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उपराष्ट्रपति चुनाव: क्या वेंकैया को बदनाम कर कांग्रेस बीजेपी से लेना चाहती है बदला

उप-राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के छह साल पुराने एक फैसले को नया हथियार बनाया है.

Chandrakant Naidu Updated On: Jul 21, 2017 10:03 AM IST

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उपराष्ट्रपति चुनाव: क्या वेंकैया को बदनाम कर कांग्रेस बीजेपी से लेना चाहती है बदला

उप-राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के छह साल पुराने एक फैसले को नया हथियार बनाया है. अदालत ने इस आदेश में बीजेपी के एक ट्रस्ट को जमीन देने को गैरकानूनी ठहराया था. सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश के जरिए कांग्रेस, एनडीए के उम्मीदवार वेंकैया नायडू को कठघरे में खड़ा करना चाहती है. सवाल ये है कि जिस तरह संयुक्त विपक्ष के उम्मीदवार गोपालकृष्ण गांधी पर आतंकी याकूब मेमन की पैरोकारी का आरोप लगा, क्या उसी तरह कांग्रेस अब वेंकैया को बदनाम करना चाहती है?

6 अप्रैल 2011 को सर्वोच्च अदालत ने बीजेपी के कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट को जमीन देने के बीजेपी सरकार के फैसले को निरस्त कर दिया था. कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट को ये जमीन सितंबर 2004 में दी गई थी. बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर वेंकैया नायडू इस ट्रस्ट के प्रमुख थे. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी, दिग्गज नेता लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी भी इसके ट्रस्टी थे. साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बलवंत आप्टे और संजय जोशी भी कुशाभाऊ ट्रस्ट के ट्रस्टी थे.

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट की तरफदारी करने के लिए फटकार लगाई थी. अदालत ने इसे संविधान की धारा 14 के खिलाफ बताया था. कोर्ट ने ट्रस्ट को दी गई जमीन के इस्तेमाल के नियम में बदलाव को भी गैरकानूनी ठहराया था. साथ ही अधिकारियों को आदेश दिया था कि वो ट्रस्ट से 20 एकड़ जमीन वापस लें.

इस मामले की वजह से सरकार पर सवाल उठे थे. क्योंकि मुख्यमंत्री ने अपने विवेकाधीन कोटे से पार्टी को जमीन दी थी. इसमें वेंकैया नायडू का कितना रोल था, ये बात साफ नहीं है. लेकिन बीजेपी अध्यक्ष के तौर पर इस गड़बड़ी में वो भी साझीदार थे. नियमों को दरकिनार करके उनकी अगुवाई वाले ट्रस्ट ने बीस एकड़ जमीन हड़पने की कोशिश की थी. अब इसका उप राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों पर क्या असर पड़ेगा, वो बात अलग है.

18 जून 2004 को ठाकरे मेमोरियल ट्रस्ट के संयोजक कैलाश जोशी ने तीस एकड़ जमीन के लिए सरकार को अर्जी दी. ट्रस्ट ने कहा कि उसे भोपाल के बवादिया कलां इलाके में ये जमीन अखिल भारतीय ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट खोलने के लिए चाहिए.

उस वक्त बाबूलाल गौर मध्य प्रदेश के हाउसिंग मंत्री थे. उन्होंने फौरन ही ट्रस्ट की अर्जी पर कार्रवाई का निर्देश दिया. गौर ने इस बारे में टाउन एंड कंट्रोल प्लानिंग कमिश्नर और कलेक्टर से फौरन रिपोर्ट तलब की. टाउन कमिश्नर ने ट्रस्ट को जमीन देने का विरोध किया. उन्होंने कहा कि जो जमीन ट्रस्ट मांग रहा है, वो रिहाइश और बागान के लिए इस्तेमाल होनी तय हुई है. इसके बाद प्रधान सचिव ने कुशाभाऊ मेमोरियल ट्रस्ट की जमीन की अर्जी खारिज कर दी.

जिस वक्त ट्रस्ट ने अर्जी लगाई थी, उस वक्त उसका रजिस्ट्रेशन भी नहीं हुआ था. कैलाश जोशी ने ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन के लिए अर्जी डाली. इसमें वेंकैया नायडू को ट्रस्ट का पहला अध्यक्ष बताया गया. अक्टूबर 2004 में ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन की अर्जी को रजामंदी मिल गई और 24 दिसंबर 2004 को कुशाभाऊ ट्रस्ट के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हो गई. यानी ट्रस्ट का रजिस्ट्रेशन, जमीन की अर्जी देने के छह महीने बाद हुआ.

