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कैशलेस अर्थव्यवस्था का क्या होगा भविष्य?

यह बात उभर कर सामने आ रही है कि नोटबंदी भारत को कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है.

Updated On: Nov 28, 2016 05:30 PM IST

Rohit Prakash

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कैशलेस अर्थव्यवस्था का क्या होगा भविष्य?

8 नवंबर को हिन्दुस्तान की लीडरशिप ने जब नोटबंदी का फैसला लिया होगा, तब शायद उसके लिए यह कल्पना करना मुश्किल रहा होगा कि आने वाले वक्त में इस नीति को लेकर कितने तरह के उतार-चढ़ाव देखने को मिलेंगे. पिछले बीस दिनों में इस फैसले को लेकर सरकार के मन में जो संशय दिखता है उसकी वजह शायद यही है.

नोटबंदी को लेकर तस्वीर साफ नहीं

यह बात किसी से छिपी नहीं है कि सरकार ने लगभग हर रोज नियमों में तब्दीली कर अपनी तैयारी की कमियों को जाहिर किया है. हालांकि इस बात में भी कोई शक नहीं कि विपक्ष और जनता के भीतर भी इसी किस्म का भ्रम रहा है और किसी के दिमाग में इसे लेकर कोई साफ समझ नहीं थी कि इस फैसले का असर कितने बड़े पैमाने पर होगा.

खैर, जनता की बेहाली और विपक्ष की तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार मजबूती से अपने निर्णय का बचाव कर रही है और उसका पालन करने की दिशा में आगे बढ़ रही है, तो सवाल यह उठता है कि काले धन को खत्म करने के नारे के अलावा नोटबंदी के तात्कालिक और दीर्घकालिक उद्देश्य क्या हैं?

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कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में  बड़ा कदम?

यह बात सबसे ज्यादा देश और दुनिया में उभर कर सामने आ रही है कि नोटबंदी भारत को कैशलेस अर्थव्यवस्था बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है. प्रधानमंत्री ने अपनी ‘मन की बात’ में भी अपनी इस इच्छा को जताया है. लेकिन नोटबंदी के समर्थकों और आलोचकों दोनों के मन में यह सवाल है कि क्या भारत कैशलेस अर्थव्यवस्था के लिए तैयार है?

ग्रामीण, अशिक्षित और बैंक अकाउंट्स व स्मार्टफोन के बगैर एक बहुत बड़ी आबादी इस देश में रहती है जिसके लिए इस नई व्यवस्था से जूझना काफी मुश्किल होगा. हालांकि कैशलेस अर्थव्यवस्था के प्रस्ताव की प्रतिक्रिया में कई तरह की राय सामने आई है, जिसमें कुछ सकारात्मक और तसल्ली देने वाली हैं, तो कुछ बिल्कुल धुंधले भविष्य का दृश्य खींचती हैं.

ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास होने चाहिए स्मार्टफोन

24 नवंबर, 2016 को द इकॉनामिक टाइम्स में प्रकाशित एक खबर के हवाले से कहा गया कि चीन की मीडिया भारत की इस कोशिश को सही मानती है और उसका यह भी कहना है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों के पास अगर स्मार्टफोन हों, तो यह पहलकदमी सफल हो सकती है. उनका आकलन है कि भारत स्मार्टफोन की बिक्री के लिए सबसे संभावनाशील बाजार है. इस संदर्भ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चीन की ही ज्यादातर कंपनियां स्मार्टफोन के निर्माण में शामिल हैं.

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बड़े शहरों तक सिमटा है

बीबीसी में 25 नवंबर, 2016 को छपी समीर हाशमी की रिपोर्ट एक निराशाजनक तस्वीर पेश करती है. हालांकि उन्होंने इस बात को नोट किया है कि पेटीएम के साथ-साथ फ्रीचार्ज और मोबिक्वीक जैसी मोबाइल पेमेंट कंपनियों के कारोबार में बहुत बड़ा इजाफा आया है, लेकिन अपने फील्ड रिपोर्ट में उनका यह भी अनुभव था कि यह बड़े शहरों तक सिमटा है और छोटे शहरों में अभी भी इस नए तरीके को लेकर कारोबारी उत्साहित नहीं हैं.

इस मसले पर बिजनेस स्टैंडर्ड द्वारा कराए सर्वे के मुताबिक 60 फीसदी लोग यह मानते हैं कि भारत नगद आधारित अर्थव्यवस्था से मुक्त होने के लिए अभी तैयार नहीं है.

'धन को ही खत्म कर दिया जाए'

आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ मिहिर शर्मा कैशलेस अर्थव्यवस्था को कर चोरी करने वालों पर बड़ा हमला मानते हैं. 20 जुलाई, 2016 को ब्लूमबर्ग पर प्रकाशित उनके लेख में साफतौर पर कहा गया है कि, ‘नगदी का जितना कम से कम लेन-देन के लिए इस्तेमाल होगा, एजेंसियों के लिए टैक्स चोरी करने वालों को पकड़ना उतना ही आसान होगा. काले धन से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका है कि धन को ही खत्म कर दिया जाए’.

उस वक्त उनका अनुमान था कि भारत में दूसरे देशों की तुलना में कैशलेस अर्थव्यवस्था को ज्यादा तेजी से लागू किया जा सकता है.

हावर्ड विश्वविद्यालय के अर्थशास्त्री केनेथ रोगॉफ की स्थापना है कि कैशलेस अर्थव्यवस्था में लोग अपनी बचत को बिस्तर के गद्दे के नीचे नहीं, बल्कि बैंक में रखेंगे. लेकिन यह अभी देखना बाकी है कि जिस देश में लोगों के पास घर, शिक्षा और रोजगार नहीं है वे अपने काम चलाने भर के थोड़े से पैसे प्लास्टिक कार्डस और ई-मनी में कैसे संभालेंगे?

 

 

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