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उत्तराखंड चुनाव: प्रदूषण से पलायन तक इन मुद्दों पर गरमाया है 'पहाड़'

उत्तराखंड में ज्वलंत चुनावी मुद्दों की भरमार है

Namita Singh Updated On: Feb 07, 2017 11:39 AM IST

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उत्तराखंड चुनाव: प्रदूषण से पलायन तक इन मुद्दों पर गरमाया है 'पहाड़'

उत्तराखंड में पहाड़ी वोटर्स आने वाले असेंबली चुनावों को ‘गाद-गधेरे, कोडा-झिंगोरा की राजनीति’ की तर्ज पर देखते हैं और इस तरह से राज्य के मुख्य मसलों को जाहिर करते हैं. पहाड़ी इलाके के लोगों के लिए गाद (नदियों), गधेरे (वसंत) और कोडा-झिंगोरा (अनाज) का आना बेहद अहम होता है. इस तरह से ये चीजें तय करती हैं कि राज्य में चुनावों के नतीजे क्या रह सकते हैं.

हालांकि, इन विषयों पर लोकल सेंटीमेंट के टिके होने के बावजूद उत्तराखंड में राजनीति की दिशा काफी बदल गई है. 15 फरवरी को राज्य में होने वाली वोटिंग के महज एक हफ्ते से कुछ ज्यादा दिन बचे हैं. लेकिन किसी भी बड़ी राजनीतिक पार्टी ने इनमें से किसी मसले को प्रमुखता से नहीं उठाया है.

9 नवंबर 2000 को उत्तराखंड का एक अलग राज्य के तौर पर जन्म हुआ था. नया राज्य बनाने का मकसद अपनी क्षमताओं का पूरी तरह से दोहन करना और विकास की ऊंचाइयां तय करना था. लेकिन, एक स्थायित्व भरे विकास का हब बनने की बजाय उत्तराखंड राजनीतिक ड्रामा का केंद्र बन गया.

उत्तराखंड हरियाली, पहाड़ों और लाइमस्टोन और कॉपर जैसे मैटेलिक और नॉन-मैटेलिक मिनरल्स से भरा-पूरा राज्य है. लेकिन, इस भौतिक संपदा का ज्यादातर इस्तेमाल माइनिंग माफिया करते हैं, जिनकी अक्सर राजनेताओं के साथ मिलीभगत होती है.

harish rawat

हरीश रावत की फेसबुक वॉल से

राजनीतिक मुद्दे जो चुनावों को प्रभावित करेंगे

पलायन, बेरोजगारी, महिला और बाल स्वास्थ्य, प्राकृतिक आपदा, टूरिज्म और पारंपरिक फार्मिंग में गिरावट, जल संरक्षण, मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच होने वाले टकराव, अवैध वन्यजीव व्यापार, बिना सोचे-विचारे शुरू किए गए हाइड्रोकार्बन प्रोजेक्ट्स, जंगलों में आग और वनों का खत्म होना उन गंभीर मसलों में आते हैं, जिनसे हर पहाड़ी वोटर को रोजाना दो-चार होना पड़ता है.

इन मसलों ने 2013 में केदारघाटी में बादल फटने की घटना के बाद से ज्यादा गंभीर रूप ले लिया है. इससे राज्य में टूरिज्म इंडस्ट्री पर बुरा असर पड़ा है, जो कि राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है. इस भयानक आपदा के चार साल बीत जाने के बाद भी राज्य इससे पूरी तरह से उबर नहीं पाया है.

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नदियों का रौद्र रूप उत्तराखंड के लिए हमेशा से एक समस्या रहा है. इनसे संपत्तियों को अक्सर बड़ा नुकसान होता रहता है. राज्य में नदियां जब उफान पर होती हैं तो ये घरों को बहा ले जाती हैं, पुल टूट जाते हैं, रास्ते खत्म हो जाते हैं और जान-माल को भारी नुकसान होता है. नदियां उफनती हैं तो तमाम लोग गुम हो जाते हैं.

पिछले तीन साल उत्तराखंड की अंतहीन मुश्किलों की एक कहानी बताते हैं. लोग अभी भी मुआवजे का इंतजार कर रहे हैं. तबाह हुए पुलों और सड़कों को अभी तक दुरुस्त नहीं किया जा सका है. हर तरफ भ्रष्टाचार छाया हुआ है.

