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यूपी में मोदी ही होंगे बीजेपी का चेहरा: वीरेंद्र सिंह मस्त

भदोही से बीजेपी के लोकसभा सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त से फर्स्टपोस्ट की बातचीत

Updated On: Dec 27, 2016 08:31 AM IST

Amitesh Amitesh

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यूपी में मोदी ही होंगे बीजेपी का चेहरा: वीरेंद्र सिंह मस्त

यूपी में विधानसभा के चुनाव होने हैं और उसके पहले भारतीय जनता पार्टी ऐसे फैसले ले रही हैं जिससे यूपी में उसकी जमीन और मजबूत बनाई जा सके. यूपी के भदोही से लोकसभा सांसद वीरेंद्र सिंह मस्त के हाथों में किसान मोर्चा की जिम्मेदारी देकर बीजेपी ने अपनी मंशा साफ कर दी है.

किसान मोर्चा की जिम्मेदारी संभालने के बाद मस्त ने राहुल गांधी समेत सभी विरोधियों पर सीधा हमला बोला और दावा किया कि इस बार भी यूपी की जनता बीजेपी को लोकसभा चुनाव की तर्ज पर छप्पड़ फाड़ कर समर्थन करेगी. उनसे बात की फ़र्स्टपोस्ट संवाददाता अमितेश ने. प्रस्तुत है उनसे बातचीत के कुछ अहम अंश....

फ़र्स्टपोस्ट: आपको नई जिम्मेदारी मिली है. किसान मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया है. कितनी बड़ी चुनौती है आपके लिए?

वीरेंद्र सिंह मस्त: पहले से ही स्वदेशी आंदोलन के कार्यकर्ता और एक सांसद होने के नाते मैं यह करता रहा हूं. हमें राष्ट्रीय अध्यक्ष जी और प्रधानमंत्री जी ने जो जिम्मेदारी दी है, उसे निभाएंगे.

फ़र्स्टपोस्ट: लोकसभा चुनाव के वक्त देशभर, खासतौर से यूपी में, किसानों ने खुलकर बीजेपी का साथ दिया था. हालांकि अब भूमि अधिग्रहण विधेयक और दूसरे कई मुद्दों को लेकर किसान पार्टी से नाराज बताए जा रहे हैं. कैसे सबको वापस लाएंगे?

वीरेंद्र सिंह मस्त: देखिए, इस तरह का भ्रम है कि किसान हमसे छिटके हैं. मैं सबको चुनौती देता हूं कि आकर हमसे चर्चा कर लें, चाहे हाथ वाला हो, हाथी वाला हो या फिर साइकिल वाला हो.

फ़र्स्टपोस्ट: राहुल गांधी आजकल यूपी में ज्यादा सक्रिय हैं. खासतौर से किसानों के लिए कर्जमाफी की मांग और उनके दर्द को लेकर सरकार पर हमलावर हैं. बीजेपी राहुल के आक्रामक अंदाज से कैसे निपटेगी?

वीरेंद्र सिंह मस्त: राहुल गांधी का विषय किसान और किसानी का नहीं है. जो आदमी धान, मक्का, जौ और बाजरा का पौधा नहीं पहचानता. जिसने किसान को किताब में पढ़ा है. अगर ऐसे व्यक्ति को आप हल पकड़ा देते हैं तो उसका फाल आसमान की तरफ कर देता है. उसका हल आसमान जोतता है. अंतर यही है कि हमारा हल जमीन जोतता है.

किसान के बारे में और कृषि के बारे में फैशन के लिए बात करना किसान की बुनियादी समस्यों का हल नहीं निकालता. आलू का पौधा कैसे होता है, कब आलू की बुआई होती है, उन्हें क्या पता. किसी ने बता दिया कि आलू का कारखाना होता है. इसीलिए संसद में भी उन्हें कहता हूं कि यह आपका विषय नहीं है. किसी दूसरे मुद्दे पर बात करो.

