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पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव: TMC के खिलाफ एक हो रही हैं बीजेपी, कांग्रेस और लेफ्ट!

आसार हैं कि पश्चिम बंगाल में पंचायत स्तर की 42000 सीटों पर बीजेपी, कांग्रेस तथा वामपंथी दल तृणमूल कांग्रेस की ताकत के खिलाफ आपस में हाथ मिला लेंगे

Updated On: Apr 10, 2018 02:22 PM IST

Sreemoy Talukdar

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पश्चिम बंगाल पंचायत चुनाव: TMC के खिलाफ एक हो रही हैं बीजेपी, कांग्रेस और लेफ्ट!

तकरीबन नामुमकिन जान पड़ने वाला एक गठबंधन पश्चिम बंगाल में शक्ल अख्तियार करने जा रहा है लेकिन क्या कीजिएगा उस तथाकथित ‘राष्ट्रीय मीडिया’ का जिसे राहुल गांधी के ट्विटर फीड, कांग्रेस के ‘उपवास’ और राष्ट्रीय महत्व के कुछ ऐसे ही मुद्दों की फिक्र में कुछ यों सता रही है कि उसे पश्चिम बंगाल में बहती इस बयार का अता-पता ही नहीं. दमन पर तुले एक शासन की जानी-पहचानी हिंसा और कानून-व्यवस्था की सरेआम उड़ती धज्जियों के मंजर वाले पश्चिम बंगाल में अगले महीने पंचायत के चुनाव होने वाले हैं और इन चुनावों से पहले सियासी समीकरण ‘असंभव’ के अपने मुकाम से ‘संभव’ के ठीये पर पहुंचते दिखायी दे रहे हैं.

आसार इसी बात के लग रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में पंचायत स्तर की 42000 सीटों पर बीजेपी, कांग्रेस तथा वामपंथी दल विचारधाराओं के अपने भेद और सियासी फर्क भुलाकर सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस की ताकत के खिलाफ आपस में हाथ मिला लेंगे. यह तकरीबन कुछ वैसा ही है जैसे दक्षिणी ध्रुव और उत्तरी ध्रुव का एक साथ होना: भूगोल की दुनिया में जो असंभव है, सियासत के संसार में उसी की बराबरी में जान पड़ता एक वाकया!

बीजेपी की मौजूदगी ने किया उलटफेर

कांग्रेस और वाम धड़े ने साल 2016 में बेशक एक गठबंधन बनाया था और दोनों के बीच अनौपचारिक तौर पर ऐसा एका अब भी कायम है भले ही इसे दोनों सार्वजनिक रुप से स्वीकार ना करें. सो अगर इन दोनों पार्टियों ने मई महीने मे होने जा रहे पंचायत चुनावों के लिए एकजुट होकर अपनी चुनावी मशीनरी फिर से खड़ी की होती तो इसे लेकर नाक-भौंह सिकोड़ने वाले लोगों की तादाद ज्यादा नहीं होती. लेकिन इस बात का क्या कीजिएगा कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में बड़ी तेजी से विपक्ष की राजनीति की धुरी बनती जा रही है और बीजेपी की इसी मौजूदगी ने सूबे में सभी सियासी समीकरणों में उलट-फेर कर दिया है.

मीडिया की खबरों के मुताबिक सूबे में बीजेपी के नेता सायंतन बसु ने सीपीएम के सांसद बसुदेब आचार्य से भेंट की है. बसुदेव आचार्य पुरुलिया के एक अस्पताल की आईसीयू में फिलहाल स्वास्थ्य-लाभ कर रहे हैं. कहा जा रहा है तृणमूल के गुंडों ने उनपर हमला किया था. उम्र के सांतवें दशक में पहुंच चुके बसुदेव आचार्य 1, 3 तथा 5 मई के दिन होने वाले पंचायत चुनावों के लिए अपने नामांकन का परचा दाखिल करने जा रहे थे. सोमवार (9अप्रैल) नामांकन का परचा दाखिल करने का आखिरी दिन था. चुनावों के नतीजे 8 मई के दिन आयेंगे.

