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कई राज्यों में फंसा है 'लाभ का पद' मामला, कोर्ट में लटके पड़े हैं केस

दिल्ली की इस घटना के बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. मसलन, क्या दिल्ली ही अकेला प्रदेश है जहां लाभ का पद मामला इतना तूल पकड़ता दिख रहा है? क्या अन्य राज्यों में भी होते हैं संसदीय सचिव जैसा कि दिल्ली में देखने को मिला?

Updated On: Jan 20, 2018 03:46 PM IST

Ravi kant Singh

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कई राज्यों में फंसा है 'लाभ का पद' मामला, कोर्ट में लटके पड़े हैं केस

चुनाव आयोग ने आम आदमी पार्टी (आप) के 21 विधायकों को अयोग्य करार देने के लिए राष्ट्रपति के पास सिफारिश भेज दी है. साल 2015 में केजरीवाल की दिल्ली सरकार ने एक आदेश पारित कर अपने 21 विधायकों को सात मंत्रालयों में सचिव बनाया था. इस आदेश को चुनौती देते हुए वकील प्रशांत पटेल तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास शिकायत लेकर गए थे. पटेल ने विधायकों पर आरोप लगाया था कि इन्होंने लाभ का पद हासिल किया है, इसलिए इन्हें अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए.

दिल्ली की इस घटना के बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. मसलन, क्या दिल्ली ही अकेला प्रदेश है जहां लाभ का पद मामला इतना तूल पकड़ता दिख रहा है? क्या अन्य राज्यों में भी होते हैं संसदीय सचिव जैसा कि दिल्ली में देखने को मिला है?

यहां जान लेना जरूरी है कि देश में 11 राज्य ऐसे हैं जहां संसदीय सचिव होते हैं. इन राज्यों में हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक के नाम शामिल हैं.

कोर्ट में अटके कई केस

हिमाचल प्रदेश, पश्चिम बंगाल और गोवा ऐसे राज्य हैं जहां संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती दी गई. इन राज्यों का मामला हाईकोर्ट पहुंचा जहां इन नियुक्तियों को सिरे से खारिज कर दिया गया.

इस फेहरिस्त में पंजाब और हरियाणा का भी नाम आता है जहां संसदीय सचिवों की नियुक्ति को चुनौती दी गई है. मामला फिलहाल कोर्ट में है. कई और भी राज्य हैं जहां संसदीय सचिवों को लेकर संवैधानिक संकट की स्थिति खड़ी हुई. आइए जानते हैं इन राज्यों के मामले के बारे में.

राजस्थान में 10 संसदीय सचिव

बीजेपी शासित राजस्थान में फिलहाल 10 संसदीय सचिव हैं. मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की अगुआई में चल रही यहां की सरकार ने संसदीय सचिवों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया. इतना ही नहीं, साल 2017 में राजस्थान असेंबली में बिल पास कर संसदीय सचिवों को संवैधानिक वैधता दी गई. बाद में मामले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जहां केस अभी पेंडिंग है.

ओडिशा का मामला कुछ और

ओडिशा का मामला संसदीय सचिवों जैसा तो नहीं है लेकिन लाभ के पद जैसा जरूर है. साल 2016 में ओडिशा सरकार ने 20 विधायकों को जिला योजना कमेटी (डीपीसी) का अध्यक्ष नियुक्त किया. कानून में सुधार कर सरकार ने इन अध्यक्षों को राज्य मंत्री का दर्जा दिया. डीपीसी अध्यक्षों को सुविधा के नाम पर गाड़ी और सचिवालय स्टाफ मिलते हैं, लेकिन इन्हें सैलरी नहीं मिलती.

बंगाल में बेकार पड़े संसदीय सचिव पद

शुक्रवार को जैसे ही आम आदमी पार्टी का फैसला आया, सबसे पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केजरीवाल सरकार का पक्ष लेते हुए चुनाव आयोग के कदम को अनुचित बताया. ममता बनर्जी ने यहां तक कह डाला कि किसी संवैधानिक संस्था को बदले की भावना से काम नहीं करना चाहिए. उन्होंने कहा, चुनाव आयोग ने आप के 20 विधायकों की बात नहीं सुनी, यह काफी दुर्भाग्य की बात है. यह न्यायिक कायदे-कानूनों के खिलाफ है.

बंगाल में भी संसदीय सचिवों का मामला कुछ-कुछ दिल्ली की तरह है. दिल्ली सरकार से एक कदम आगे बढ़ते हुए ममता सरकार ने बंगाल में 24 संसदीय सचिव चुने. सचिवों के जिम्मे काम यह रहा कि वो 'सरकारी विभागों के बीच तालमेल' कायम करेंगे. हालांकि कोलकाता हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक माना. मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है और संसदीय सचिवों के पद बेकार पड़े हैं.

कर्नाटक का अलग ही तर्क

कर्नाटक सरकार ने भी संसदीय सचिव नियुक्त किए हैं, लेकिन एक चौंकाऊ दलील के साथ. यहां 11 एमएलए और एमएलसी को संसदीय सचिव बनाया गया, यह कहते हुए कि संसदीय सचिव राज्य मंत्री का दर्जा तो नहीं लेंगे लेकिन मंत्रियों के सहयोगी जरूर होंगे. यह मामला भी फिलहाल हाईकोर्ट में पेंडिंग है.

तेलंगाना ने दिया कैबिनेट स्टेटस

तेलंगाना में टीआरएस की सरकार है जहां के. चंद्रशेखर राव मुख्यमंत्री हैं. मामला 2014 का है जब यहां की सरकार ने अपने 6 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया और एक कानून पारित कर इन्हें कैबिनेट का दर्जा दिया. हालांकि 2016 में हैदराबाद हाईकोर्ट ने इन नियुक्तियों को पलट दिया.

नॉर्थ-ईस्ट में मची रही उथल-पुथल

संसदीय सचिव के मामले में नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश का नाम कुछ खास है. आबादी के लिहाज से काफी छोटे इन राज्यों ने भी बढ़चढ़ कर सचिव बनाए. इन दोनों राज्यों ने 26-26 संसदीय सचिव नियुक्त किए. लेकिन असम के एक मामले से सचिवों की नियुक्ति पर पानी फिर गया. साल 2004 में सुप्रीम कोर्ट ने असम में नियुक्त संसदीय सचिवों को असंवैधानिक माना जिसके बाद अन्य नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों को अपने सचिव पद हटाने पड़े.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मणिपुर में 11 और मिजोरम में 7 संसदीय सचिवों ने इस्तीफा दिया. मेघालय हाईकोर्ट ने भी वहां के संसदीय सचिव कानून को अवैध माना, जिसके बाद 17 सचिवों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

पंजाब और हरियाणा भी भुगत चुके हैं खामियाजा

जुलाई 2017 में पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने चार संसदीय सचिवों की नियुक्ति को खारिज कर दिया. इसी आधार पर एसएडी-बीजेपी सरकार की ओर से चुने गए 18 संसदीय सचिवों की नियुक्ति भी हाईकोर्ट ने निरस्त कर दिया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले को सही माना.

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