फ़र्स्टपोस्ट: नोटबंदी के बाद किसान परेशान हैं, लिहाजा विपक्षी दल सवाल खड़ा कर रहे हैं. कैसे दूर होगी किसानों की परेशानी?

वीरेंद्र सिंह मस्त: नोटबंदी पर किसान की परेशानी की बात करना गलत है. अगर ऐसा है तो फिर  कैसे रबी की फसल की बुआई का रकबा बढ़ गया. अगर नोटबंदी का असर होता तो ऐसा नहीं होता.

राहुल गांधी कर्जमाफी की मांग करते हैं. जब कांग्रेस की सरकार थी तो 60000 करोड़ रुपए कर्जमाफी की गई लेकिन जो किसान कर्ज चुका रहा था, उस बेचारे का कर्ज माफ नहीं किया गया. जो कर्ज नहीं चुका रहा था, उसका माफ हो गया. जो लोग इस बात को नहीं मानते कि कर्जमाफी से किसका लाभ होगा.

वर्तमान परिस्थितियों में कर्जमाफी की बात हो रही है, लेकिन उन लोगों ने कभी सोचा क्या कि किसान कर्ज देने वाला कैसे बन सके.प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो पॉलिसी बनाई है उससे 2022 तक किसान की आमदनी दोगुनी होगी. इसको लेकर हमें जिम्मेदारी दी गई है. यही योजना है.

फ़र्स्टपोस्ट: यूपी विधानसभा चुनाव के पहले आपको किसान मोर्चा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाना साफ संकेत देता है कि पार्टी का फोकस यूपी पर है. यूपी की संभावना को कैसे देखते हैं?

वीरेंद्र सिंह मस्त: यूपी देश का सबसे बड़ा प्रदेश है और यूपी का गंगा-यमुना का मैदान दुनिया का सबसे उपजाऊ इलाका है. मुझे कहने में कोई हैरानी नहीं है कि यूपी जैसा प्रदेश कृषि के मामले में पिछड़ रहा है. मध्यप्रदेश इस वक्त कृषि के मामले में काफी बड़ा मुकाम हासिल कर रहा है. शासन के माध्यम से सारी चीजों का समाधान नहीं है, लेकिन जो चीजें शासन के बिना बढ़ने वाली हैं उन्हें बढ़ाए जाने की जरूरत है. शासन और समाज मिलकर काफी आगे बढ़ सकता है.

फ़र्स्टपोस्ट: आपके किसान मोर्चा की जिम्मेदारी संभालने से पार्टी को कितना फायदा होगा?

वीरेंद्र सिंह मस्त: फायदे और नुकसान की बात नहीं है. हमारी पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हमें बुलाकर कहा कि आपको यह काम करना है तो हमने पार्टी के एक कार्यकर्ता के नाते इस काम को स्वीकार कर लिया. किसान हैं और किसानों की समस्या का निदान हम लक्ष्य निर्धारित कर करेंगे. हम यही सोचकर काम करते हैं. हम कर रहे हैं इसलिए नहीं बल्कि हम कर लेंगे यह सोच कर हम काम करते हैं.

फ़र्स्टपोस्ट: पार्टी का यूपी में चेहरा कौन होगा. कोई किसान का बेटा होगा या फिर कोई और होगा?

वीरेंद्र सिंह मस्त: पार्टी तय करेगी कि कोई किसान होगा या किसान का बेटा होगा. पार्टी जो तय करेगी उसे हम स्वीकार करेंगे.

फ़र्स्टपोस्ट: एक तरफ अखिलेश यादव हैं तो दूसरी तरफ मायावती, बिना चेहरे के पार्टी मैदान में कैसे उतरेगी?