जिले के कलेक्टर ने कहा कि जब जमीन के इस्तेमाल का तरीका गजट में जारी कर दिया गया है, तो अब लैंड यूज में बदलाव संभव नहीं. लेकिन मध्य प्रदेश सरकार ने सारे ऐतराज खारीज करते हुए तीस एकड़ जमीन को अलग कर दिया. सरकार को उम्मीद थी कि लैंड रिजर्वेशन कमेटी से उसे मंजूरी मिल जाएगी. कमेटी ने मंजूरी दे भी दी.

लेकिन जिले के कलेक्टर ने सरकार को याद दिलाया कि ये जमीन ट्रस्ट को न्यूनतम मूल्य से कम कीमत पर नहीं दी जा सकती. इस जमीन की कीमत, 7 करो़ड़ 84 लाख रुपए बताई गई. जमीन के आवंटन से पहले इसका दस फीसद हिस्सा जमा किया जाना जरूरी था. लेकिन ट्रस्ट ने ये रकम सरकारी खजाने में नहीं जमा की.

कैलाश जोशी ने वादा किया कि वो ये रकम जल्द ही जमा करा देंगे. करीब 8 महीने बाद जोशी ने कलेक्टर को चिट्ठी लिखी कि उन्हें सिर्फ 20 एकड़ जमीन की जरूरत है. इसके बदले में सरकार ने ट्रस्ट से 5 करोड़ 22 लाख 72 हजार रुपए मांगे. साथ ही 52 लाख 27 हजार 200 रुपए तुरंत पेशगी देने को कहा. लेकिन ट्रस्ट ने केवल 25 लाख रुपए जमा किए. इसके बाद वो सरकार से सात महीने तक मोल-तोल करता रहा.

इस दौरान बाबूलाल गौर राज्य के मुख्यमंत्री बन गए. राजस्व सचिव ने सलाह दी कि सरकारी खजाने की हालत देखते हुए जमीन को नीलाम कर देना चाहिए. लेकिन गौर मंत्रिमंडल ने राजस्व सचिव की सलाह खारिज करते हुए 20 एकड़ जमीन कुशाभाऊ ट्रस्ट को दे दी. इसकी कीमत 40 लाख रुपए प्रति हेक्टेयर मांगी गई.

अब सरकार ने ट्रस्ट से कहा कि वो 55 लाख 94 हजार रुपए, जमीन की कीमत के तौर पर दे. ट्रस्ट की ओर से कैलाश जोशी ने सरकार को खत लिखकर इसमें भी रियायत मांगी. जोशी ने कहा कि ये संस्थान जनहित में स्थापित किया जा रहा है. सरकार ने इस पर फौरन हामी भर दी. सरकार ने कहा कि ट्रस्ट ने जो 25 लाख रुपए पेशगी जमा की है, उसके बाद उसे जमीन के एवज में और पैसे देने की जरूरत नहीं. तय ये हुआ कि ट्रस्ट अगले तीस साल तक एक रुपए किराए के तौर पर सरकारी खजाने को देगा.

जमीन का लैंड यूज बदलने से पहले सरकार ने आम लोगों से इस पर राय जाहिर करने को कहा था. रियल्टी सेक्टर से कई लोगों ने इस पर अपना ऐतराज़ जाहिर कर दिया. सरकार ने सारे ऐतराज खारिज कर दिए. इसके बाद 5 सितंबर 2008 को नोटिफिकेशन जारी करके 20 एकड़ जमीन कुशाभाऊ ठाकरे ट्रस्ट को दे दी गई.

इसके खिलाफ अखिल भारतीय उपभोक्ता कांग्रेस ने हाई कोर्ट में अपील कर दी. हाई कोर्ट ने उपभोक्ता कांग्रेस की अर्जी ये कहते हुए खारिज कर दी कि जमीन सरकार की है, और वो जिसे चाहे दे सकती है. अदालत ने ये भी कहा कि जमीन आवंटन में किसी नियम की अनदेखी नहीं हुई है.

इसके बाद याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की. सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया और कहा कि अफसोस की बात है कि हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पूरी जमीन आवंटन की पूरी प्रक्रिया की अनदेखी कर दी. इस पूरी प्रक्रिया में तमाम नियमों की अनदेखी गई थी और गैरकानूनी तरीके से जमीन आवंटन किया गया. सरकार ने इस मामले में ट्रस्ट के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया.

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