाली पर रो रहा है. साथ ही वो किसी हादसे को भी दावत दे रहा है. अयोध्या को फैज़ाबाद से जोड़ने वाली मेन सड़क पर ताज़ा लेपन हुआ है. पता चला कि मुख्यमंत्री के आगमन से पहले यह काम हुआ है. श्रीराम अस्पताल पर भी नया रंग रोगन किया गया है.

ayodhya

इसके बाद अयोध्या की तरफ जाने पर पुराने रोडवेज़ बस स्टैंड को कायाकल्प का इंतज़ार है. हाइवे बन जाने के बाद अब यहां सिर्फ लोकल बस ही आती है. लेकिन लोकल बस श्रद्धालुओं के लिए अयोध्या के बीच बना यह बस स्टैंड काफी मुफीद है. पर यहां अब सन्नाटा पसरा है.

अयोध्या की मेन सड़क के किनारे वही बेतरतीब दुकाने लगी हैं. कई पुराने होटल वैसे ही हैं. हालांकि समोसा और दही जलेबी का स्वाद बेहतरीन है.

राम की पैड़ी का काम राजीव गांधी के कार्यकाल में हुआ था. तबसे वहां का हाल वैसा ही है. कांग्रेस शासन में ही अयोध्या के सौन्दर्यीकरण का काम हुआ है. हालांकि उसके बाद से ही सब वैसे ही है. सरयू पर पुराने पुल की रेलिंग कई जगह से टूटी है.

ठहरने का हाल:

अयोध्या में धार्मिक पर्यटन के नाम पर कई लाख लोग यहां आते हैं. लेकिन ठहरने की कोई भी उचित व्यवस्था नहीं है. यात्री या तो फैज़ाबाद में ठहरने की जगह तलाश करें या धर्मशालाओं में रहें. उसमें सिर्फ बिड़ला धर्मशाला ही ठीक ठाक है. हालांकि वो भी इतना बड़ा नहीं है कि मेले के समय ज्यादा लोगों को ठहराया जा सके. बाहर से आए पर्यटकों को जगह तलाश करने में काफी मुश्किल होती है. यूपी पर्यटन का पथिक निवास साकेत है. लेकिन ऐसे मौकों पर बाहर से आए प्रशासनिक अधिकारियों के मेहमाननवाज़ी में व्यस्त रहता है.

जीण शीर्ण मंदिर की बहुतायत:

राम मंदिर का मामला गरम है. राजनीति भी खूब हो रही है. लेकिन अयोध्या में छोटे कई मंदिर दिखाई दिए हैं, जिनकी हालत काफी जर्जर है. राम की पैड़ी के किनारे कई मंदिर काफी पुराने और खंडहर हैं. लेकिन इनकी रंगाई पुताई कर दी गई है. इस कारण दूर से तो नज़ारा अच्छा दिखाई देता है, लेकिन हकीकत पास जाकर ही पता चलती है.

अयोध्या का कब होगा कायापलट:

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योगी सरकार को बने दो साल होने वाले हैं. चुनाव प्रचार के लिए श्मशान की बात खूब हुई है. लेकिन अयोध्या में श्मशान घाट तक पहुंचने के लिए रास्ता कच्चा है. राजनीति में जुमलेबाज़ी का नज़ारा है. इस तरह जहां जहां पानी की टंकियां हैं उनकी चारदीवारी का रखरखाव सही नहीं है. इस कारण यह मवेशियों का अड्डा बन गई हैं. शहर के भीतर भी खुली नालियां बजबजा रहीं हैं. गलियों में कहीं सड़कें ठीक हैं, तो कहीं खराब हैं.

अयोध्या विकास प्राधिकरण काफी पहले बना है. अयोध्या को नगर निगम का दर्जा भी मिला है. लेकिन मेयर के दफ्तर के बाहर स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. हालांकि दीपोत्सव के दौरान सरकार की तरफ से कई ऐलान किए गए हैं.

योगी का ऐलान:

मुख्यमंत्री ने कई विकास परियोजनाओॆ की शुरूआत की है. जिसमें कई पहल अच्छे हैं. जैसे राजा दशरथ के नाम से मेडिकल कॉलेज. अभी तक मेडिकल के लिए यहां के आस पास के लोगों को लखनऊ जाना पड़ता था. कई ज़िलों खासकर अंबेडकर नगर, गोंडा, बलरामपुर के लोगों को फायदा होगा. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से शहर का गंदा पानी सीधे नदी में नहीं जाएगा. क्योंकि सरयू नदी पानी का स्रोत है और आस्था का भी विषय है. अगर श्मशान गृह भी नदी के किनारे से हटाते तो नदी को प्रदूषण से बचाया जा सकता है. बरसात में सरयू मे पानी ऊफान पर रहता है, आसपास के गांव पानी में डूब जाते हैं. इसका उपाय करना चाहिए.

एयरपोर्ट बन जाने से आवागमन की सुविधा बढ़ेगी. लेकिन यह सिर्फ पैसे वालों के काम की है. रेलवे स्टेशन का कायाकल्प होता तो आम आदमी को फायदा होता. वहीं रैनबसेरे भी बनते तो गरीब पर्यटक को रहने के लिए भटकना नहीं पड़ेगा.

राजनीति और अयोध्या:

अयोध्या का ताला खुलने के बाद से ही राम मंदिर का मामला लाइमलाईट में आया था. राजीव गांधी ने विवादित जगह से कुछ दूर शिलान्यास कराकर इसका सियासी फायदा उठाने की कोशिश की थी.

इस पूरे मुद्दे को बीजेपी ने हाईजैक कर लिया. 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी ने सोमनाथ से अयोध्या की रथ यात्रा निकाली. जिसके बाद से बीजेपी सेंटर स्टेज पर आ गई. आडवाणी की यात्रा बिहार में रोक दी गई. बीजेपी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था जिससे वीपी सिंह सरकार गिर गई.

babri masjid

1991 में विवादित परिसर में कारसेवकों ने जबरन घुसने की कोशिश की. तत्कालीन मुलायम सिंह सरकार ने रोकने के लिए गोली चलवाई. इसमें कई लोगों की मौत हो गई थी. इसके बाद हुए चुनाव में कल्याण सिंह की सरकार बन गई.

1992 में कारसेवा के दौरान 6 दिसंबर को विवादित बाबरी मस्जिद को ढहा दिया गया. जिसके बाद से बीजेपी का राजनीतिक वजूद बढ़ता गया. केन्द्र में 1996 में 13 दिन की सरकार बनी. 1998 में तेरह महीने की सरकार बनी थी. 1999 से 2004 तक सरकार रही. 2014 से पूर्ण बहुमत की सरकार है. इस बीच यूपी में कल्याण सिंह की सरकार रही. राम प्रकाश गुप्ता की सरकार थी. राजनाथ सिंह भी सीएम रहे. अब 2017 से फिर बीजेपी की सरकार है.

अयोध्या जैसी थी वैसी ही है. कुछ बदला नहीं है. चुनाव से पहले फिर अयोध्या लाइमलाइट में है. उम्मीद है अगली बार अयोध्या आएं तो कुछ बदलाव नज़र आए.

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