People wave towards a helicopter carrying Hindu nationalist Narendra Modi, the prime ministerial candidate for India's main opposition Bharatiya Janata Party (BJP), after an election campaign rally at Mathura in the northern Indian state of Uttar Pradesh April 21, 2014. Around 815 million people have registered to vote in the world's biggest election - a number exceeding the population of Europe and a world record - and results of the mammoth exercise, which concludes on May 12, are due on May 16. REUTERS/K. K. Arora (INDIA - Tags: POLITICS ELECTIONS TPX IMAGES OF THE DAY) - RTR3M2UN

यहां हम असेंबली चुनावों से पहले उत्तराखंड के मुख्य मुद्दों पर नजर डाल रहे हैं:

उत्तराखंड में पर्यावरणीय मसले

उत्तराखंड हरियाली से पटे पहाड़ों और प्राकृतिक सुंदरता का पर्याय है. लेकिन, राज्य सत्ता में बैठे लोगों की उपेक्षा का शिकार हो रहा है. पर्यावरणीय मसलों की अनदेखी की जाती है और राज्य को बार-बार इसकी कीमत चुकानी पड़ती है. सरकार के ठीक से काम न करने की वजह से राज्य के लोगों को बाढ़, भूस्खलन और भूकंप की तबाही झेलनी पड़ती है.

गैर-स्थायित्व भरा विकास

राज्य की नदियों पर बने बड़े बांध पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं. राज्य में मंजूर 170 हाइडल प्रोजेक्ट्स में से ज्यादातर पहले से मौजूद हैं. अंडरग्राउंड टनल्स से पहाड़ कमजोर हो गए हैं और इनसे भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है.

पानी के बड़े जलाशय जलजीवों के रिहायश में बदलाव ला रहे हैं, इससे पूरे ईकोलॉजी को नुकसान पहुंच रहा है. बांधों और हाइडल प्रोजेक्ट्स से राज्य कहीं ज्यादा जोखिम भरा हो गया है. नदियों के किनारे होटलों और घरों से प्रदूषण बढ़ रहा है.

जंगल की आग

जंगलों में लगने वाली आग से हजारों हेक्टेयर जंगल की जमीन बर्बाद हो जाती है. इससे मनुष्यों और जानवरों दोनों की जिंदगियों को नुकसान होता है. पहाड़ों पर लोग ऐसा इस वजह से करते हैं ताकि घास अच्छे से उगे और जानवरों को चारा मिले. लेकिन इससे कई दिक्कतें भी पैदा होती हैं.

बढ़ता प्रदूषण

जरूरत से ज्यादा पर्यटन भारी प्रदूषण भी समस्या भी लेकर आया है. खाने-पीने की चीजों के पैकेट्स और बॉटल्स हर जगह बिखरी हुई दिख जाएंगी. नदियों और झीलों के किनारे बने होटल अपने गंदे पानी की निकासी इन्हीं नदियों में करते हैं. इससे न सिर्फ मनुष्यों की जिंदगियों को बल्कि पानी में रहने वाले जीवों की जिंदगियों पर भी बुरा असर पड़ रहा है.

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मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गंगा का पानी ऋषिकेश के आगे पीने लायक नहीं रहता है. इन नदियों में कई जलजीवों की प्रजातियां खत्म होने की कगार पर पहुंच गई हैं.

जल संरक्षण

उत्तराखंड कई बड़ी नदियों का उद्गम स्थल है. इसके बावजूद राज्य पानी की कमी से जूझ रहा है. सिंचाई सुविधाओं की गैरमौजूदगी में कृषि भूमि बंजर पड़ी हुई है. घरों के दैनिक उपयोग के लिए भी पानी मुहैया नहीं हो पाता है. गांवों में महिलाओं को पानी की तलाश में हर रोज मीलों दूर पैदल चलना पड़ता है.

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(फोटो: फेसबुक से साभार)

वन संरक्षण

वन्य संपदा के अनियंत्रित उठान और जंगल की जमीन के अतिक्रमण की वजह से जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं. पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से वन्य संपदा खत्म हो रही है. औषधीय गुण रखने वाले पौधों के अवैध व्यापार से भी राज्य को प्राकृतिक संपत्ति का नुकसान हो रहा है. वन्य जीवों के फर, हड्डियां, दांत, खाल और अन्य चीजों के अवैध व्यापार का काम जोरों पर चल रहा है. जानवरों के शिकार पर रोक नहीं लगाई जा सकी है. वन्य जीवों की कई प्रजातियां इस वजह से संकट में आ गई हैं.

मनुष्य बनाम जंगल

बिना सोचे-विचारे किए जा रहे विकास के कामों के चलते कई वाइल्ड लाइफ इलाके बंद हो गए हैं. इससे मनुष्य और वन्यजीवों में टकराव के मामले बढ़ने लगे हैं. तेंदुओं के इंसानों और पालतू जानवरों पर हमलों के मामले आएदिन देखने को मिल रहे हैं. रिहायश के इलाके छिनने और भोजन के अभाव में इन वन्य जीवों को इंसानी रिहायश के इलाकों में आना पड़ता है.