वीरेंद्र सिंह मस्त: ये लोग क्या चेहरे वाले हैं. अखिलेश मुख्यमंत्री हैं तो उनके बारे में हमें कुछ नहीं कहना है. 15 साल से जिस मुद्दे से ये लोग चुनाव लड़ रहे हैं कि जो खजाना लूट रहे हैं तो उसे हम जेल में डाल देंगे. जब खजाना मायावती लूट रही हैं तो उन्हें हम जेल में डाल देंगे और जब दूसरे लूट रहे हैं तो मायावती उनको जेल में डालने की बात करती हैं. लेकिन क्या इन्होंने किसी को जेल में डाला? खजाना लूटने वालों को भारत के प्रधानमंत्री ने जेल की मुकाम तक पहुंचा दिया.

देश का नहीं दुनिया का सबसे बड़ा चेहरा नरेंद्र मोदी हैं, तो उत्तर प्रदेश के लिए भी वही बड़ा चेहरा हैं. वह उत्तर प्रदेश के सांसद है, उनसे बड़ा चेहरा कौन हो सकता है.

Virendra Singh Mast

फ़र्स्टपोस्ट: अगर बाद में पार्टी आपको यूपी में जिम्मेदारी देती है तो क्या आप तैयार हैं?

वीरेंद्र सिंह मस्त: हमें पार्टी की तरफ से जो जिम्मेदारी मिलेगी उसके लिए तैयार हूं और तैयार रहूंगा. पार्टी को यह फैसला करना है.

फ़र्स्टपोस्ट: मोदी मंत्रिमंडल में आपको जगह नहीं मिली थी. अब आपको संगठन में बड़ी जिम्मेदारी दी गई है. कोई कसक थी आपके मन में इस बात को लेकर?

वीरेंद्र सिंह मस्त: पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है कि किसे कौन सी जिम्मेदारी दी जाए. हम वैसे कार्यकर्ता हैं कि जो जिम्मेदारी दी गई उसे निभाने के लिए तैयार हैं. जहां तक कसक का सवाल है तो न कसक हमें थी और न ही पार्टी को कोई कसक थी. हम उत्साह से काम करने वाले लोग हूं. मैं कसक के साथ काम करने वाले लोगों में नहीं हूं.

फ़र्स्टपोस्ट: गृहमंत्री राजनाथ सिंह भी पूर्वांचल क्षेत्र से ही आते हैं, आप उनके साथ कैसे तालमेल बिठाएंगे. कहा जाता है कि राजनाथ सिंह की तुलना में पार्टी में अबतक आपको कम महत्व मिला.

वीरेंद्र सिंह मस्त: राजनाथ सिंह हमसे उम्र में दस साल बड़े हैं. जो दस साल पहले से राजनीति कर रहा है तो पार्टी जो भूमिका तय करती है वो तो स्वाभाविक है. हम तो दस साल छोटे हैं उनसे. ऐसा होना तो स्वाभाविक है.

फ़र्स्टपोस्ट: बीजेपी एसपी और बीएसपी की चुनौतियों से यूपी में कैसे निपटेंगी. पार्टी कितने सीटों का लक्ष्य और उम्मीद लेकर चल रही है?

वीरेंद्र सिंह मस्त: उम्मीद करने से सीटें नहीं तय होती. हमारे यहां लोकसभा चुनाव में लोग उम्मीद कर रहे थे, 35-45 और हो गया 73. भारत में ईश्वर पर लोग विश्वास करते हैं और कहा जाता है कि ईश्वर देते हैं तो छप्पड़ फाड़ कर देते हैं. उत्तर प्रदेश में जो परिस्थितियां बनी हैं, वह कहती हैं कि बीजेपी की सरकार बननी चाहिए. लोकतंत्र प्रयोगधर्मी व्यवस्था है और 15 साल से एक ही मुद्दे पर जो सरकार बनती आ रही है, उसने यूपी की जनता को बहुत परेशान और निराश किया. इसलिए मैं प्रामाणिकता के साथ कह सकता हूं कि लोगों के मन में नरेंद्र भाई मोदी और बीजेपी के प्रति जो भरोसा पैदा हुआ है उसके बाद कह नहीं सकते कि कितनी सीटें मिलेंगी. फिर लोकसभा की तरह छप्पड़ फाड़ के सीटें मिलेगी.

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