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जया के बाद क्या होगा तमिलनाडु का सियासी भविष्य?

जयललिता के निधन के बाद अब राज्य के राजनीतिक भविष्य की ओर सभी की निगाहें हैं

Updated On: Dec 07, 2016 11:45 AM IST

Amitesh Amitesh

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जया के बाद क्या होगा तमिलनाडु का सियासी भविष्य?

जे जयललिता अब इस दुनिया में नहीं रहीं. लेकिन, उनके जाने के बाद का खालीपन न केवल उनके चाहने वालों के लिए परेशान करने वाला है, बल्कि यह दूसरे सियासी दलों के लिए भी खालीपन का एहसास कराने वाला है.

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहते हुए जयललिता के मौजूदा केन्द्र सरकार के साथ रिश्ते बेहतर थे. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ भी उनके संबंध बेहतर रहे हैं. मौजूदा दौर में जब विपक्षी दलों की तरफ से सरकार को हर मोर्चे पर लगातार घेरा जा रहा था, तब कई मौकों पर सरकार को जया का साथ मिला था.

लेकिन हाल ही में जीएसटी को लेकर केन्द्र के साथ राज्य की तल्खी देखने को मिली थी. ऐसे में अब जयललिता के बाद के दौर में केन्द्र और राज्य के रिश्तों को लेकर अटकलें लगने लगी हैं.

कैसे होंगे उत्तराधिकारी ओ पन्नीरसेल्वम के केंद्र से रिश्ते?

अब उनके नहीं रहने के बाद उनके उत्तराधिकारी ओ पन्नीरसेल्वम के केन्द्र के साथ रिश्ते कैसे होंगे, यह जानने की उत्सुकता बढ़ जाती है.

एआईएडीएमके सरकार के मुखिया बने पन्नीरसेल्वम के लिए भी मौजूदा दौर में केन्द्र के साथ बेहतर रिश्ते की जरूरत होगी.

दूसरी तरफ केन्द्र सरकार के लिए एक ऐसे राज्य सरकार से बेहतर रिश्ते की जरुरत भी होगी, जहां खुद बीजेपी का कोई खास जनाधार नहीं है.

Jayalalitha-Panneer-Selvam

एआईएडीएमके के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में 13 सांसद

एआईएडीएमके के लोकसभा में 37 और राज्यसभा में 13 सांसद हैं. केन्द्र में इन 50 सासदों की सबसे ज्यादा जरुरत सरकार को होगी.

बीजेपी और केन्द्र सरकार की भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर लगातार बनी रही. तमिलनाडु बीजेपी के प्रभारी महासचिव मुरलीधर राव ने फ़र्स्टपोस्ट के साथ बातचीत में कहा, 'हमारी कोशिश होगी राज्य सरकार के साथ बेहतर संबंध की. हमारे संबंध एआईएडीएमके के साथ पहले भी बेहतर रहे हैं.'

अस्थिरता का सीधा फायदा विरोधियों को मिलेगा

बीजेपी और केन्द्र सरकार के पास फिलहाल दूसरा विकल्प भी नहीं है. पार्टी को यह अंदेशा है कि अगर तमिलनाडु में अस्थिरता आती है तो इसका सीधा फायदा विरोधियों को मिलेगा. खासतौर से डीएमके और कांग्रेस को एक बार फिर से अपना पांव जमाने में मदद मिल सकती है.

लिहाजा पूरे घटनाक्रम को सावधानी से देखा जा रहा है. इसी का नतीजा है कि पहले जयललिता के बीमार रहते ओ पन्नीरसेल्वम मुख्यमंत्री की जिम्मेारियां निभा रहे थे और अब जयललिता के निधन के बाद पन्नीरसेल्वम के हाथों में प्रदेश की कमान आ गई है, जिससे फिलहाल किसी भी तरह की राजनीतिक अस्थिरता के पनपने का अंदेशा खत्म हो गया है.

अगर एआईएडीएमके के भीतर जयललिता के उत्तराधिकार को लेकर कोई जंग शुरू नहीं हुई तो फिर कुछ खास परेशानी नहीं होगी, और अगर ऐसा है तो केन्द्र सरकार के लिए परेशानी खड़ी हो सकती है.

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