नौ दफे सांसद रह चुके सीपीएम की केंद्रीय समिति के इस नेता पर शुक्रवार को पुरुलिया जिले के काशीपुर इलाके में हमला हुआ. माना जा रहा है कि हमला तृणमूल कांग्रेस के स्थानीय विधायक स्वप्न बेलथरिया की शह पर हुआ. हमलावर विपक्ष के नेताओं को नामांकन का परचा दाखिल करने से रोकने के लिए काशीपुर प्रखंड के बाहर घात लगाए बैठे थे. डीएनए की रिपोर्ट में सीपीएम को यह कहते हुए दर्ज किया गया है कि तृणमूल के लोग वामदल के कार्यकर्ताओं के साथ लड़ाई-भिड़ाई पर उतारू थे लेकिन वहां मौजूद पुलिस मूकदर्शक बनी हुई थी.

पहले वजूद फिर विचारधारा

बीजेपी के नेता के बसुदेब आचार्य से भेंट के कुछ घंटों बाद सूबे में सीपीएम के एक नेता ने संकेत दिया कि सियासी समीकरण बदल चुके हैं. इस नेता ने पायनियर के सौगर सेनगुप्ता को बताया कि, 'मुझे पता नहीं कि पार्टी के कार्यकर्ता एक साथ होंगे या नहीं लेकिन अगर लोग एकजुट हो रहे हैं तो हमें लोगों की यह मर्जी मानकर चलनी चाहिए.' इस रिपोर्ट के मुताबिक जलपाईगुड़ी जैसे जिलों में बीजेपी, सीपीएम तथा कांग्रेस के बीच जमीनी स्तर पर एक सहमति बड़ी तेजी से शक्ल अख्तियार कर रही है.

Mamata Banerjee

सीपीएम की एक शाखा के सदस्य ने अखबार को बताया कि 'पहले हम अपने वजूद को बचायेंगे फिर विचारधारा की फिक्र करेंगे. हम एक उम्मीदवार हटाने के बदले एक उम्मीदवार हटाने की नीति पर चल रहे हैं. जिन इलाकों में बीजेपी मजबूत ताकत बनकर उभरी है वहां हम उनके लिए सीट छोड़ रहे हैं और जहां कांग्रेस तथा वामधड़ा मजबूत है वहां वे अपने लोगों का नामांकन कर रहे हैं.'

सूबाई सियासत और राष्ट्रीय राजनीति में बेमेल की यह स्थिति कोई अनजानी नहीं है. कांग्रेस तथा बीजेपी सरीखे राष्ट्रीय दलों की प्रांतीय इकाइयां कभी-कभी स्थानीय स्तर पर जो रुख अपनाती हैं वह राष्ट्रीय स्तर पर इन पार्टियों के रुख से मेल नहीं खाता. मिसाल के लिए बीजेपी ने इस बात को लेकर बहुत ध्यान रखा कि गोमांस पर प्रतिबंध को लेकर उसके रुख का असर पूर्वोत्तर में पार्टी की चुनावी संभावनाओं पर ना पड़े. राहुल गाधी का जोर इस बात पर रहा कि वे जनेऊधारी हिन्दू हैं लेकिन इसके बावजूद उनकी पार्टी कर्नाटक में हिन्दू-धर्म से अलग एक नया धर्म बनाने पर तुली है.

अभिषेक मनु सिंघवी और तृणमूल कांग्रेस का 'साथ'

एक और उदाहरण लीजिए. एक खबर के मुताबिक कांग्रेस की बंगाल इकाई के प्रमुख अधीर रंजन चौधरी इस बात से बौखलाए हुए हैं कि पार्टी के वरिष्ठ नेता अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में तृणमूल कांग्रेस की पैरवी कर रहे हैं. राज्यसभा के लिए अभिषेक मनु सिंघवी के निर्वाचन में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मदद दी थी. विडंबना देखिए कि अदालत में मामला कांग्रेस ने ही दायर किया था कि पंचायत चुनावों के लिए सूबे की सरकार केंद्रीय बलों की तैनाती चाहती है जबकि कांग्रेस इसके खिलाफ है. शायद आप इन तथ्यों से असमंजस में पड़ सकते हैं. दरअसल, सूबे में कांग्रेस के कार्यकर्ता भी बड़े असमंजस में हैं.

अधीर रंजन चौधरी सुप्रीम कोर्ट में अपने मामले में पैरवी खुद ही कर रहे हैं. उन्होंने न्यूज18 के सुजीत नाथ को बताया कि ‘तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर निशाना साध रहे हैं और पूरे सूबे में उन्हें नामांकन का परचा दाखिल करने से रोक रहे हैं. दूसरी तरफ मेरी पार्टी के सांसद अभिषेक मनु सिंघवी सुप्रीम कोर्ट में तृणमूल की तरफ से पैरवी करते हुए पश्चिम बंगाल सरकार की मदद कर रहे हैं. हम सब जानते हैं कि राज्यसभा के लिए सिंघवी का निर्वाचन पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस की मदद से हुआ लेकिन पश्चिम बंगाल कांग्रेस समिति के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों के बीच इस बात को लेकर बहुत रोष है. मेरे कार्यकर्ता पूछ रहे हैं कि सिंघवी ऐसा क्यों कर रहे हैं और मुझे कोई जवाब नहीं सूझ रहा, सो मैं पसोपेश में हूं.’

कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व ममता बनर्जी को नाराज करने का खतरा नहीं मोल ले सकता और अधीर रंजन चौधरी राष्ट्रीय स्तर पर चल रही गलबहियों की इस राजनीति की चपेट में आ गए हैं. बहरहाल, ऐसे विरोध की वास्तविक सियासी अहमियत बहुत कम है.

ममता के ही फॉर्मूले का लिया जा रहा है सहारा

ऐसा नहीं है कि नए किस्म का गठबंधन सिर्फ पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों के लिए बनने जा रहा है. पायनियर की खबर में कहा गया है कि इस गठबंधन में उसी फॉर्मूले का सहारा लिया जा रहा है जिसे ममता बनर्जी ने हाल में दिल्ली में विपक्षी दलों के नेताओं से हुई अपनी मुलाकात में बीजेपी को 2019 में हराने के लिए गढ़ा था. यह एक इलाके में किसी पार्टी के अपना उम्मीदवार ना खड़े करने के बदले दूसरे इलाके में किसी पार्टी का अपना उम्मीदवार ना खड़ा करने का फार्मूला है. सियासी दुनिया में यह लगभग भूकंप पैदा करने जैसा बदलाव है और ऐसे बदलाव बगैर गहरी प्रेरणा के नहीं आते. इसमें कोई शक नहीं कि पश्चिम बंगाल में अभी माहौल ऐसा हो चला है कि विपक्षी दलों को उसमें अपने उम्मीदवार के नामांकन का परचा तक दाखिल करने में मुश्किल पेश आ रही है.

‘मुक्त और निष्पक्ष’ चुनाव की धारणा पश्चिम बंगाल के लिए एक जमाने से अजनबी साबित हो रही है. वामधड़े की सरकार ने अपने तीन दशक के शासन में सूबे की मशीनरी का दुरुपयोग किया, चुनावों में साइंटिफिक रीगिंग का तरीका अपनाया, चुनावी हिंसा की चाल चली और तृणमूल कांग्रेस विरासत में मिली इन बातों को और ज्यादा रफ्तार दे रही है, उसपर नयी ताकत से अमल कर रही है.

Mamta

ममता बनर्जी

चुनाव और हिंसा एक-दूसरे के पर्याय बन चले हैं. नामांकन के परचे दाखिल करने के दिनों में लगातार हिंसा चलती है और लोगों की जान जाती है. विपक्षी दल कुछ जगहों पर इसे टक्कर दे रहे हैं लेकिन तृणमूल कांग्रेस का दबदबा हर तरफ है और इसकी बड़ी वजह ये है कि कानून-व्यवस्था की पूरी मशीनरी तृणमूल कांग्रेस की शाखा बनकर काम कर रही है.

संदीपन देब ने 2015 में लाइवमिन्ट के अपने लेख में कहा था: 'अपने चार साल के शासन में ममता बनर्जी ने कोलकाता पुलिस के पंख कतर डाले हैं. बहुत से ईमानदार पुलिस अधिकारियों को किनारे करते हुए कम महत्व के पदों पर रखा गया है और कानून-व्यवस्था की हालत संभालने से उनका कुछ खास लेना-देना नहीं रह गया. कोलकाता पुलिस अब तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं को रिपोर्ट करती है.'

तृणमूल पर भयानक हिंसा फैलाने का है आरोप

पश्चिम बंगाल में हिंसा का चक्र जारी है. बीरभूम जिले में सीपीएम के पूर्व सांसद रामचंद्र डोम घायल हो गये. नलहटी के बीडीओ (प्रखंड विकास अधिकारी) की ऑफिस पर बहुत से देसी बम फेंके गये. इस वक्त विपक्षी बीजेपी और सीपीएम के उम्मीदवार अपने नामांकन का परचा दाखिल करने आये थे. रामचंद्र डोम बमबाजी की इसी घटना में घायल हुए. माना जा रहा है कि मुर्शिदाबाद में कांग्रेस के एक कार्यकर्ता पर तृणमूल कांग्रेस के गुंडों ने हमला किया. हमले की यह खबर इंडिया टुडे में छपी है.

