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पार्टियों की राजनीति में उपराष्ट्रपति की एंट्री, बोले- लोकतंत्र और राजवंश साथ नहीं चल सकते

उपराष्ट्रपति बनने के बाद नायडू ने कहा 'राजवंश और लोकतंत्र साथ नहीं चल सकते. राजवंश बुरा है, लेकिन कुछ लोगों को राजवंश व्यवस्था बेहद पसंद है.'

FP Staff Updated On: Sep 16, 2017 01:16 PM IST

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पार्टियों की राजनीति में उपराष्ट्रपति की एंट्री, बोले- लोकतंत्र और राजवंश साथ नहीं चल सकते

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने शनिवार को अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी पर निशाना साधा है. उपराष्ट्रपति बनने के बाद नायडू ने कहा 'राजवंश और लोकतंत्र साथ नहीं चल सकते. राजवंश बुरा है, लेकिन कुछ लोगों को राजवंश व्यवस्था बेहद पसंद है.' हालांकि बाद में सफाई देते हुए उन्होंने तुरंत इस बयान को किसी पार्टी और व्यक्ति से अलग कर दिया.

उपराष्ट्रपति के बयान के बाद कांग्रेस नेता संजय निरूपम का भी बयान आ गया है. उन्होंने लिखा 'यह कैसे हो सकता है. उपराष्ट्रपति राजनीतिक दलदल में उतर गए हैं. इस पर हम कानूनी प्रोटोकॉल और इज्जत भूल सकते हैं.'

वेंकैया के इस बयान के बाद शायद ही कोई ना समझ पाए कि उनका निशाना किसकी तरफ था. नायडू का यह बयान राहुल के कैलिफोर्निया विश्वविधालय बर्कले में दिए बयान के दो दिन बाद आया है. राहुल ने इस संवाद में राजवंश पर अपने विचार व्यक्त किए थे.

कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे, पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के पोते और आजाद भारत के प्रथम प्रधानमंत्री के पड़नाती कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था 'भारत की सभी राजनीतिक पार्टियों में आजकल यही परेशानी है. अखिलेश यादव राजवंशज हैं. स्टालिन राजवंशज हैं. यहां तक कि अभिषेक बच्चन भी राजवंशज हैं. मेरे पीछे मत जाओ क्योंकि पूरा देश ऐसे ही चल रहा है. यह होता है भारत में.'

वेंकैया नायडू का बयान ऐसे समय में आया है जब विपक्षी पार्टी के प्रमुख नेता ने राजवंश पर अपने विचार व्यक्त किए थे और वो साफ-साफ इस पर अपना बचाव कर रहे थे. राहुल के इस बयान से लग रहा था कि भारतीय जनता पार्टी अनुभवहीन पार्टी है और उसका परिवारवाद का नारा सिर्फ एक राजनीतिक जुमला है.

नायडू का बयान काफी अहम है क्योंकि पार्टी के अन्य प्रमुख नेता वित्त मंत्री अरुण जेटली, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह और सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी भी राहुल के बार्कले भाषण पर निशाना साध चुके हैं.

उपराष्ट्रपति को किसी भी पार्टी का समर्थन या विरोध नहीं करना चाहिए. ऐसा नायडू और पूर्ववर्ती हामिद अंसारी भी कई बार कह चुके हैं. अगर नायडू का बयान वाकई में ही किसी पार्टी के विरुद्ध नहीं था तो उन्हें इस पर सफाई क्यों देनी पड़ी.

10 अगस्त को उपराष्ट्रपति की शपथ लेने से एक दिन पहले खुद नायडू ने हामिद अंसारी के बयान पर कुछ भी बोलने से मना कर दिया था. अंसारी ने कहा था कि देश में अल्पसंख्यकों में असुरक्षा की भावना है. इसे नायडू ने राजनीति से प्रेरित बयान कहते हुए नकार दिया था.

हालांकि नायडू ने अपने बयान में किसी का भी नाम नहीं लिया है. उनका बयान अंसारी के उस बयान से भी जोड़कर देखा जा सकता है. जिसमें अंसारी ने किसी भी संप्रदाय का नाम नहीं लिया था, लेकिन उनके इस बयान को मुस्लिमों से जोड़कर देखा गया था. इससे लगता है कि देश में अभी भी स्वीकृति के माहौल पर भी खतरा है. अंसारी के बयान ने असहिष्णुता और गोरक्षा के नाम पर हिंसा जैसे मुद्दों को पीछे धकेल दिया था.

नायडू ने इस बयान पर बोलते हुए कहा था 'कुछ लोगों ने कहा था अल्पसंख्यक असुरक्षित हैं. यह राजनीति चमकाने का एक तरीका है. पूरी दुनिया से अगर आप तुलना करें तो सबसे ज्यादा मुसलमान भारत में ही सुरक्षित हैं.'

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