अवैध खनन

लाइमस्टोन और कॉपर जैसे मिनरल्स से भरा-पूरा होने के चलते राज्य खनन के लिए पसंदीदा जगह बना हुआ है. हालांकि, भौगोलिक और सीस्मिक संवेदनशीलता इसकी इजाजत नहीं देती है. उत्तराखंड खनन कंपनियों और रियल एस्टेट दिग्गजों के सामने असहाय बना हुआ है. ये कंपनियां ईको-सेंसिटिव इलाकों में खनन कर रही हैं और बड़ी-बड़ी इमारतें बना रही हैं. इससे लैंडस्लाइड और बाढ़ के खतरे बढ़ रहे हैं.

पलायन

उत्तराखंड के गांवों से पलायन के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है. खाली पड़े भुतहा गांवों पर सरकारों ने काफी ध्यान भी दिया है. लेकिन, उत्तराखंड के पहाड़ों के युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं और इस वजह से मैदानी इलाकों में आना चाहते हैं. पहाड़ों पर इनके लिए कुछ भी नहीं है. राज्य में प्रति किसान जोत का रकबा करीब 0.68 हेक्टेयर है. जो कि 1.16 हेक्टेयर प्रति किसान के राष्ट्रीय औसत से काफी कम है.

2011 की जनगणना के मुताबिक, उत्तराखंड के 16,793 गांवों में से 1,053 गांव खाली पड़े हैं. अस्तित्व में आने के करीब दो दशक बीतने के बावजूद राज्य की ग्रोथ केवल तीन मैदानी जिलों तक सीमित बनी हुई है, जबकि पहाड़ के 10 जिले अपनी ग्रोथ के लिए अब भी तरस रहे हैं.

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ रूरल डेवलेपमेंट के कराए एक सर्वे के मुताबिक, पौड़ी गढ़वाल और अल्मोड़ा के 18 सैंपल गांवों में करीब 88 फीसदी परिवारों का कम से कम एक सदस्य रोजगार की तलाश में मैदानों की ओर पलायन कर गया है. पलायन करने वालों में से 90 फीसदी लंबे वक्त के लिए और स्थायी रूप से घर छोड़कर चले गए हैं.

सीमावर्ती इलाकों से लोगों के चले जाने से सुरक्षा को भी बड़ा खतरा पैदा हो रहा है क्योंकि इन इलाकों के लोग दूसरे देश की गतिविधियों की निगरानी रखने में काफी मददगार साबित होते हैं.

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(फोटो: फेसबुक से साभार)

सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर

साल 2011 से 2015 के बीच बनाई गई 5,852 किमी सड़कों में से करीब 4,000 किमी की सड़कें उत्तराखंड के ग्रामीण इलाकों में बनाई गई हैं. हालांकि, सड़कों और पुलों की कमी का मतलब है कि पहाड़ पर जीवन ज्यादा आसान नहीं है. ज्यादातर अस्पताल 20 से 100 किमी दूर हैं. ऐसे में लोगों को तत्काल चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराना मुश्किल होता है.

यही हाल शिक्षा का भी है. स्कूल लोगों की पहुंच से दूर हैं और इस सेक्टर में भी इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव है. गुजरे 16 सालों में 95 फीसदी गांवों को बिजली से जोड़ दिया गया है, लेकिन बिजली की कमी एक बड़ी समस्या है.

अभी भी 1,966 गांवों में बिजली नहीं पहुंची है. राज्य 3,500 मेगावाट बिजली पैदा करने का दावा करता है, लेकिन कई गांव अभी भी बिजली के बगैर जी रहे हैं.

बंजर कृषि भूमि

पहाड़ी इलाकों की अपनी चुनौतियां हैं. खेती करना मुश्किल हो गया है और इस वजह जमीन बंजर होती जा रही है. रिकॉर्ड्स के मुताबिक, कुल अनुमानित इलाके में, खेती लायक जमीन का रकबा पहले के 8.15 हेक्टेयर से घटकर 7.01 हेक्टेयर पर आ गया है.

सरकार की अनदेखी और उचित प्लानिंग के अभाव में कृषि उत्पादन प्रॉयोरिटी लिस्ट में सबसे नीचे चला गया है. इसकी वजह से राज्य में बेरोजगारी और पलायन को बढ़ावा मिल रहा है.

Uttarakhand Election Results 2017

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