हमले की एक घटना बांकुड़ा में हुई है. यहां सीपीएम के विधायक तथा सूबे के सदन में वाममोर्चे के नेता सुजन चक्रवर्ती पर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने हमला किया. सुजन चक्रवर्ती ने द हिन्दू से कहा है कि 'मैं वाममोर्चा के उम्मीदवारों की रैली में शिरकत कर रहा था. वे नामांकन का परचा दाखिल करने जा रहे थे. इसी दौरान पुलिस की मिलीभगत से तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने हमला किया. उन लोगों ने मुझे भी मारा.' द हिन्दू की इसी खबर में यह भी कहा गया है कि मुर्शिदाबाद में कांग्रेस की एक रैली पर भी तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने हमला किया. इस रैली की अगुवाई कांग्रेस की प्रांतीय इकाई के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी कर रहे थे.

बीजेपी और कांग्रेस के कार्यकर्ता हुए हैं शिकार

बुधवार के रोज बांकुड़ा में एक बीजेपी कार्यकर्ता की मौत हुई. माना जा रहा है कि बीजेपी के इस कार्यकर्ता पर तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने हमला किया था और उसे बहुत से घाव लगे थे. बीजेपी के एक स्थानीय नेता अभिजीत मंडल ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि मृतक (बीजेपी कार्यकर्ता) अजीत मूर्मू (उम्र 35 साल) अपने नामांकन का परचा दाखिल करने रानीबंध के बीडीओ ऑफिस गया था. अभिजीत मंडल का दावा है कि तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने मूर्मू पर धारदार हथियार से हमला किया और उसपर देसी बम फेंके.

सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो में दिख रहा है कि कुछ नकाबपोश बीजेपी के एक नेता पर हमला कर रहे हैं और उसकी गाड़ी के साथ तोड़फोड़ कर रहे हैं. फाइनेन्शियल एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक जिस नेता पर वीडियो में हमला होता दिख रहा है वे बीजेपी की प्रांतीय इकाई के सचिव श्यामपद मंडल हैं. उन्हें बांकुड़ा में तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने कार से खींच निकाला गया और उनपर हमला किया. सत्ताधारी दल ने इस आरोप से इनकार किया है.

सोमवार के दिन स्थानीय टीवी चैनल एबीपी आनंद ने खबर दी कि बरुईपुर में तृणमूल कांग्रेस के लोगों ने बीजेपी उम्मीदवार की बेटी की दिन दहाड़े पिटाई की. बीजेपी का यह उम्मीदवार अपने नामांकन का परचा दाखिल करने जा रहा था. हिंसा सिर्फ जिलों तक सीमित नहीं हैं. अभी सोमवार को ही कोलकाता के व्यस्त दमदम जंक्शन के पास एक विस्फोट हुआ और पुलिस ने 29 देसी बम बरामद किए.

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक शनिवार की सुबह तृणमूल के हथियारबंद लोग ट्रकों पर सवार होकर अलीपुर प्रशासनिक परिसर (अलीपुर एडमिनिस्ट्रेटिव कांप्लेक्स) पहुंचे और यहां उतरते ही इन हथियारबंद लोगों ने विपक्षी दल के उम्मीदवारों का पीछा करना शुरू कर दिया. पुलिस इस पूरे मामले को हाथ पर हाथ धरे देखती रही. अगले लगभग आधे घंटे तक सत्ताधारी पार्टी के हमलावरों ने अलीपुर रोड पर कब्जा जमाए रखा. इन लोगों ने मीडियाकर्मियों को भी नहीं बख्शा. कहा गया कि आप अपने कैमरे और मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं कर सकते.

सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरे मामले से किनारा कर लिया है और कानून-व्यवस्था की मशीनरी अपना कर्तव्य निभाने में नाकाम साबित हो रही है. ऐसे में विपक्षी दल के उम्मीदवार पश्चिम बंगाल में बेचारे की हालत में आ गए हैं. राष्ट्रीय मीडिया इस पूरे मामले पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही, सो हालात और भी संगीन होते जा रहे हैं. बंगाल की राजनीति में भारी हेर-फेर करने वाले संभावित गठबंधन को हमें इसी पृष्ठभूमि में देखना होगा. हां, यह देखने वाली बात होगी कि गठबंधन की संभावना जमीन पर साकार हो पाती है या नहीं.

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