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कर्नाटक की जीत ने बीजेपी के पक्ष में माहौल बरकरार रखा है, असर 2019 तक रहेगा !

कर्नाटक में बीजेपी को मिली जीत खास है. खास इस मायने में है क्योंकि यह जीत 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले मिली है

Amitesh Amitesh Updated On: May 15, 2018 03:21 PM IST

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कर्नाटक की जीत ने बीजेपी के पक्ष में माहौल बरकरार रखा है, असर 2019 तक रहेगा !

कर्नाटक में बीजेपी को मिली जीत खास है. खास इस मायने में है क्योंकि यह जीत 2019 के लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले मिली है. खास इसलिए है क्योंकि यह जीत दक्षिण का द्वार कहे जाने वाले राज्य में मिली है. खबर लिखे जाने तक कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन की बात सामने आ रही है लेकिन राज्य के चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनके उभरी है और बहुमत के सबसे करीब है.

कर्नाटक चुनाव की इस लिहाज से ज्यादा चर्चा हो रही थी क्योंकि यहां मिली जीत और हार को सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से जोड़ कर देखा जा रहा था. राजनीतिक विश्लेषक मोदी लहर के असर को परखने में लगे थे, क्योंकि इसी साल राजस्थान की दो लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में बीजेपी खाते की दो सीटें फिसलकर कांग्रेस के हाथों में चली गई थीं.

दूसरी तरफ, यूपी में गोरखपुर और फूलपुर के उपचुनाव की हार ने भी बीजेपी के खिलाफ विपक्ष को माहौल बनाने का मौका दे दिया था. हालांकि त्रिपुरा में बीजेपी की बड़ी जीत हुई थी, लेकिन, ऐतिहासिक जीत को भी छोटी जीत बताया जा रहा था.

अब कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता पर सवाल उठाने वालों के मुंह बंद हो गए हैं. चुनाव नतीजों ने साबित कर दिया है कि अभी भी चार साल सरकार चलाने के बाद भी मोदी लहर बरकरार है. ऐसा इसलिए कहना होगा क्योंकि इन चुनावों में बीजेपी की तरफ से स्टार प्रचारक मोदी ही थे. बीजेपी भले ही येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर मैदान में थी. लेकिन, मोदी की ताबड़तोड़ रैलियों ने चुनावी फिजा को ही बदल कर रख दी. पहले कांग्रेस के साथ कांटे की टक्कर दिख रही थी. लेकिन, मोदी की 21 रैलियों ने माहौल को बीजेपी के पाले में कर दिया.

Rahul Gandhi in Karnataka

मोर्चा राहुल गांधी ने भी संभाला था, लेकिन, उनका जादू एक बार फीका साबित हुआ. मोदी बनाम राहुल की लड़ाई में बाजी फिर मोदी के हाथ लगी. इस जीत ने आने वाले दिनों में मोदी के मुकाबले खड़े होने की राहुल गांधी की कोशिश को भी झटका दिया है.

कर्नाटक में बीजेपी के खिलाफ कांग्रेस ने अपने तरकश के सारे तीर चला दिए, यहां तक कि बीजेपी के परंपरागत समर्थक माने जाने वाले लिंगायत समुदाय को भी पटाने के लिए अलग धर्म के तौर पर ही उन्हें मान्यता देने का दांव चला गया. लेकिन, कांग्रेस का यह दांव भी उल्टा पड़ गया. बीजेपी कांग्रेस की इस कोशिश को हिंदू धर्म के भीतर विवाद और बंटवारे को बढाने वाले कदम के तौर पर प्रचारित करने में सफल रही.

राहुल गांधी का मंदिर-मंदिर घूमना भी काम नहीं आया. सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलने की राहुल की रणनीति एक बार फिर फेल हो गई. कांग्रेस की सरकार के खिलाफ एंटीइंकंबेंसी फैक्टर ने काम किया. मोदी यहां भी सफल रहे. कर्नाटक की जनता को राहुल से ज्यादा मोदी पर भरोसा दिखा.

इस जीत के बाद अब राष्ट्रीय स्तर पर भी सियासी समीकरण भी काफी बदलने वाले हैं. ये समीकरण एनडीए के भीतर भी और एनडीए के बाहर भी बदलेंगे. इस जीत के बाद एनडीए के भीतर बीजेपी और मजबूत होकर उभरेगी. चंद्रबाबू नायडू बीजेपी का साथ छोड़कर अलग हो चुके हैं. शिवसेना भी बीजेपी से अलग होकर लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है. लेकिन, अब कर्नाटक की जीत के बात बीजेपी से अलग होने की सोंच रहे दलों और नेताओं को फिर से सोंचना पड़ेगा.

दूसरी तरफ, विपक्ष के भीतर भी समीकरण बदलेंगे. अब विपक्षी दल और मजबूती से मोदी विरोधी मुहिम को चलाने की कोशिश करेंगे. लेकिन, इस कोशिश के केंद्र में कौन होगा यह सबसे बड़ा सवाल है. क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में बाकी विपक्षी दलों के नेता एक होने से अब हिचकेंगे.

विपक्ष के भीतर नेतृत्वहीनता मोदी के सामने की चुनौती को खत्म करेगी. कर्नाटक के बाद अब साल के आखिर में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं. वहां भी सीधी लड़ाई बीजेपी बनाम कांग्रेस ही रहने वाली है. इन तीनों ही राज्यों में बीजेपी की सरकार है. बीजेपी के लिए राजस्थान में ज्यादा बड़ी चुनौती मिल रही है. लेकिन, कर्नाटक की जीत के बाद बीजेपी के पक्ष में मोमेंटम बन गया है. बीजेपी इस मोमेंटम को आगे बरकरार रखना चाहेगी.

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हालांकि बीजेपी बहुमत के आंकड़े से थोड़ा पीछे रह गई है, जिसके बाद कांग्रेस और जेडीएस के बीच गठबंधन की संभावना भी तलाशी जाने लगी है.  नतीजों से साफ हो गया है कि सरकार चाहे किसी की भी बने लेकिन, मोदी के असर को कम करने के लिए कांग्रेस को अभी बहुत कुछ करना पड़ेगा.

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