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उत्तराखंड: अभी ऊंट की करवट का अंदाजा लगाना आसान नहीं

जब तक कोई मजबूत लहर न चल रही हो तब तक कोई भविष्यवाणी नहीं की जा सकती

Govind Singh Updated On: Feb 14, 2017 11:49 AM IST

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उत्तराखंड: अभी ऊंट की करवट का अंदाजा लगाना आसान नहीं

उत्तराखंड में चुनाव-प्रचार थम गया है. इसी के साथ ‘कौन जीतेगा-कौन हारेगा’ की धुकधुकी तेज हो गई है. अभी तक के ज्यादातर चुनाव पूर्व सर्वेक्षण भाजपा को पूर्ण बहुमत दे रहे हैं. लेकिन उत्तराखंड को करीब से देखने वाले राजनीतिक पंडित अभी भी आश्वस्त नहीं हैं.

इनका कहना है कि कुछ भी संभव है. क्योंकि उत्तराखंड में हार और जीत के बीच अत्यंत महीन अंतर होता है. बहुत कम वोट भी बाजी पलट सकते हैं.

हार के कगार पर खड़े कांग्रेसियों को मुख्यमंत्री हरीश रावत की करिश्माई तिकड़म पर भरोसा है और वे कहते हैं कि अंत में हरीश रावत के सर ही सत्ता का ताज बंधेगा. सबसे पहले कांग्रेस के आशावाद पर नजर डालें. यह आशावाद निरर्थक नहीं है.

कांग्रेस की डूबती नैया को हरीश रावत ने बचाया था

ढाई वर्ष पूर्व जब हरीश रावत को उत्तराखंड की सत्ता सौंपी गई थी, तब वहां कांग्रेस लोकप्रियता के सबसे निचले पायदान पर खडी थी. प्रदेश की पांचों लोकसभा सीटें वह भाजपा से हार चुकी थी.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हरीश रावत

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ हरीश रावत

केदारनाथ त्रासदी के बाद पीड़ितों को राहत न दे पाने के कारण भी उसकी बहुत फजीहत हो रही थी. कांग्रेस की देशव्यापी निराशा के माहौल में हरीश रावत को संकटमोचक के तौर पर उत्तराखंड भेजा गया था. और सचमुच वे उत्तराखंड में कांग्रेस के संकटमोचक बन कर अवतरित हुए थे.

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केदारनाथ में राहत का काम शुरू हुआ. उसके बाद हुए सभी विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस को अप्रत्याशित जीत मिली. एक तरह से हरीश रावत ने नरेंद्र मोदी के अश्वमेध रथ के घोड़े को चुनौती देने का काम किया.

यही नहीं, भाजपा की राज्य इकाई भी बीते पांच वर्षों में कोई बहुत मजबूत विपक्ष की भूमिका नहीं निभा पाई थी. पिछले साल जब 9 बागी कांग्रेस नेताओं ने भाजपा के साथ मिलकर हरीश रावत की सरकार को गिराने की कोशिश की थी, तब भी राष्ट्रपति शासन के बावजूद हरीश रावत अदालत से विजयी होकर लौटे थे.

तब रावत के पक्ष में सहानुभूति की लहर भी दौड़ पड़ी थी. इसलिए यदि कांग्रेस के लोग हरीश रावत की कलाबाजी पर यकीन रखे हुए हैं तो इसके पीछे उनके पास मजबूत तर्क हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हरीश रावत इस लहर को बरकरार नहीं रख पाए.

जिस तरह से हरीश रावत ने प्रदेश में शराब के ठेके खुलवाए और वे खनन माफिया के समक्ष नतमस्तक दिखाई दिए, उससे राज्य भर में उनके विरोध में माहौल बनने लगा. उनके खिलाफ अनेक जगहों पर जनांदोलन उभरने लगे. इसी बीच नौ बाग़ी बर्खास्त विधायक भाजपा में जा मिले.

नेताओं के बागी होने से हुए नुकसान की भरपाई कैसे करेगी कांग्रेस

विधायकों के पार्टी छोड़ जाने से गढ़वाल में कांग्रेस जैसे नेताविहीन हो गई. सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा, सुबोध उनियाल जैसे बड़े नेताओं के चले जाने से गढ़वाल में उसके पास कोई बड़ा नेता नहीं रहा.

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अकेले किशोर उपाध्याय ही बचे रह गए. वह भी हरीश रावत से खिंचे- खिंचे रहने लगे. यहां तक कि उन्होंने मुख्यमंत्री पर ये आरोप भी लगाया कि वे गढ़वाल के साथ भेदभाव कर रहे हैं. तब तक लगता था कि गढ़वाल में भले ही कांग्रेस कमजोर दिखाई पड़ रही हो, लेकिन कुमाऊं में उसकी बढ़त बरकरार है.

इस तरफ उसके पास इंदिरा हृदयेश और यशपाल आर्य जैसे दिग्गज थे. लेकिन चुनाव से ऐन पहले लंबे समय तक प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे और वरिष्ठ काबीना मंत्री यशपाल आर्य भी पुत्र सहित दगा दे गए. वे वयोवृद्ध नेता नारायण दत्त तिवारी के विश्वासी समझे जाते रहे हैं. फिर प्रदेश में कांग्रेस का सबसे बड़े दलित चेहरा भी वही थे.

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जब तिवारी अपने पुत्र सहित भाजपा में शामिल होने पार्टी के द्वार पर पहुंचे तो उनके ढेर सारे समर्थक भी भाजपा में जा मिले. इस झटके से कुमाऊं में भी हरीश रावत बेहद कमजोर हो गए. हरीश रावत के साथ प्रदेश के बुद्धिजीवी नहीं हैं. मध्यवर्ग भी नहीं रहा.

उत्तराखंड में चुनाव प्रचार करते हरीश रावत

उत्तराखंड में चुनाव प्रचार करते हरीश रावत

नोटबंदी और सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कदमों से मोदी ने प्रदेश की प्रगतिशील और राष्ट्रवादी जनता के बीच जो छवि बनाई है, उसका प्रभाव भी जनमानस पर पड़ा है. इसलिए आज हरीश रावत की राजनीतिक जमीन खिसकती नजर आ रही है.

इस सबके बावजूद यकीनन यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा पूरी तरह से जीत ही जाएगी या कांग्रेस हार ही जाएगी. इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है, बागी कांग्रेसियों के शामिल हो जाने से भाजपा के समर्पित कार्यकर्ताओं का उदासीन हो जाना या अपनी ही पार्टी उम्मीदवार के खिलाफ खड़ा हो जाना.

आज प्रदेश में लगभग बीस सीटों पर दोनों पार्टियों के बागी मैदान में हैं. चूंकि उत्तराखंड में बहुत छोटे-छोटे निर्वाचन क्षेत्र हैं, लोगों की आपस में रिश्तेदारियां हैं, समाज बहुत बारीकी से आपस में जुड़ा हुआ है.

ऐसे में बहुत थोड़े वोट भी निर्णायक बन जाते हैं. इसलिए जहां सौ-दो सौ वोटों से हार-जीत का फैसला होता है, वहां किसी भी एक पक्ष की जीत का दावा नहीं किया जा सकता है.

यदि कोई बागी पांच हजार वोट भी ले जाता है तो वह जीत रहे प्रत्याशी के आगे ब्रेक लगा सकता है. जब तक कोई मजबूत लहर या आंधी न चल रही हो, तब तक स्पष्ट भविष्यवाणी नहीं की जा सकती.

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